कोरोना काल में दिल्ली से छतरपुर जा रहे जिस मज़दूर की बीबीसी संवाददाता ने की मदद, आज वो कहां है?

    • Author, विष्णुकांत तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते मार्च 2020 में देशभर में लॉकडाउन की घोषणा हो चुकी थी. रोज़गार से वंचित, भूख और ग़रीबी से जूझते लाखों मज़दूर अपने गांव लौटने के लिए मजबूर हो गए थे.

इसी दौरान हरियाणा के अंबाला से लौट रहे मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के दिहाड़ी मज़दूर कैलाश अहिरवार और उनके परिवार की मुलाक़ात बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से हुई थी.

रिपोर्टिंग के दौरान सलमान रावी ने लगातार छह दिन से अपने तीन बच्चों के साथ पैदल छतरपुर जा रहे कैलाश की मदद की थी. कोरोना काल के इस भयावह दृश्य को गुज़रे आज पांच साल हो चुके हैं.

बीबीसी की टीम ने एक बार फिर कैलाश अहिरवार से मुलाक़ात की. छतरपुर ज़िले से 25 किलोमीटर दूर करकी गांव में अपने कच्चे घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे कैलाश उस समय को याद कर सिहर उठते हैं.

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'पैसे ख़त्म हो गए, भूख से बेहाल होकर पैदल चल पड़े'

कैलाश बताते हैं, "हमें अंबाला गए 10-15 दिन ही हुए थे कि लॉकडाउन लग गया. हमने जैसे-तैसे एक महीना गुज़ारा, लेकिन पैसे ख़त्म हो गए. एक समय का खाना जुटाना मुश्किल हो गया. तीन छोटे बच्चे थे, और गांव में बूढ़े मां-बाप परेशान थे. मजबूरी में हमने पैदल ही घर लौटने का फ़ैसला किया."

कैलाश और उनकी पत्नी सरोज 2019 में बेहतर ज़िंदगी की आस में अपने तीन बच्चों के साथ हरियाणा के अंबाला मज़दूरी करने गए थे.

जब हालात बिगड़े, तो कैलाश ने अपने छह महीने, दो साल और चार साल के बच्चों को लेकर पैदल ही घर लौटने का सफ़र शुरू किया.

छह दिन तक जंगल के रास्ते चलते हुए, यह परिवार दिल्ली से सटे फरीदाबाद पहुंचा. इस दौरान उन्होंने करीब 250 किलोमीटर पैदल चलकर कई मुश्किलों का सामना किया.

'पैरों में छाले पड़ गए, बच्चों को मारकर चुप कराना पड़ा'

सरोज अहिरवार बताती हैं, "हम घरवालों की ज़िद पर लौटने के लिए निकले थे. सब कहते थे, भूखे भी रहोगे तो गांव में सुरक्षित रहोगे. रास्ते में सभी के पैरों में छाले पड़ गए थे."

"बच्चों के पैर सूज गए थे. कई बार तो बच्चे इतनी बुरी तरह थक जाते थे कि चलने से इनकार कर देते. ग़ुस्से में हम उन्हें डांटते या मारकर चुप कराते."

सरोज ने आगे कहा, "खाना न मिलने से मैं अपने छह महीने के बेटे को दूध तक नहीं पिला पा रही थी. कई बार उसे रोने पर पीटकर ही शांत कराना पड़ता."

कैलाश याद करते हुए बताते हैं, "हम सभी दिल्ली पहुंचे ही थे कि बीबीसी के एक संवाददाता सलमान रावी मिले."

"उन्होंने मेरे साथ चल रहे एक मज़दूर को अपने जूते दिए और मुझे पैसे भी दिए. उन्होंने हमारे ठहरने का इंतज़ाम किया और एमपी के छतरपुर पहुंचने के लिए वाहन की व्यवस्था करवाई."

'अब कभी बाहर काम करने का इरादा नहीं'

कोरोना काल के अनुभवों के बाद कैलाश और सरोज का कहना है कि वे अब कभी गांव से बाहर काम करने नहीं जाएंगे.

उन्हें डर है कि फिर से वैसी स्थिति का सामना न करना पड़े.

आज कैलाश और उनका परिवार अपने गांव करकी में रहता है. कैलाश खेती और मज़दूरी करते हैं. उनकी पत्नी सरोज कभी-कभी मज़दूरी में मदद करती हैं. बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं.

सरोज कहती हैं, "जो भी है, अब हम उसी में ख़ुश हैं. बेहतर ज़िंदगी की तलाश में बाहर गए थे, लेकिन कोरोना वायरस और लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया."

'सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं, फिर भी गांव में सुरक्षित'

हालांकि, कैलाश और सरोज अब गांव में सुरक्षित हैं, लेकिन उनका आरोप है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला.

कैलाश आरोप लगाते हैं कि उनके घर में अब तक शौचालय नहीं है, न ही उज्ज्वला योजना या प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उन्हें मिला है.

उज्ज्वला योजना के अंतर्गत सरकार ग़रीब महिलाओं को मुफ्त एलपीजी गैस कनेक्शन सहित कई मौकों पर मुफ्त सिलेंडर भी देती है.

वहीं खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए गांवों में सभी को शौचालय बनवाने के लिए सरकार अनुदान राशि भी देती है.

छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने बीबीसी से कहा कि, "हमारे पास अभी ऐसी जानकारी नहीं है. आप साझा करेंगे तो हर संभव मदद की जाएगी".

फिर भी, कैलाश और सरोज इस बात से संतुष्ट हैं कि उनके बच्चे और वे खुद सही-सलामत हैं.

चीन के वुहान में मिला था पहला कोरोना वायरस

2019 के आख़िर में चीन ने अपने शहर वुहान में कोरोना वायरस के फैलने की जानकारी दी थी.

भारत में कोविड-19 का पहला मामला 30 जनवरी 2020 को सामने आया था. उस वक्त चीन के वुहान से केरल की एक मेडिकल छात्रा वापस अपने घर लौटकर आई थी और उसमें कोविड-19 की पुष्टि हुई थी.

कोरोना वायरस के फैलने की खबरें आने के साथ ही भारत शुरुआत में ही यानी जनवरी मध्य से ही इसे लेकर सतर्क हो गया था. इसके बाद सरकार ने तुरंत ही ट्रैवल एडवाइज़री जारी करना और पाबंदियां लगाना शुरू कर दिया.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 11 मार्च 2020 को महामारी घोषित किया, जिसके बाद इससे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर विशेष तैयारियां की जाने लगीं.

22 मार्च को भारत में लगा पहला जनता कर्फ्यू

केंद्र सरकार ने लॉकडाउन का टेस्ट रन करने के लिए 22 मार्च को सुबह 7 बजे से लेकर रात 9 बजे तक के लिए जनता कर्फ्यू लगा दिया. उस वक्त भारत में कोविड-19 के महज़ 500 मामले आए थे और 10 से भी कम मौतें हुई थीं.

इसके बाद 25 मार्च से शुरू हुआ लॉकडाउन एक के बाद एक चार चरणों के ज़रिए 31 मई तक के लिए पूरे देश में लागू रहा. कोविड के दौरान अचानक लॉकडाउन लगने से ज़रूरी सामान की कमी हो गई और सभी तरह का कामकाज ठप पड़ गया.

सरकार ने इसके लिए सरकार ने पका खाना बांटने, घर-घर राशन पहुंचाने, गाड़ियों को स्पेशल परमिट देने जैसी विशेष तैयारियां तो की, लेकिन इस दौरान राजधानी से मज़दूरों का जो पलायन शुरू हुआ, उसे रोकने के लिए ये तैयारियां नाकाफी थीं.

लोग अकेले, या अपने परिवार को लेकर जो गाड़ी मिली उसमें भर-भर कर गांवों के लिए निकलने लगे. कोई साधन न मिला तो, लोग पैदल या साइकिल पर ही गांव के लिए निकलने लगे. इस तरह की कई कहानियां उस दौरान मीडिया में छाई रहीं.

500 रुपये तक बिक रहा था एन95 मास्क

कोरोना का असर इतना घातक रहा कि उस वक्त एक पीपीई किट 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये की पड़ रही थी. एन95 मास्क का दाम करीब 250-500 रुपये बैठता था. सैनिटाइज़र्स के दाम भी बेहद ज़्यादा थे.

तमाम तैयारियों के बावजूद संक्रमण का आंकड़ा 28 मार्च को 1,000 के पार पहुंच गया था, वहीं 18 मई को संक्रमित लोगों की तादाद 1 लाख को पार कर गई. अहम पड़ाव 16 जुलाई को आया जब देश में संक्रमित लोगों की तादाद 10 लाख को पार कर गई थी.

इसके बाद जून 2020 से देश में अनलॉक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से शुरू हुई और 27 जनवरी 2021 को जारी गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस में तकरीबन सभी पाबंदियां हटा ली गई.

हालांकि उम्रदराज़, बीमारियों का सामना कर रहे लोगों को भी घर ज़रूरी काम होने पर ही बाहर आने-जाने की सलाह दी गई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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