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सुल्तान अल जाबेर जिन्हें लेकर COP28 यूएई में हो रहा है विवाद
- Author, नवीन सिंह खड़का
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
इस साल संयुक्त राष्ट्र के जलवायु शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर हे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने जब जनवरी में सुल्तान अल जाबेर को इस सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में नामित किया, तो दुनिया भर के पर्यावरण कार्यकर्ता नाराज़ हो गए.
वे पहले से ही इस बात को लेकर नाख़ुश थे कि यह सम्मेलन एक पेट्रो-स्टेट यानी कि तेल उत्पादक देश में आयोजित किया जा रहा है. उनकी चिंता इस बात को लेकर थी कि जो शख़्स इस सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे, वह यूएई की सरकारी तेल कंपनी- अबु धाबी नेशनल ऑइल कंपनी (एडीएनओसी या एडनॉक) के प्रमुख हैं.
पेट्रोलियम का निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक का सदस्य यूएई, दुनिया के 10 सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु संकट से निपटना है तो जीवाश्म ईंधनों, जैसे कि तेल, गैस और कोयले से होने वाले उत्सर्जन में तेज़ी से कमी लानी चाहिए.
पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के अनुसार, अल जाबेर के नेतृत्व में, एडनॉक ने साल 2022 में प्रति दिन चार मिलियन बैरल से ज़्यादा तेल का उत्पादन किया, जो 2021 में प्रति दिन क़रीब 3.6 मिलियन बैरल था.
जाबेर ही थे, जिन्होंने कंपनी के रोज़ के तेल उत्पादन को साल 2030 तक पांच मिलियन बैरल तक बढ़ाने के लक्ष्य की मियाद 2030 से घटाकर 2027 कर दी थी.
दोहरी भूमिका
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल में ग्लोबल पॉलिटिकल स्ट्रैटिजी के प्रमुख, हरजीत सिंह कहते हैं, "डॉ. सुल्तान अल जाबेर को तेल उद्योग की एक प्रमुख शख़्सियत होने और COP28 जलवायु सम्मेलन के नेता के रूप में अपनी दोहरी भूमिका के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है."
लेकिन अल जाबेर का कहना है कि फ़ॉसिल फ़्यूल इंडस्ट्री को साथ लिए बिना हम जलवायु संकट से नहीं निपट सकते.
यूएई के एक अमीर, अल जाबेर का जन्म साल 1973 में उम्म अल क़ुवैन में हुआ था. अपने देश में वह कई अहम पद संभाल रहे हैं.
वह शादीशुदा हैं और उनके चार बच्चे हैं. वह यूएई के उद्योग और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी मंत्री भी हैं. साल 2010 से 2016 के बीच वह जलवायु परिवर्तन पर अपने देश के विशेष दूत रहे थे. इस बार वह साल 2020 से यह पद संभाल रहे हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ कैलिफ़ोर्निया से केमिकल एंड पेट्रोलियम इंजिनियरिंग में ग्रैजुएट अल जाबेर यूएई सरकार की रीन्यूएबल एनर्जी कंपनी 'मसदर' के चेयरमैन भी हैं. यह कंपनी 40 से ज़्यादा देशों में सक्रिय है.
2006 में शुरू की गई इस कंपनी ने कुल 15 गीगावॉट क्षमता की सौर और पवन उर्जा परियोजनाओं में निवेश किया है, जिनकी मदद से 19 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रोका जा सकता है.
एडनॉक की तरह ही मसदर भी बड़े लक्ष्य लेकर चल रही है. इसका इरादा 2030 तक 100 गीगावॉट की क्षमता हासिल करने और आने वाले सालों में 200 गीगावॉट का उत्पादन करने का है.
जाबेर ने कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी से बिज़नस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री हासिल की है और ब्रिटेन की कॉवेंट्री यूनिवर्सिटी से इकनॉमिक्स में पीएचडी की है.
इंटरनेशनल रीन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (आईआरईएनए) का मुख्यालय दुबई लाने के मसदर के प्रयासों की सफलता का श्रेय जाबेर को ही दिया जाता है.
यह थोड़ी अजीब बात है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था मुख्य तौर पर तेल और गैस के उत्पादन पर निर्भर है, उस यूएई ने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल होने का लक्ष्य रखा है.
लेकिन इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा, यूएई ने इसे लेकर पूरी जानकारी नहीं दी है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि जब एडनॉक देश में तेल और गैस के नए भंडारों के दोहन की योजना बना रही है, तब भी ऐसा कैसे किया जाएगा.
'111 अरब बैरल का तेल भंडार'
ओपेक के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात के पास 111 अरब बैरल का कच्चे तेल का भंडार है.
साल 2009 में तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने सुल्तान अल जाबेर को यूएन को ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मामलों में सलाह देने वाले समूह में शामिल किया था.
इस नियुक्ति के तीन साल बाद सुल्तान अल जाबेर को 'यूएन चैंपियंस ऑफ़ द अर्थ अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
ये सम्मान उन्हें जलवायु परिवर्तन के ख़तरों को कम करने के लिए क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी (स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली तकनीक) को बढ़ावा देने की दिशा में किए गए उनके कार्यों के लिए दिया गया था.
लेकिन इन सब सराहनाओं से उनके आलोचक प्रभावित नहीं दिखाई देते हैं. आलोचकों का कहना है कि सुल्तान अल जाबेर की दिलचस्पी तेल उद्योग को बढ़ावा देने में है.
आलोचक इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि सुल्तान अल जाबेर की कंपनी का लक्ष्य अगले चार साल में तेल के उत्पादन को दोगुना करने का है और ये इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि उनका असली इरादा क्या है.
पेट्रोलियम उद्योग के प्रतिनिधियों को जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर होने वाले शिखर सम्मेलनों में शामिल होने की इजाजत देने की अतीत में आलोचनाएं होती रही हैं.
ऐसे आरोप भी लगे हैं कि ये लोग क्लाइमेट चेंज समिट के नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं.
लेकिन सुल्तान अल जाबेर ने सितंबर के महीने में न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ बातचीत में कहा कि अतीत में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर आयोजित किए गए शिखर सम्मेलन इसलिए बेनतीज़ा रहे क्योंकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं और हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री के हितों के बीच टकराव था और दोनों एक दूसरे को बदनाम करते थे.
उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, "हम इंडस्ट्री से क्यों लड़ रहे हैं? कार्बन उत्सर्जन के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई में हर तरफ़ से उत्सर्जन कम करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, चाहे वो तेल हो या गैस या फिर उद्योग जगत, चाहे वो कोई भी हो."
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर काम करने वाले पर्यावरणवादी कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके लिए हाइड्रोकार्बन उद्योग जिम्मेदार है.
सीओपी28 के लिए बातचीत में शामिल हरजीत सिंह कहते हैं, "क्लाइमेट एक्टिविस्ट के तौर पर हम हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री पर भरोसा नहीं करते हैं. इनका हमारे मक़सद में गतिरोध पैदा करने का पुराना इतिहास रहा है. इनकी वजह से उठाए गए कदमों में रुकावट आई है. इन्होंने इस काम के लिए ग़लत जानकारियां फैलाने का सहारा लिया है."
सुल्तान अल जाबेर ऐसी टेक्नोलॉजी की भी पैरवी करते हैं, जिससे तेल एवं गैस उद्योग के जरिए होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सके.
लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन जमा करने और उसके भंडारण जैसी टेक्नोलॉजी को लेकर पक्के तौर पर कोई दावा नहीं किया जा सकता है और इस दिशा में जो कुछ भी प्रगति हुई है, वो इतनी मामूली है कि इसकी व्यापक रूप से उपलब्धता भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती है.
हरजीत सिंह कहते हैं, "जीवाश्म ईंधन उद्योग (तेल एवं गैस सेक्टर) अब ऐसी ही टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है जो असरदार नहीं हैं और जिनकी उपयोगिता भी पूरी तरह से साबित नहीं हो पाई है. तेल एवं गैस के इस्तेमाल को बढ़ाने और तुलनात्मक रूप से ग्रीन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को टालने के लिए 'कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज' (कार्बन का संग्रहण और भंडारण) की तकनीक ऐसी ही टेक्नोलॉजी है."
'तेल और गैस सौदे की योजनाएं'
सीओपी28 के नेतृत्व के लिए सुल्तान अल जाबेर की नियुक्ति को लेकर खड़ा हुआ विवाद अभी थमने का नाम ही नहीं ले रहा था कि बीबीसी ने 27 नवंबर को लीक हुए दस्तावेज़ों के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, संयुक्त अरब अमीरात की योजना 15 देशों के साथ तेल एवं गैस के सौदों को लेकर बातचीत करने की है.
ये दस्तावेज़ ग़ैरसरकारी मीडिया संगठन 'सेंटर फॉर क्लाइमेट रिपोर्टिंग' से जुड़े स्वतंत्र पत्रकारों और बीबीसी ने हासिल की थी. इसे संयुक्त अरब अमीरात की सीओपी28 की टीम ने तैयार किया था.
योजना के मुताबिक़ 30 नवंबर को शुरू हुए सीओपी28 समिट के पहले यूएई की योजना कम से कम 27 विदेशी सरकारों के साथ बातचीत करने की थी.
लेकिन सुल्तान अल जाबेर ने इन ख़बरों से इनकार किया है कि उनका देश सीओपी28 समिट का इस्तेमाल तेल और गैस के कारोबारी सौदों के लिए कर रहा है.
29 नवंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट का मक़सद सीओपी28 की उनकी अध्यक्षता को कमतर करके पेश करने की है.
उन्होंने कहा, "ये आरोप झूठे हैं. ये सच नहीं है. ये ग़लत है और ये ठीक नहीं है."
दुबई में सीओपी28 समिट शुरू हो चुका है. जनवरी में जब उन्हें इसकी अध्यक्षता देने की घोषणा की गई थी, उस वक़्त की तुलना में अब पहले से कहीं ज़्यादा लोगों की निगाहें सुल्तान अल जाबेर पर होंगी.
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