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आतिशी को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर किन चुनौतियों का सामना करना होगा?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“शायद किसी और पार्टी में होती तो चुनाव का टिकट भी ना मिलता, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने मुझे विधायक बनाया, मंत्री बनाया और आज मुख्यमंत्री बनने की ज़िम्मेदारी दी. मैं ख़ुश हूं कि अरविंद केजरीवाल ने मुझ पर इतना भरोसा किया है, मैं जितनी ख़ुश हूँ उससे कहीं ज़्यादा दुखी हूं क्योंकि आज अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफ़ा दिया है. दिल्ली का एक ही मुख्यमंत्री है और उसका नाम अरविंद केजरीवाल है.”
आतिशी ने दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद अपना पहला बयान इन्हीं शब्दों से शुरू किया.
आतिशी अगर ये कहतीं भी ना, तब भी ये स्पष्ट ही था कि वो अरविंद केजरीवाल के साये में ही काम करेंगी.
आतिशी के इस बयान से कुछ देर पहले आम आदमी पार्टी नेता गोपाल राय ने कहा कि आतिशी को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला मुश्किल हालात में लिया गया है और पार्टी चाहती है कि दिल्ली में अक्तूबर-नवंबर में चुनाव हो जाएं.
यानी दिल्ली की तीसरी महिला मुख्यमंत्री आतिशी के पास काम करने के लिए बहुत अधिक समय नहीं होगा.
चुनावों की घोषणा की स्थिति में वो बमुश्किल दो महीने ही काम कर पाएंगी.
अगर तय समय पर अगले साल फ़रवरी में चुनाव हुए तब भी उनके पास काम करने के लिए लगभग पांच महीनों का ही वक़्त होगा.
आतिशी के सामने आगे कई चुनौतियां होंगी, उनकी सबसे बड़ी चुनौती तो आगामी चुनाव ही होंगे.
दिल्ली विधानसभा चुनाव
अगले कुछ महीनों में दिल्ली में चुनाव होने हैं. ऐसे में आतिशी को ना सिर्फ पार्टी के नेताओं को अपने पीछे खड़ा करना है बल्कि दिल्ली के लोगों के सामने भी ख़ुद को साबित करना है.
आतिशी ने मुख्यमंत्री पद ऐसे समय में संभाला है जब आम आदमी पार्टी क़ानूनी चुनौतियों से जूझ रही है.
कथित शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत पार्टी के कई नेता जेल जा चुके हैं. आम आदमी पार्टी इस समय क़ानूनी लड़ाई में उलझी है.
हालांकि, आतिशी का कथित घोटाले में नाम नहीं है लेकिन इसकी जांच उनकी सरकार और फ़ैसले लेने की क्षमता को प्रभावित कर ही सकती है.
आतिशी की छवि अभी तक साफ़ रही है. मुमकिन है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के पीछे एक बड़ा कारण उनका महिला होना भी हो. विश्लेषक मानते हैं कि आतिशी को बहुत सोच समझकर और राजनीतिक हित देखकर मुख्यमंत्री बनाया गया है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, “आतिशी को सीएम बनाने का एक बड़ा कारण महिलाओं का विश्वास बहाल करना है. स्वाति मालीवाल प्रकरण से आम आदमी पार्टी की छवि को नुक़सान पहुंचा था. उनकी सरकार की प्राथमिकता होगी महिलाओं के लिए कोई योजना लाना और उसे लागू करना.”
गिरफ़्तारी से प्रभावित कामकाज
जानकारों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल के लंबे समय तक जेल में रहने के कारण दिल्ली सरकार का कामकाज भी पटरी से उतर गया था. पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 178 दिन बाद रिहा हुए, इस दौरान वो 156 दिन जेल में रहे और 21 दिन ज़मानत पर.
हेमंत अत्री कहते हैं, “केजरीवाल के जेल में रहने के दौरान सरकार के काम पटरी से उतर गए. अगर फरवरी में भी चुनाव होगा तब भी आतिशी के पास सिर्फ़ पांच महीने ही बचे होंगे. पिछले कुछ सालों में आम आदमी पार्टी की छवि ख़राब की गई है. अगले चार-पांच महीनों में आतिशी की सबसे बड़ी चुनौती होगी सरकार में जनता का विश्वास बहाल करना. ये दिखाना कि आम आदमी पार्टी काम कर सकती है.”
प्रशासन में विश्वास बहाल करने के लिए आतिशी कुछ बड़ी योजनाओं की घोषणा कर सकती हैं.
हेमंत अत्री कहते हैं कि ये संभव है कि जब ऐसी योजनाएं एलजी के पास जाएं तो वे इन्हें रोक दें और अगर ऐसा हुआ तो आम आदमी पार्टी ये कहते हुए जनता के बीच जाएगी कि एक महिला मुख्यमंत्री दिल्ली के लोगों के लिए काम करना चाहती हैं लेकिन बीजेपी उप-राज्यपाल के माध्यम से उन्हें रोक रही है.
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश समेत देश के कई राज्यों की तर्ज़ पर दिल्ली सरकार महिलाओं को आर्थिक मदद देने की योजना ला सकती है.
हेमंत अत्री कहते हैं, “ऐसी योजनाओं को एलजी से पास करा लेना भी आतिशी के लिए आसान नहीं होगा. ये देखना भी दिलचस्प होगा कि मध्य प्रदेश में लाडली योजना लाने वाली बीजेपी दिल्ली में इस तरह की किसी योजना का विरोध कैसे कर पाएगी.”
दिल्ली की दिक्कतें
पिछले कुछ महीनों में दिल्ली में सार्वजनिक सेवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत ख़राब हुई है. राजेंद्र नगर में पानी भरने से सिविल सेवा की तैयारी कर रहे बच्चों की मौत हुई. राजधानी के सीमावर्ती इलाक़ों की सड़कें भी ख़राब हैं.
अब तक आम आदमी पार्टी ये तर्क देती रही थी कि 'हम काम करना चाहते थे, लेकिन हमें काम नहीं करने दिया गया.'
आतिशी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वो राजधानी के सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे बेहतर करें. पीडब्ल्यूडी और एनडीएमसी के साथ सांमजस्य बिठाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.
हेमंत अत्री कहते हैं, “राजधानी का सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर ख़राब हो रहा है. विकास कार्य रुके हुए हैं. आतिशी को ये भी साबित करना होगा कि वो दिवंगत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तरह काम कर सकती हैं और दिल्ली में बड़े पैमाने पर निर्माण कर सकती हैं.”
मंत्री के रूप में दिल्ली के शिक्षा क्षेत्र में आतिशी के काम की तारीफ़ होती रही है. लेकिन दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाएं चुनौतीपूर्ण स्थिति से गुज़र रही हैं. आतिशी के सामने ये चुनौती भी होगी कि वो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जनता की ज़रूरतों को पूरा कर सकें.
आतिशी के पास इस समय 14 मंत्रालय और विभाग हैं इनमें वित्त,शिक्षा और लोक निर्माण जैसे अहम विभाग भी शामिल हैं.
मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारी के साथ इन सभी विभागों को संभालना भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
आतिशी के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन विश्लेषक ये मान रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल बहुत सोच समझकर उन्हें मैदान में लाए हैं.
हेमंत अत्री कहते हैं, “आतिशी साफ़ छवि की नेता हैं, महिला हैं, पढ़ी लिखी हैं और लंबे समय से पार्टी और सरकार के साथ काम कर रही हैं. मौजूदा स्थिति में आतिशी से अच्छा विकल्प केजरीवाल के पास नहीं था. आतिशी को मुख्यमंत्री बनाकर केजरीवाल ने बीजेपी के सामने ऐसा दांव चल दिया है जिसकी काट आसान नहीं होगी.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित