सुनील छेत्री: भारतीय फ़ुटबॉल के ‘कैप्टन फेंटास्टिक’ होंगे रिटायर, छह जून को खेलेंगे आख़िरी मैच

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय फ़ुटबॉल के पोस्टर बॉय सुनील छेत्री ने अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल से अलविदा कहने की घोषणा कर दी है. वह आख़िरी बार फ़ीफ़ा विश्व कप क्वॉलिफ़िकेशन मैच में छह जून को कुवैत के ख़िलाफ़ खेलते नज़र आएंगे.
भारतीय टीम इस समय दूसरे राउंड की अंक तालिका में दूसरे स्थान पर है. वह अगर अपनी टीम को तीसरे राउंड में स्थान दिला सकें तो यह उनके करियर की बड़ी सौगात हो सकती है.
सुनील छेत्री ने सोशल मीडिया पर 10 मिनट का वीडियो जारी करके अपने रिटायरमेंट का एलान किया है.
इसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने रिटारमेंट की सबसे पहले जानकारी अपने माता-पिता और पत्नि को दी. इस समाचार को सुनकर पिता तो ख़ुश थे पर माता और पत्नि रोने लगे.
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सुनील ने कहा कि "मैंने माता और पत्नि के रोने पर कहा कि अब मैं भारत के लिए कभी नहीं खेलूंगा, तो वह दोनों रो क्यों रही हैं."
असल में सुनील जब भी भारत के लिए खेलते थे, तो वह दोनों दबाव महसूस करतीं थीं. इस पर ही सुनील का कहना था कि अब उनके ऊपर कोई दबाव नहीं रहेगा.
फ़ुटबॉल सुनील के ख़ून में

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छेत्री के संन्यास की घोषणा पर फ़ीफ़ा ने एक्स पर रोनाल्डो और मेसी के साथ उनकी फ़ोटो लगाई और लिखा- रिटायरिंग एज़ अ लेजेंड
भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ फ़ुटबॉलरों में शुमार किए जाने वाले सुनील छेत्री का जन्म तीन अगस्त 1984 को सिकंदराबाद में हुआ था और ज़्यादातर बचपन दार्जिलिंग में बीता है.
पिता केबी छेत्री सेना की इलेक्ट्रिकल और मैकेनल कोर में अधिकारी थे और सेना की फ़ुटबॉल टीम में खेला करते थे. वहीं माता सुशीला भी अपनी जुड़वा बहन के साथ नेपाल की राष्ट्रीय महिला फ़ुटबॉल टीम में खेली थीं. इस कारण फ़ुटबॉल सुनील के ख़ून में ही समाई है.
यही वजह है कि वह बहुत ही छोटी उम्र में फ़ुटबॉल खेलने लगे और दार्जिलिंग के बेथनी स्कूल में पढ़ने के दौरान ही टूर्नामेंटों में खेलने लगे थे. पर सुनील के करियर को सही दिशा 2002 में मोहन बागान क्लब से जुड़ने पर ही मिली.
पिता के सेना में होने की वजह से जगह-जगह पोस्टिंग होने की वजह से फ़ुटबॉल में कई क्लबों से खेलने की वजह से वह पांच भाषाओं को बोलने की महारत रखते हैं.
वह इंग्लिश, हिंदी, बंगाली, नेपाल और कन्नड़ बोल लेते हैं. इसके अलावा तेलुगू, मराठी और कोंकणी को समझ लेते हैं.

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चाहत थी, बेटा खेलते देखे
सुनील छेत्री ने कहा है कि "मैं चाहता था कि मेरा बेटा मुझे मैदान पर खेलते देखे. बेटे को पता होना चाहिए कि उसके पिता का करियर क्या रहा है."
साथ ही सुनील अपने को बहुत किस्मतवाले और मेहनती फ़ुटबॉलर मानते हैं.
सुनील के बेटे का पिछले साल ही अगस्त में जन्म हुआ है और उन्होंने उसका नाम ध्रुव रखा है. बहुत संभव है कि उनकी पत्नि सोनम भट्टाचार्य अपने बेटे को पापा का मैच दिखाने ले भी गई हों पर वह इतना छोटा है कि उसे पापा के मैच को लेकर कुछ भी याद रहने वाला नहीं है.
सुनील ने पूर्व अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉलर सुब्रत भट्टाचार्य की पुत्री सोनम से 2017 में शादी की थी.
भारत के लिए सबसे ज़्यादा मैच खेलने वाले
सुनील छेत्री भारत के लिए सबसे ज़्यादा 150 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले खिलाड़ी हैं.
हालांकि उनका 150वां मैच यादगार नहीं बन सका. यह मैच अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ फ़ीफ़ा विश्व कप क्वालिफायर का था, जिसमें वह गोल जमाने में तो सफल रहे. पर अफ़ग़ानिस्तान ने आख़िरी समय में गोल जमाकर भारत को हरा दिया था. इस हार की वजह से यह मैच यादगार नहीं बन सका.
सुनील छेत्री 150 मैचों में 98 अंतरराष्ट्रीय गोल जमाकर इस मामले में दुनिया में चौथें नंबर पर हैं.
अंतरराष्ट्रीय मैचों में राष्ट्रीय टीम के लिए गोल जमाने के मामले में वह क्रिस्टियानो रोनाल्डो, अली डेई और लियोनल मेसी से ही पीछे हैं.

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मेजर लीग खेलने वाले पहले भारतीय
अमेरिकी क्लब कंसास सिटी विज़ार्ड ने 2010-11 मेजर लीग सीज़न के लिए सुनील छेत्री से क़रार किया.
इस लीग में खेलने वो वह पहले भारतीय फु़टबॉलर हैं. प्रोफे़शनल लीग में तो इससे पहले बाईचुंग भूटिया खेल चुके थे. सुनील को मेजर लीग में सिर्फ़ एक मैच खेलने का ही मौक़ा मिल सका.
विज़ार्ड के मुख्य कोच पीटर वेरमी ने सुनील के बारे में कहा था कि मुझे उसका क्राफ्टी होना बेहद पसंद है. वह तकनीकी रूप से बहुत मज़बूत है और उसके हमले बोलने का अंदाज़ अच्छा लगता है.
हालांकि वह दुर्भाग्यवश इंग्लिश लीग चैंपियनशिप खेलते-खेलते रह गए थे. यह बात है 2009 की, जब उन्होंने क्वींस पार्क रेंजर्स से तीन साल का क़रार किया. पर ब्रिटेन सरकार से वर्क परमिट नहीं मिल पाने की वजह से वह नहीं खेल सके थे.
इसकी वजह भारत का उस समय फ़ीफ़ा रैंकिंग में टॉप 70 टीमों में शामिल नहीं होना था. सही मायनों में देश की फु़टबॉल की खस्ता हालत की उन्हें क़ीमत चुकानी पड़ी थी.

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खेल रत्न पाने वाले पहले फु़टबॉलर
सुनील छेत्री खेल रत्न पाने वाले देश के पहले फु़टबॉलर हैं. उन्हें इस सम्मान से 2021 में नीरज चोपड़ा और मिताली राज के साथ नवाज़ा गया था. यह भारतीय खेलों में सर्वोच्च सम्मान है. इसके अलावा उन्हें 2019 में पद्मश्री और 2011 में अर्जुन अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया.
सुनील को सबसे ज़्यादा बार एआईएफ़एफ़ प्लेयर ऑफ द ईयर अवॉर्ड पाने का गौरव हासिल है. उन्होंने सात बार- 2007, 2011, 2013, 2014, 2017, 2019 और 2022 में यह सम्मान मिला है.
आईएम विजयन ने तीन बार, बाई चुंग भूटिया और जो पाल अंचेरी को दो-दो बार यह सम्मान मिला है.
वह 2007, 2011 और 2012 में तीन बार नेहरू कप जीतने वाली भारतीय टीम में शामिल रहे हैं. यही नहीं उन्होंने 2008 में एएफ़सी चैलेंज कप और 2017 में इंटर कॉन्टिनेंटल कप जिताने में भी अहम भूमिका निभाई है.

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फ़ीफ़ा ने डाक्यूमेंट्री बनाकर सराहा
सुनील छेत्री के लगभग दो दशक लंबे करियर में फु़टबॉल को दिए योगदान को फ़ीफ़ा ने 27 सितम्बर 2022 को उनके ऊपर डाक्यूमेंट्री बनाकर सराहा है.
इस डॉक्यूमेंट्री का नाम है- कैप्टन फेंटास्टिक. इसमें उनके शुरुआती दिनों, प्यार की कहानी और करियर को दर्शाया गया है.
इसी तरह 2018 में उनकी 34वीं वषर्गांठ के मौके पर एशियाई फु़टबॉल फ़ेडरेशन ने उन्हें 'एशियन आइकॉन' के सम्मान से नवाज़ा था.
इस अवसर में एएफ़सी ने लिखा था कि रोनाल्डो और मेसी के युग में टॉप तीन गोल जमाने वालों में शामिल रहना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है.
साथी खिलाड़ी वेंकटेश की राय में
वेंकटेश ऐसे फु़टबॉलर हैं, जिनकी कप्तानी में सुनील छेत्री खेले हैं.
वह कहते हैं कि उनके खेल की सबसे ख़ूबसूरती दोनों पैरों से सहज होकर खेलना है और यह ख़ूबी मैंने किसी खिलाड़ी में लंबे समय बाद देखी.
वेंकटेश कहते हैं कि सुनील बहुत ही मेहनती खिलाड़ी है. वह सिर्फ अच्छे गोल जमाने वाला ही खिलाड़ी नहीं है बल्कि गोल के मौके बनाकर भी देता है. उसकी एक बड़ी खूबी यह भी है कि वह तीन पोजिशन पर खेलने की क्षमता रखता है.
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