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ट्रंप की पीएम मोदी से 'दोस्ती' सिर्फ़ नाम की है या काम की भी?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
डोनाल्ड ट्रंप पीएम मोदी को अपना दोस्त बताते हैं. पीएम मोदी भी ट्रंप को अपना दोस्त बताते हैं.
क़रीब डेढ़ महीने पहले सितंबर में पीएम मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के बुलावे पर क्वॉड समिट में शामिल होने अमेरिका गए थे तब ट्रंप ने कहा था कि पीएम मोदी से उनकी मुलाक़ात होगी.
तब ट्रंप चुनावी अभियान चला रहे थे. हालांकि पीएम मोदी ट्रंप से बिना मिले भारत आ गए थे. 17 सितंबर को मिशिगन के फ्लिंट में एक टाउनहॉल के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार ट्रंप ने कहा था, ''अगले हफ़्ते मोदी अमेरिका आ रहे हैं और उनसे मुलाक़ात होगी. वह शानदार व्यक्ति हैं.''
अपने चुनावी अभियान के दौरान ट्रंप ने पीएम मोदी का कई बार नाम लिया और उनके नेतृत्व की जमकर तारीफ़ की. छह नवंबर को ट्रंप ने जब चुनाव में बढ़त हासिल कर ली तभी पीएम मोदी ने उनको जीत की बधाई दोस्त के संबोधन के साथ दी थी.
सितंबर 2019 में ट्रंप और मोदी की 'दोस्ती' ह्यूस्टन में हाउडी मोदी कार्यक्रम में देखने लायक थी. तब ट्रंप और मोदी दोनों ने क़रीब 50 हज़ार भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों को संबोधित किया था.
इसी कार्यक्रम में पीएम मोदी ने 'अबकी बार ट्रंप सरकार' का नारा दिया था. इसके बाद 2020 में मोदी के गृह राज्य गुजरात के अहमदाबाद में 'नमस्ते ट्रंप' कार्यक्रम हुआ. इसमें ट्रंप भी आए थे. मोदी को ट्रंप बेहतरीन शख़्स और दोस्त कई मौक़ों पर कह चुके हैं.
ट्रंप की शिकायतें
नरेंद्र मोदी को ट्रंप दोस्त कहते हैं लेकिन साथ में भारत की नीतियों पर तीखा हमला भी बोलते हैं.
ट्रंप कई बार शिकायत कर चुके हैं कि भारत अमेरिकी सामानों पर टैक्स लगाता है और ख़ुद अमेरिका में निर्यात करता है तो टैक्स फ्री चाहता है.
17 सितंबर को ट्रंप ने कहा था, ''इंडिया बहुत मुश्किल है. ब्राज़ील भी बहुत मुश्किल है. मैं आप सभी से यह बात कह सकता हूँ.''
जुलाई 2024 में ट्रंप ने एक चुनावी रैली में कहा था, ''अगर आप चीन में कुछ बनाना चाहते हैं तो वो चाहेंगे कि हम चीज़ें यहां बनाएं और वहां भेजें. फिर वो आप पर 250 फ़ीसदी टैरिफ लगाएंगे. हम ये नहीं चाहते. फिर आपको निमंत्रण मिलता है कि आइए अपना प्लांट लगाइए. फिर ये कंपनियां वहां जाती हैं.''
ट्रंप ने कहा, ''हार्ले डेविडसन के साथ भारत ने भी यही किया. हार्ले डेविडसन 200 फ़ीसदी टैरिफ लगाए जाने के कारण अपनी बाइक वहाँ नहीं बेच पाई.''
ट्रंप भारत से रक्षा संबंधों को लेकर स्पष्ट हैं. ट्रंप चाहते हैं कि भारत से रक्षा साझेदारी बढ़े लेकिन वो कारोबारी संबंध और इमिग्रेशन को लेकर भारत पर हमलावर रहे हैं.
ट्रंप की 'अमेरिका फ़र्स्ट' पॉलिसी मोदी से दोस्ती के दायरे को सीमित करती है. इसी पॉलिसी के तहत ट्रंप अमेरिका में भारत के आईटी, फार्मा और टेक्सटाइल निर्यात पर टैरिफ़ लगा सकते हैं.
ट्रंप पहले ही भारत को टैरिफ किंग कह चुके हैं. ट्रंप चाहते हैं कि उनके सामान पर भारत जितना टैक्स लगाता है, अमेरिका भी उतना ही लगाएगा.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. अमेरिका भारत के बड़े कारोबारी साझेदारों में एकमात्र देश है, जिससे भारत का व्यापार घाटा नहीं है. यानी भारत अमेरिका में अपना सामान बेचता ज़्यादा है और ख़रीदता कम है.
भारत-अमेरिका व्यापार
2022 में भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय व्यापार 191.8 अरब डॉलर का था. भारत ने 118 अरब डॉलर का निर्यात किया था और आयात 73 अरब डॉलर का था. यानी भारत का 2022 में 45.7 अरब डॉलर सरप्लस व्यापार था.
लेकिन ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी के तहत भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ लगाया तो चीज़ें बदलेंगी.
भारत के पूर्व विदेश सचिव और रूस में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल से पूछा कि ट्रंप मोदी को अपना दोस्त कहते हैं लेकिन यह दोस्ती दायरे से बाहर की है या इसकी भी कोई हद है?
कंवल सिब्बल कहते हैं, ''दोस्ती आपसी हितों से जुड़ी होती है. ये हित जब तक पूरे होते हैं, तब तक सीमाओं से परे होती है. लेकिन हित टकराते हैं तो उसकी हद समझ में आ जाती है.''
सिब्बल कहते हैं, ''अमेरिका भारत पर टैरिफ के मामले में बराबरी कैसे कर सकता है? अमेरिका मुक्त व्यापार की बात तभी करता है, जब वह इस गेम में शीर्ष पर होता है. अभी यह मामला संरक्षणवादी का नहीं है. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जो डॉलर के ज़रिए वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर कंट्रोल रखती है, वो भारत से बराबरी की मांग कैसे कर सकती है? अमेरिका के लिए समस्या चीन है न कि भारत.''
सिब्बल कहते हैं, ''कुछ मामलों में ट्रंप का रुख़ मोदी के लिए अच्छा होगा. यहां दोनों की दोस्ती मज़बूत रहेगी. जैसे भारत की आंतरिक राजनीति में ट्रंप दख़ल नहीं देंगे. यानी मानवाधिकार, धार्मिक बराबरी और लोकतंत्र का बहाना लगाकर ट्रंप बाइडन प्रशासन की तरह नहीं बोलेंगे. हिन्दुत्व की राजनीति पर ट्रंप कुछ नहीं कहेंगे. हालांकि अमेरिकी कांग्रेस के नियंत्रण में काम करने वाली एजेंसियों पर ट्रंप भी लगाम नहीं लगा पाएंगे.''
'रूस से दुश्मनी और चीन की उपेक्षा'
भारत के विश्लेषक इस बात को अक्सर रेखांकित करते रहे हैं कि अमेरिका रूस से दुश्मनी निभाने के चक्कर में चीन के ख़तरों की उपेक्षा कर रहा है.
कई विश्लेषक इस बात को कहते हैं कि अमेरिकी नीतियों के कारण रूस और चीन की क़रीबी बढ़ रही है.
ब्रह्मा चेलानी सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने ट्रंप की जीत के बाद अंग्रेज़ी पत्रिका ओपन में लिखा है, ''ट्रंप प्रशासन इस बात की उपेक्षा नहीं कर पाएगा कि पश्चिम के हितों और अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था को असली ख़तरा चीन से है न कि रूस से. ऐसा इसलिए है कि रूस अपने पड़ोसियों तक सीमित है जबकि चीन अमेरिका की जगह लेना चाहता है.''
''चीन की अर्थव्यवस्था उसकी आबादी की तरह रूस से दस गुना बड़ी है. चीन का सैन्य बजट भी रूस से चार गुना ज़्यादा है.चीन अपने परमाणु हथियार बढ़ा रहा है. सैन्य गतिविधियों का विस्तार कर रहा है. लेकिन बाइडन प्रशासन ग़लत दुश्मन पर फोकस करता रहा.''
ब्रह्मा चेलानी ने लिखा है, ''यूक्रेन पर हमले के बाद रूस के ख़िलाफ़ बाइडन की सख़्ती का सीधा फ़ायदा चीन को पहुँचा है. अमेरिका ने रूस पर कड़े से कड़े प्रतिबंध लगाए. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को हथियार बनाया. यह चीन के लिए वरदान साबित हुआ क्योंकि मजबूरी में रूसी बैंकों ने चीनी मुद्रा युआन का अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल बढ़ा दिया. रूस अब ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय व्यापार युआन में कर रहा है. रूस सारे युआन चीनी बैंकों में रख रहा है और इसका फ़ायदा चीन को मिल रहा है.''
'दोस्ती पर्सनल कनेक्ट के लिए'
ब्रह्मा चेलानी को लगता है कि ट्रंप इस मामले में अलग रुख़ अपनाएंगे और रूस के बदले चीन पर फोकस करेंगे. अगर ऐसा होता है तो यह भारत के भी हक़ में होगा क्योंकि भारत और रूस की बढ़ती क़रीबी पर बाइडन प्रशासन की तरह ट्रंप प्रशासन का दबाव नहीं होगा.
लंदन के किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर रहे हर्ष पंत कहते हैं कि किसी को दोस्त कहना ये पर्सनल कनेक्ट बनाने के लिए ज़्यादा होता.
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, ''अगर कोई किसी को दोस्त कहता है तो इसका मतलब ये नहीं है कि नीतिगत मामलों में कोई छूट मिलने जा रही है. मोदी जी की डिप्लोमैसी की अपनी स्टाइल है कि वो पर्सनल कनेक्ट बनाते हैं और कई बार यह तरीक़ा काम भी करता है.''
पंत कहते हैं, ''जहाँ तक ट्रंप की बात है तो वो दुनिया के नेताओं को पसंद और नापसंद करने के मामले में बिल्कुल स्पष्ट हैं. दुनिया के जिन नेताओं को वो पसंद करते हैं, उनमें नरेंद्र मोदी भी हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ट्रंप मोदी के लिए अपना हित छोड़ देंगे.''
''ट्रेड और इमिग्रेशन के मामले में ट्रंप का रुख़ भारत के प्रति सख़्त ही रहेगा. एक बात ज़रूर है कि भारत की राजनीति में क्या हो रहा है, इससे उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. लेकिन अगर भारत में ईसाइयों को लेकर कुछ होता है तो ट्रंप इस पर मुखर रहेंगे क्योंकि उन्हें भी अपने देशों में ईसाई बहुसंख्यक जनता की भावनाओं का ख़्याल रखना है.''
साल 2019 के जुलाई महीने में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अमेरिका के दौरे पर थे.
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में इमरान ख़ान की आगवानी कर रहे थे.
उसी दौरान ट्रंप ने कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही थी. ऐसा दशकों बाद हुआ था, जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही थी.
ट्रंप ने यहाँ तक दावा कर दिया था कि पीएम मोदी भी चाहते हैं कि वो कश्मीर पर मध्यस्थता करें. भारत ने ट्रंप के दावे को ख़ारिज कर दिया था और कहा था कि पीएम मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ भी नहीं कहा था.
पाकिस्तान ने ट्रंप के इस बयान का स्वागत किया था जबकि भारत के लिए यह असहज करने वाला था. भारत की आधिकारिक लाइन है कि कश्मीर पर किसी की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं करेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित