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मणिपुर हाई कोर्ट ने मैतेई के एसटी दर्जे पर अपने आदेश में संशोधन की याचिका को स्वीकार किया- प्रेस रिव्यू
द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मणिपुर हाई कोर्ट ने सोमवार को 27 मार्च को दिए अपने विवादित आदेश में संशोधन के लिए दायर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया है.
मणिपुर हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने के लिए कहा था.
अब इस मामले में पाँच जुलाई को अगली सुनवाई होगी. अदालत ने राज्य और केंद्र सरकार को पाँच जुलाई से पहले जवाब दाख़िल करने के लिए भी कहा है.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एमवी मुरलीधरन की बेंच ने मैतेई ट्राइब्स यूनियन (एमटीयू) की तरफ़ से दायर पुनर्विचार याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की है. जस्टिस मुरलीधरन की बेंच ने ही एमटीयू की तरफ़ से दायर मूल याचिका पर 27 मार्च को फ़ैसला दिया था.
हालांकि उस आदेश में अदालत ने कहा था, "प्रथम प्रतिवादी याचिकाकर्ताओं के मामले में अनुसूचित जनजाति सूची में मैतेई/मेइतेई समुदाय को शामिल करने के मामले पर शीघ्रता से विचार करेगा. इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख़ से चार सप्ताह की अवधि के भीतर ..."
एमटीयू के एक अधिवक्ता अजय पेबाम ने द हिंदू से कहा, “हम आदेश के एक हिस्से में संशोधन चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है, जो कहता है कि किसी समुदाय को शामिल करना या निकालना संसद या राष्ट्रपति का विशेषाधिकार है. ऐसे में ये निर्देश उसका पालन नहीं करते हैं.”
उन्होंने कहा कि शुरुआत में वो सिर्फ़ राज्य के लिए ये निर्देश चाहते थे कि वो प्रक्रिया का पालन करते हुए केंद्र सरकार को जवाब दे.
मणिपुर में तीन मई के बाद से घाटी में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय और पहाड़ी इलाक़ों में बहुसंख्यक कूकी-ज़ोमी समुदाय के लोगों के बीच नस्लीय हिंसा हो रही है.
तीन मई को हाई कोर्ट के विवादित आदेश के ख़िलाफ़ एक प्रदर्शन हुआ था, जिसके बाद हिंसा शुरू हो गई थी.
इस विवादित आदेश में जस्टिस मुरलीधरन ने मणिपुर की सरकार को केंद्र सरकार के आदिवासी कल्याण मंत्रालय को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग से संबंधित फ़ाइल पर जवाब देने के लिए कहा था.
हाई कोर्ट ने इस बात का उल्लेख किया था कि मैतेई लोगों ने साल 2013 के बाद से केंद्र सरकार से कई बार अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल करने के लिए अनुरोध किया था.
केंद्र सरकार ने इन्हें राज्य सरकार को भेजकर औपचारिक प्रक्रिया का पालन करने के लिए कहा था. हालांकि, मणिपुर की सरकार ने इन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की.
हाई कोर्ट ने मणिपुर सरकार को केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए निर्देशित करने के आदेश में इस बात का भी ज़िक्र किया
इसी बीच 27 मार्च के आदेश के ख़िलाफ़ ऑल मणिपुर ट्राइबल यूनियन (एएमटीयू) ने भी याचिका दायर कर रखी है, जिस पर अगले सप्ताह सुनवाई हो सकती है.
वहीं द हिंदू की एक और रिपोर्ट के मुताबिक सरकार मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाना अंतिम विकल्प होगा.
द हिंदू ने सरकार और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पहले सभी मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल किया जाएगा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना अंतिम विकल्प होगा.
कई संगठनों ने राज्य में सरकार और सुरक्षा बलों पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है. मणिपुर में तीन मई के बाद से लगातार हिंसा हो रही है, जिसमें 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.
कुकी समुदाय से जुड़े विधायकों, जिनमें भाजपा विधायक भी शामिल हैं, ने आरोप लगाया है कि राज्य पुलिस कुकी समुदाय के ख़िलाफ़ हमले कर रही हैं. वहीं मैतेई लोगों का आरोप है कि असम राइफ़ल्स कुकी लड़ाकों की मदद कर रही है.
वहीं बीजेपी मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को पद पर बनाये रखने को लेकर असमंजस में है. इस समय उन्हें पद से हटाने से मैतेई समुदाय और दूर हो जाएगा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की ज़रूरत भी आ जाएगी.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने अख़बार से बातचीत में कहा, “बीरेन सिंह को हटाने से मैतेई समुदाय अपने आप को और दूर महसूस करेगा लेकिन राष्ट्रपति शासन लगाने से केंद्रीय सुरक्षा बल राज्य की कमान संभाल लेंगे. इससे आफ़्सपा को फिर से लागू करने की स्थिति आ जाएगी. केंद्र सरकार ने मणिपुर समेत पूर्वोत्तर राज्यों के कई ज़िलों से इस क़ानून को हटाने के लिए काफ़ी मेहनत की है.”
पाकिस्तान से लेकर कनाडा तक, एक महीने में तीन अलगाववादी नेताओं की मौत
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बीते एक महीने से कुछ अधिक वक़्त में तीन खालिस्तानी अलगाववादी नेताओं की अलग-अलग देशों में हत्या का ब्यौरा दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ खालिस्तान टाइगर फ़ोर्स के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा के सरे इलाक़े में हत्या कर दी गई. एक महीने से दिन अधिक वक़्त के भीतर ये तीसरे वांछित नेता हैं जिनकी हत्या हुई है.
खालिस्तान टाइगर फ़ोर्स के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा के सरे में गुरुद्वारे के पास हत्या की गई.
इससे पहले 6 मई को खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के प्रमुख परमजीत सिंह पंजवार उर्फ़ मलिक सरदार सिंह की पाकिस्तान के लाहौर में उनके घर के बाहर टहलते समय हत्या कर दी गई थी. पंजवार को अज्ञात हमलावरों ने गोली मारी थी.
63 वर्षीय पंजवार को भारत सरकार ने यूएपीए के तहत ‘आतंकवादी’ घोषित किया था.
पंजाब के तरण तारण ज़िले के पंजवार गांव में पैदा हुए परमजीत सिंह पंजवार लाहौर में रहते थे और वहीं से अपने प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियां चला रहे थे.
पिछले सप्ताह ब्रिटेन के बर्मिंघम के एक अस्पताल में अवतार सिंह खांडा की मौत हो गई थी. अवतार सिंह खांडा ने लंदन में भारतीय दूतावास पर तोड़फोड़ का नेतृत्व किया था और भारत में वारिस पंजाब दे के नेता अमृतपाल सिंह की भी मदद कर रहे थे.
वहीं जनवरी 2020 में हरमीत सिंह उर्फ़ हैप्पी पीएचडी की लाहौर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. भारतीय जांच एजेंसियों का कहना था कि वो खालिस्तान लिब्रेशन फ़ोर्स के मॉड्यूल को भारत और खाड़ी देशों में ट्रेनिंग देने में अहम भूमिका निभाते थे.
सेक्स ना करना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता हैः कर्नाटक हाई कोर्ट
कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही के अपने एक आदेश में कहा है कि पति का सेक्स ना करना हिंदू विवाह अधिनियम- 1955 के तहत क्रूरता है लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत क्रूरता नहीं माना जाएगा.
हाई कोर्ट ने पत्नी की तरफ़ से पति और उसके परिजनों के ख़िलाफ़ 2020 में दायर आपराधिक मामले को भी ख़ारिज कर दिया.
पति ने आईपीसी की धारा 498ए और दहेज रोकथाम अधिनियम 1961 की धाराणों के तहत दायर चार्जशीट के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी.
द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ जस्टिस एम नागाप्रसन्ना ने कहा कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ सिर्फ़ यही आरोप है कि वो एक ख़ास आध्यात्मिक विचारधारा को मानते हैं और उनका विश्वास है कि प्रेम शारीरिक संपर्क से नहीं बल्कि आत्मा के संपर्क से होता है.
अदालत ने कहा कि उन्होंने कभी अपनी पत्नी के साथ सेक्स करने की इच्छा ज़ाहिर नहीं की जो कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 12(1)(ए) के तहत बेशक क्रूरता है क्योंकि शादी प्रभाव में ही नहीं आई. लेकिन इसे आईपीसी की धारा 498ए के तहत परिभाषित क्रूरता नहीं माना जाएगा.
याचिकाकर्ता की शादी दिसंबर 2019 में हुई थी. इस मामले में पत्नी ससुराल में सिर्फ़ 28 दिन रही थी और फ़रवरी 2020 में उसने आईपीसी 498ए और दहेज़ क़ानून के तहत मुक़दमा कर दिया था. महिला ने फैमिली कोर्ट में भी शादी को क्रूरता के आधार पर रद्द करने का आवेदन दिया था. नवंबर 2022 में शादी को रद्द कर दिया गया था. महिला ने आपराधिक मामले की कार्रवाई को जारी रखने का फ़ैसला लिया था.
अदानी की बहू और उनके पिता की फ़र्म को लेकर उठ रहे सवाल
द टेलीग्राफ़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के चर्चित कारोबारी गौतम अदानी की बहू और उनके पिता की प्रतिष्ठित लॉ फर्म को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
गौतम अदानी के बड़े बेटे करण अदानी की पत्नी परिधि अदानी और उनके पिता की लॉ फ़र्म सिरील अमरचंद मंगलदास से लेनदेन सवालों के घेरे में है. परिधि इसी फर्म में काम करती हैं.
सोमवार को हिंडनबर्ग रिसर्च के संस्थापक नेट एंडरसन ने एक ट्वीट में सवाल उठाया था कि अदानी समूह के लेनदेन को क्लीनचिट देने वाली अज्ञात ला फर्म क्या सिरील अमरचंद मंगलदास है.
आरोप है कि अदानी समूह ने इस लॉ फर्म के साथ अपने लेनदेन को घोषित नहीं किया.
अदानी समूह का मानना है कि ये सवाल ग़ैरज़रूरी, अप्रसांगिक और अनियमित हैं और उन्होंने संकेत दिया है कि इस तरह के प्रकटीकरण की कोई ज़रूरत ही नहीं ती क्योंकि परिधि की शादी भले ही करण अदानी से हुई हो, वो अदानी समूह में किसी भी अधिकारिक पद पर नहीं हैं.
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