कोटद्वार की घटना के बाद पहली मुलाक़ात: जब 'मोहम्मद दीपक' और वकील अहमद हुए आमने-सामने

'मोहम्मद दीपक' और वकील अहमद

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इमेज कैप्शन, उत्तराखंड के कोटद्वार में 26 जनवरी को हुई घटना के बाद 'मोहम्मद दीपक' और वकील अहमद पहली बार मिले
    • Author, आसिफ़ अली
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

एक जिम ट्रेनर और एक बुज़ुर्ग दुकानदार दो अलग-अलग पीढ़ियां, अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोग लेकिन एक घटना ने इन दोनों की ज़िंदगी को आमने-सामने ला दिया.

कोटद्वार में 26 जनवरी को कपड़ों की एक दुकान के नाम को लेकर हुए विवाद के बाद ये दोनों लोग देशभर में चर्चा में आ गए हैं.

सड़कों से लेकर सोशल और राष्ट्रीय मीडिया तक और थाने से लेकर राजनीतिक बहसों में इस घटना की गूंज है. लेकिन इस शोर-शराबे के बीच वे दोनों उस घटना के बाद साथ नहीं दिखे थे.

उस घटना ने इन दोनों की ही ज़िंदगी को अलग-अलग तरह से छुआ.

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बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत के दौरान ये दोनों साथ आए, दीपक कश्यप जिन्होंने 26 जनवरी को हस्तक्षेप के दौरान अपना नाम 'मोहम्मद दीपक' बताया, और वकील अहमद, जिनकी दुकान 'बाबा कलेक्शन' को लेकर विवाद शुरू हुआ.

इन दोनों की भेंट भी ऐसे दिन हो रही थी जब दीपक का जन्मदिन था. वो कहते हैं कि जन्मदिन के मौके़ और इस पूरे घटनाक्रम के बीच उन्हें वकील अहमद को देखकर सुकून महसूस हुआ.

दीपक ने कहा, "इनकी तबीयत पहले से बेहतर लग रही है. वाक़ई अच्छा लग रहा है."

दीपक के लिए भी यह सिर्फ़ एक औपचारिक भेंट नहीं थी, यह उस दिन की अधूरी बातचीत को आगे बढ़ाने का एक मौक़ा था.

वकील अहमद भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि घटना के बाद दोनों सहमे हुए थे, इसलिए मुलाक़ात नहीं हो पाई. वकील अहमद कहते हैं कि घटना के बाद से वो मानसिक और शारीरिक रूप से ठीक नहीं थे, इसलिए यह मुलाक़ात टलती रही.

उन्होंने कहा, "आज थोड़ा स्वास्थ्य ठीक होने पर मैं दीपक से मिलने आया हूं. वह पल आज भी याद आता है, जिससे मैं गुज़रा."

जब उस दिन माहौल बदल गया...

वीडियो कैप्शन, कोटद्वार वाली घटना पर ‘मोहम्मद दीपक’ नाम से चर्चित शख़्स और दुकानदार वकील अहमद क्या बोले?

26 जनवरी को वकील अहमद अपनी दुकान पर थे. उन्होंने बताया कि उस दिन कुछ युवक उनके दुकान पर आए और दुकान के नाम पर सवाल उठाने लगे.

उनका कहना है कि उनकी बात नाम बदलने से शुरू हुई, लेकिन लहजे और दबाव ने स्थिति को तनावपूर्ण बना दिया.

उनका कहना है कि उनके बेटे ने स्थिति को समझते हुए दुकान का नाम बदलने के लिए समय मांगा, लेकिन सामने से जल्द बदलाव का दबाव बनाया गया. यहीं से बातचीत असहज होती चली गई.

वकील अहमद बताते हैं कि उसी समय दीपक वहां पहुंचे. उन्हें लगा कि कोई बुज़ुर्ग दबाव में है और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है.

उस दिन के बारे में दीपक बताते हैं कि उन्होंने वहां देखा कि सामने एक बुजुर्ग व्यक्ति है और सामने संख्या में ज़्यादा लोग हैं.

दीपक कहते हैं, "मुझे यह ठीक नहीं लगा कि कई युवक एक बुज़ुर्ग से इस तरह बात कर रहे हैं. यहीं से उन्होंने हस्तक्षेप किया."

वकील अहमद मानते हैं कि उस वक्त भीड़ के बीच कोई और बोलने को तैयार नहीं था.

वकील अहमद कहते हैं, "भीड़ जिस तरह आई थी, वह अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी. हम घबरा गए थे."

'दीपक का आना सहारे जैसा था'

'मोहम्मद दीपक' और वकील अहमद

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इमेज कैप्शन, वकील अहमद का कहना है कि उस दिन दीपक का आगे आना उनके लिए सहारे जैसा था

इस घटना के दौरान जब दीपक से उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम "मोहम्मद दीपक" बताया.

यह बात बाद में बहस का हिस्सा बनी, लेकिन दीपक इसे किसी रणनीति के बजाय उस पल की ज़रूरत बताते हैं.

उनका कहना है कि उस समय माहौल धर्म और पहचान की ओर जा रहा था. उन्होंने यह जताना चाहा कि इंसानियत किसी एक पहचान की मोहताज नहीं है.

दीपक बताते हैं कि वकील अहमद से उनकी पहले कोई नज़दीकी नहीं थी. सिर्फ़ इतना था कि वह उन्हें बुज़ुर्ग मानते थे और रास्ते में दिखने पर अभिवादन कर लेते थे.

वकील अहमद के लिए भी यह किसी जान-पहचान का मामला नहीं था.

उनके लिए यह उस पल की बात थी, जब किसी ने बिना कुछ सोचे उनका साथ दिया.

दोनों इस बात पर सहमत दिखे कि उस दिन जो हुआ, वह असामान्य इसलिए बना क्योंकि लोग आम तौर पर ऐसे मौकों पर चुप रह जाते हैं.

समर्थन, डर और आगे का रास्ता

वकील अहमद

घटना के बाद दीपक सोशल मीडिया पर वायरल हो गए.

फ़ोन कॉल, मिलने आने वाले लोग, तस्वीरें-सब कुछ उनके लिए नया था.

दीपक कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक सामान्य हस्तक्षेप इतना बड़ा मुद्दा बन जाएगा.

उनके मुताबिक़, उन्होंने तो वही किया जो उन्हें सही लगा.

वकील अहमद को इस बात की चिंता है कि अगर मदद करने वालों को ही परेशानी झेलनी पड़े, तो लोग आगे आने से डरेंगे.

हालांकि, वह यह भी मानते हैं कि इस घटना ने कुछ लोगों को सोचने पर मजबूर किया है.

दोनों इस सवाल पर भी बात करते हैं कि आज लोग एक-दूसरे के लिए सामने क्यों नहीं आते.

31 जनवरी को बजरंग दल के कई कार्यकर्ताओं ने कोटद्वारा पहुंच कर नारेबाज़ी की.

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इमेज कैप्शन, 31 जनवरी को बजरंग दल के कई कार्यकर्ताओं ने कोटद्वारा पहुंच कर नारेबाज़ी की थी

दीपक का मानना है, "अगर आज हम चुप रहते हैं, तो कल हमारे बच्चे भी वही चुप्पी सीखेंगे."

वकील अहमद कहते हैं कि इंसानियत किसी एक धर्म की जागीर नहीं होती है.

सपनों का भारत

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दीपक का कहना है कि ये कोई असाधारण वादा नहीं, बल्कि स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. वो कहते हैं कि अगर भविष्य में उनके सामने फिर वैसी ही कोई स्थिति आती है, तो उनका रुख़ नहीं बदलेगा, जिस तरह उस दिन वह आगे आए थे, वैसा ही फिर करेंगे.

वकील अहमद भी मानते हैं कि उस दिन हालात किस दिशा में जा सकते थे, यह सोचना ही बेचैन कर देता है. उनके मुताबिक़, अगर उस वक्त दीपक वहां नहीं होते, तो बात सिर्फ़ बहस तक सीमित रहती या नहीं, यह कहना मुश्किल है.

बातचीत धीरे-धीरे उस बिंदु पर पहुँचती है जहाँ सवाल घटना से आगे बढ़कर भविष्य पर टिक जाता है- दोनों के सपनों के भारत पर.

दीपक कहते हैं कि वह ऐसे देश की कल्पना करते हैं जहाँ लोग अपनी पहचान से पहले इंसान हों, जहाँ अलग-अलग धर्मों के लोग साथ रहें, साथ चलें और एक-दूसरे के साथ सम्मान से पेश आएँ.

वकील अहमद के लिए भारत की तस्वीर इससे अलग नहीं है. उनके शब्दों में, एक अच्छा इंसान वही होता है जो दूसरे के भले के बारे में सोचे-बिना यह देखे कि वह कौन है और कहां से आया है.

बात के अंत में दीपक कहते हैं कि यह मुलाक़ात यहीं ख़त्म नहीं होगी. जब भी वह उस रास्ते से गुज़रेंगे, वकील अहमद से मिलना उनकी प्राथमिकता रहेगी. वह कहते हैं कि बुज़ुर्गों का आशीर्वाद ज़िंदगी की सबसे बड़ी पूँजी होती है.

साझा उम्मीद

'मोहम्मद दीपक' और वकील अहमद

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इमेज कैप्शन, दीपक कहते हैं कि 'बुज़ुर्गों का आशीर्वाद ज़िंदगी की सबसे बड़ी ताक़त है.'

दीपक मज़ाक में अपने "जिम लवर" होने की बात करते हुए कहते हैं- "बाहर से मज़बूत, भीतर से नरम."

वकील अहमद मुस्कुराते हैं और कहते हैं कि दीपक को देखकर उन्हें ऊर्जा मिलती है.

दोनों कहते हैं कि वे आगे भी मिलते रहेंगे.

कोटद्वार की यह मुलाक़ात किसी विवाद का समाधान नहीं, बल्कि एक संकेत है कि शोर के बाद भी संवाद की गुंजाइश बची रहती है.

इस बातचीत की सबसे ख़ास बात यही है कि यह किसी बहस या आरोप की कहानी नहीं है. यह दो लोगों की साझा याद, साझा डर और साझा उम्मीद की कहानी है.

एक जिम ट्रेनर और एक बुज़ुर्ग दुकानदार-जो आज एक साथ बैठकर यह बता रहे हैं कि इंसानियत अब भी ज़िंदा है, बस उसे आवाज़ देने की ज़रूरत है.

पूरा मामला

दीपक कश्यप 26 जनवरी को उस समय चर्चा में आए जब उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो कोटद्वार के पटेल रोड पर बजरंग दल से जुड़े कार्यकर्ताओं से बहस करते दिखाई देते हैं.

गणतंत्र दिवस के दिन कथित तौर पर बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ता कोटद्वार के उस दुकान पर पहुँचे थे, जिसका नाम "बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर" है.

ये लोग 75 वर्षीय वकील अहमद दुकान के नाम से 'बाबा' शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे.

उस समय दीपक के बीच में आने के बाद वो लोग लौट गए लेकिन फिर 31 जनवरी को बजरंग दल से जुड़े दर्जनों लोग कोटद्वार पहुंचे और नारेबाज़ी की.

बाद में पुलिस ने दोनों पक्षों पर एफ़आईआर दर्ज की जिसमें दीपक का भी नाम शामिल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित