COP28: दुबई में चल रहा जलवायु सम्मेलन क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों हो रहा है?

    • Author, मार्क पॉइंटिंग
    • पदनाम, जलवायु एवं पर्यावरण शोधकर्ता, बीबीसी न्यूज़

जलवायु परिवर्तन पर चर्चा के लिए दुनियाभर के नेता दुबई में हो रहे संयुक्त राष्ट्र के एक बड़े सम्मेलन में हिस्सा लेने जा रहे हैं.

यह सम्मेलन ऐसे वक्त हो रहा है, जब पिछले साल दुनिया के कई हिस्सों में मौसम की भीषण मार देखने को मिली और जलवायु (तापमान, बारिश आदि) से जुड़े कई रिकॉर्ड टूटे हैं.

क्या है COP28?

COP28 जलवायु को लेकर संयुक्त राष्ट्र की 28वीं सालाना बैठक है. इस सालाना बैठक में सरकारें इस बात पर चर्चा करती हैं कि जलवायु परिवर्तन को रोकने और भविष्य में इससे निपटने के लिए क्या तैयारियां की जाएं.

इस बार यह सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दुबई में 30 नवंबर से 12 दिसंबर, 2023 तक आयोजित हो रहा है.

COP का मतलब क्या है?

COP कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ का संक्षिप्त रूप है.

यहां पार्टीज़ का मतलब उन देशों से है, जिन्होंने साल 1992 में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

दुबई में COP28 के आयोजन पर विवाद क्यों है?

यूएई दुनिया के 10 शीर्ष तेल उत्पादकों में शामिल है. उसने अपनी सरकारी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुल्तान अल-ज़ुबैर को COP28 का अध्यक्ष नियुक्त किया है.

गैस और कोयले की ही तरह तेल भी एक जीवाश्म ईंधन है. ये सभी ईंधन जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए इन्हें जलाने पर पृथ्वी को गर्म करने वाली कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसें पैदा होती हैं.

अल-ज़ुबैर की तेल कंपनी जल्द तेल उत्पादन बढ़ाने की योजना भी बना रही है.

बीबीसी को लीक हुए कुछ दस्तावेज़ों से ये संकेत भी मिले हैं कि यूएई ने इस सम्मेलन की मेज़बानी के ज़रिये तेल और गैस को लेकर नए सौदे करने की योजना बनाई है.

अल-ज़ुबैर का कहना था कि तेल और गैस इंडस्ट्री से नाता होने के चलते उनका देश (जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए) क़दम उठाने के लिए विशेष तौर पर सक्षम है.

उनका कहना है कि रीन्यूएबल एनर्जी कंपनी मसदार का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने पवन और सौर ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा की तकनीक के विस्तार पर भी काम किया है.

COP28 क्यों है अहम?

ऐसी उम्मीद है कि COP28 में पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के दीर्घकालिक लक्ष्य को बरक़रार रखा जाएगा. 2015 में पेरिस में हुए समझौते में क़रीब 200 देशों में इसे लेकर सहमति बनी थी.

संयुक्त राष्ट्र में जलवायु पर नज़र रखने वाली संस्था, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार, 1.5 डिग्री सेल्सियस वह अहम लक्ष्य है, जिससे जलवायु परिवर्तन के ख़तरनाक असर को रोका जा सकता है.

इस समय दुनिया का तापमान औद्योगीकरण के दौर से पहले की तुलना में 1.1 या 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. उससे पहले इंसान ने बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन को जलाना शुरू नहीं किया था.

हालांकि, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इस समय दुनिया साल 2100 तक 2.4 से 2.7 डिग्री सेल्सियस गर्म होने की दिशा में बढ़ रही है, हालांकि, अभी पक्के तौर पर सही आंकड़े नहीं दिए जा सकते.

इसी कारण, संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के अंदर बनाए रखने की समयसीमा और कम होती जा रही है.

किन मुद्दों पर होगी चर्चा

पैरिस समझौते में तय किए लक्ष्यों की ओर बढ़ने के साथ-साथ, इस साल इन विषयों पर भी नेताओं का ध्यान रहेगा:

  • 2030 से पहले ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ने में तेज़ी लाना.
  • जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए अमीर देशों की तरफ से ग़रीब देशों को मदद देना और विकासशील देशों के लिए एक नए समझौते पर काम करना
  • प्रकृति और लोगों पर ज़्यादा ध्यान देना
  • इस साल के सम्मेलन को पहले के सम्मेलनों की तुलना में और ज़्यादा समावेशी बनाना

इस सम्मेलन के दौरान कुछ दिन किसी विशेष थीम पर भी केंद्रित रहेंगे, जैसे कि स्वास्थ्य, अर्थ, भोजन और प्रकृति.

कौन-कौन होंगे शामिल

इस सम्मेलन में 200 से ज़्यादा मुल्कों के नेता आमंत्रित किए गए हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसमें सम्मिलित नहीं होंगे, लेकिन दोनों देश अपने प्रतिनिधि भेज रहे हैं.

ब्रिटेन के पीएम ऋषि सुनक इसमें हिस्सा लेंगे. बकिंघम पैलेस ने पुष्टि की है कि किंग चार्ल्स भी दुबई आएंगे. वह एक दिसंबर को संबोधन देंगे.

पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाएं, मानवाधिकार समूह, थिंक टैंक, कारोबारी आदि भी इसमें हिस्सा लेंगे.

2022 में हुए कॉप 27 में जीवाश्म ईंधन से जुड़े कई लोगों ने भी हिस्सा लिया था.

किन मुद्दों पर अटक सकता है मामला?

कोयले, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन को वायुमंडल तक पहुंचने से रोकने की तकनीक का इस्तेमाल किए बिना इनका प्रयोग करने के लिए ‘अनबेटेड फ़ॉसिल फ़्यूल’ शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं. अनबेटेड फ़ॉसिल फ़्यूल के भविष्य को लेकर मुल्कों में असहमति बनी रह सकती है.

ज़ुबैर ने इनके लिए 'फ़ेज़ डाउन' शब्द इस्तेमाल किया है, यानी वह चाहते हैं कि इनका इस्तेमाल पूरी तरह बंद न करके, धीरे-धीरे इनका इस्तेमाल कम दिया जाए. जबकि यूरोपीय संघ चाहता है कि इन्हें 'फ़ेज़ आउट' किया जाए यानी तुरंत इनका इस्तेमाल घटाते हुए पूरी तरह बंद कर दिया जाए.

जलवायु बचाने के लिए अभियान चलाने वालों का कहना है कि अगर सिर्फ़ 'अनबेटेड फ़ॉसिल फ्यूल' पर ही पाबंदियां लगाई जाएंगी, तो भी जीवाश्म ईंधनों का उत्पादन होता रहेगा.

उनका कहना है कि इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि जीवाश्म ईंधनों से होने वाले उत्सर्जन को वायुमंडल में छोड़ने से रोकने का काम बड़े पैमाने पर संभव नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र ने कोयले जैसे अनबेटेड जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटाने की अपील की है.

एक मसला पूंजी का भी है.

जलवायु परिवर्तन को लेकर हुए 27वें सम्मेलन में एक 'लॉस एंड डैमेज' फंड बनाने पर सहमति बनी थी, जिसके तहत अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे ग़रीब देशों को फ़ंड देना था.

लेकिन ऐसा कैसे किया जाएगा, इसे लेकर अब तक कोई स्पष्टता नहीं बनी है. उदाहरण के लिए अमेरिका ने अपने यहां हुए ऐतिहासिक ग्रीनहाउस उत्सर्जन के लिए किसी तरह की रकम देने से इनकार कर दिया था.

2009 में विकसित देशों ने 2020 तक हर साल विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर की मदद देने की प्रतिबद्धता जताई थी, ताकि वे अपने यहां उत्सर्जन घटा सकें और जलवायु परिवर्तन के लिए ख़ुद को तैयार कर सकें. लेकिन 2020 में ऐसा नहीं हो सका, ऐसे में उम्मीद है कि 2023 से यह हो पाएगा.

COP28 से क्या कुछ बदलेगा?

पिछले सम्मेलनों की आलोचना करने वालों, जिनमें एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग भी शामिल हैं, का कहना है कि ये सम्मेलन वास्तव में ‘ग्रीनवॉशिंग’ है यानी इनमें देश और कारोबारी सिर्फ़ अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं लेकिन वास्तव में कोई ठोस क़दम नहीं उठाते.

लेकिन जब दुनियाभर के नेता इस तरह से जुटते हैं तो मुल्क के स्तर पर लिए जा रहे क़दमों से आगे बढ़कर, वैश्विक स्तर पर कुछ किए जाने की संभावना बनती है.

उदाहरण के लिए, यूएन का कहना है कि पेरिस में हुए COP21 में पृथ्वी के तापमान में हुई बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोक रखने पर बनी सहमति से 'जलवायु को लेकर कुछ करने की एक वैश्विक पहल हुई है.'

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