You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी रोकने का क्या है सही तरीक़ा?
- Author, ऑनर एरम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनियाभर में रेबीज़ का ख़तरा बढ़ता जा रहा है. हर साल रेबीज़ से क़रीब 60 हज़ार लोगों की जान जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक़ इनमें से 99 फ़ीसद मामले कुत्ते के काटने और खरोंच के हैं.
रेबीज़ से बचाव के लिए एक वैक्सीन है, जिसे कुत्ते के काटने के बाद लिया जाता है. हालांकि, जब कुत्ता किसी व्यक्ति के चेहरे या किसी नर्व के नज़दीक काटता है तो ये वैक्सीन हमेशा कारगर साबित नहीं होती.
जुलाई में तमिलनाडु के अरक्कोणम में चार साल के निर्मल पर उनके घर के बाहर खेलते समय एक आवारा कुत्ते ने हमला कर दिया.
जब कुत्ते ने निर्मल के मुंह पर हमला किया, उससे थोड़ी देर पहले ही निर्मल के पिता घर के अंदर गए थे.
निर्मल के पिता बालाजी ने स्थानीय मीडिया को बताया था, "मैं उसी वक्त घर के अंदर पानी लेने गया था. जब मैं वापस आया तो उसके चेहरे पर चोट लगी थी."
इसके बाद निर्मल का परिवार उन्हें लेकर अस्पताल गया, जहां उन्हें 15 दिनों तक कड़ी देखरेख में रखा गया.
इसके बाद निर्मल की हालत स्थिर हो गई और उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. लेकिन, घर आने के कुछ दिनों के बाद निर्मल में रेबीज़ के लक्षण दिखने लगे.
उनका परिवार उन्हें लेकर फिर अस्पताल गया, जहां पता चला कि वायरस की वजह से तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) में इनफेक्शन हो गया है. दो दिनों के बाद निर्मल की मौत हो गई.
कभी-कभी बच्चे अपने घर में ये बताने से डरते हैं कि उन्हें कुत्ते ने काटा है. जिसकी वजह से उन्हें रेबीज़ की वैक्सीन लगाने में बहुत देर हो जाती है.
साल 1994 से 2015 के बीच मुंबई में करीब 13 लाख लोगों को कुत्ते ने काटा और 434 लोगों की रेबीज़ से मौत हुई है.
लेकिन आवारा कुत्तों से होने वाला ख़तरा सिर्फ़ हमला नहीं है.
इंटरनेशनल कंपेनियन एनिमल मैनेजमेंट कोलिज़न (आईसीएएम) के मुताबिक़ आवारा कुत्तों से होने वाले अन्य ख़तरों में अव्यवस्थित आवारा कुत्तों की आबादी, सड़क हादसे और मवेशियों के लिए ख़तरा शामिल हैं.
इसके अलावा लोगों को सड़क पर पैदल चलने से रोका जा रहा है.
तुर्की का नया विवादित क़ानून
तुर्की में आवारा कुत्तों से लगातार समस्याएं बढ़ रही हैं. तुर्की के वेटनरी एसोसिएशन के मुताबिक़ देश में करीब 65 लाख आवारा कुत्ते हैं.
तुर्की के सेफ़ स्ट्रीट एसोसिएशन के मुताबिक़ पिछले दो सालों में 100 से ज़्यादा लोगों की मौत कुत्तों के हमलों में हुई है. इन मामलों में कुत्ते के सीधे हमले और सड़क हादसे भी शामिल हैं.
इस साल जुलाई महीने के अंत में तुर्की सरकार ने एक कानून बनाया, जिसमें सभी नगर निकायों को आवारा कुत्तों को अगले चार साल के लिए शेल्टर में डालने को कहा गया. इस क़ानून का पालन नहीं करने वाले मेयर को जेल में डालने की धमकी दी गई.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने संसद में बिल पेश करने से पहले कहा था, "उन्होंने बच्चों, बड़ों, बुज़ुर्गों और अन्य जानवरों पर हमले किए हैं. इनकी वजह से सड़क हादसे हो रहे हैं."
साल 2004 से नगर निकायों को क़ानूनन अधिकार है कि वो आवारा कुत्तों को पकड़कर वैक्सीन लगाएं और उनकी नसबंदी करें. इसके बाद उन कुत्तों को जहां से पकड़ा गया है उन्हें वहीं छोड़ दें.
इसे सीएनवीआर (पकड़ना, नसबंदी करना, वैक्सीन लगाना, वापस छोड़ना) पद्धति के रूप में जाना गया. कई विशेषज्ञों ने इसे सबसे सही उपाय के रूप में देखा, लेकिन राष्ट्रपति अर्दोआन का कहना था कि यह तरीका काम नहीं आया.
टर्किश वेटनरी मेडिकल सोसायटी के डॉक्टर गुले अर्टर्क कहते हैं, "ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस पद्धति के प्रभावी होने के लिए 70 प्रतिशत आवारा कुत्तों की नसबंदी ज़रूरी है."
नए कानून के मुताबिक़ जिन कुत्तों को वैक्सीन लगाई गई है और नसबंदी की गई है, उन्हें सड़कों पर वापस छोड़ने की बजाय शेल्टर में डाला जाएगा. ये कुत्ते तब तक शेल्टर में रहेंगे जब तक उन्हें कोई गोद ना ले ले या फिर उनकी मौत ना हो जाए.
पशु संरक्षण संघ ने चेतावनी दी है कि नए तरीके में ज़्यादा खर्च लगेगा और खुली हवा में बड़े शेल्टर का मतलब है कि वहां ताकतवर कुत्ते कमज़ोर कुत्तों को खाना खाने से रोकेंगे और बीमारियां भी तेज़ी से फैलेंगी.
आईसीएएम की निदेशक डॉ एली हिबी कहती हैं, "एक तरीके के असफल होने के बाद यह और भी खर्चीला तरीका है. और शेल्टर भी तेज़ी से भरेंगे."
तुर्की के इस कानून के ख़िलाफ़ तुर्की और अन्य देशों में विरोध प्रदर्शन हुए.
बीबीसी ने इस मामले को लेकर तुर्की के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन इस लेख के प्रकाशित होने तक उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया है.
आवारा कुत्तों की संख्या घटाने का सही तरीक़ा क्या है?
आईसीएएम की डॉ हिबी कहती हैं, "कुत्तों की शुरुआती उम्र में उनकी नसबंदी करने से आवारा कुत्तों की संख्या घटाने में मदद मिलेगी."
इस तरीके को अपनाने से आवारा कुत्ते नए कुत्तों को जन्म नहीं दे सकेंगे और अगर कोई पालतू कुत्ता गुम हो जाता है या उसे छोड़ दिया जाता है, ऐसी स्थिति में वो नए कुत्ते को जन्म नहीं दे सकेगा और आवारा कुत्तों की संख्या नहीं बढ़ेगी.
वो कहती हैं, "यह तरीका तब काम नहीं करता जब अगली पीढ़ी के आवारा कुत्तों के सोर्स को बिना जाने सड़कों से कुत्तों को हटा दिया जाता है."
"आवारा कुत्ते हमेशा नए कुत्तों को जन्म दे रहे होते हैं और एक कुत्ता एक साल में 20 पपी तक को जन्म दे सकता है. इसलिए कुछ कुत्तों को सड़कों से हटाने, उन्हें मारने और शेल्टरों में डालने से उनकी संख्या लंबे समय तक के लिए कम नहीं रहेगी."
कभी-कभी शेल्टरों में और सार्वजनिक रूप से कुत्तों को मार दिया जाता है. इसे कई लोग क्रूर मानते हैं. ख़ासकर यह पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और उन लोगों के लिए परेशान करने वाला हो सकता है जो सड़कों पर गोलीबारी और ज़हर देकर मारे जाने की घटनाएं देखते हैं.
मनोचिकित्सक और मानसिक स्वास्थ्य नर्स डेबी विल्सन इंग्लैंड के हडर्सफील्ड विश्वविद्यालय में "बच्चे के अधिकार को बनाए रखने का मतलब है जानवरों के अधिकारों को भी बनाए रखना" शीर्षक से पीएचडी कर रही हैं.
वो कहती हैं, "पशुओं पर क्रूरता होते देखने से बच्चों में संवेदना कम हो जाती है और बड़े होने पर उनके द्वारा जानवरों और अन्य लोगों पर क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने की आशंका बढ़ जाती है."
बच्चों के अधिकारों को लेकर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन में कहा गया है कि बच्चों को जानवरों पर हो रही हिंसा से दूर रखना चाहिए.
दुनियाभर के सफल तरीक़े
अब सवाल यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जाए?
हाल ही में बोस्निया हर्जे़गोविना और थाईलैंड ने सीएनवीआर (कलेक्ट, न्यूटर, वैक्सिनेट, रिटर्न) की मदद से आवारा कुत्तों की संख्या रोकने में सफलता पाई है.
इस पद्धति में कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी की जाती है और उन्हें वैक्सीन लगाई जाती है. इसके बाद उन्हें वापस छोड़ दिया जाता है.
डॉग्स ट्रस्ट वर्ल्डवाइड फाउंडेशन बोस्निया का कहना है, "कुत्तों को पकड़ने, नसबंदी करने, वैक्सीन लगाने और फिर से वापस छोड़ने से राजधानी साराजेवो में साल 2012 से 2023 के बीच 85 प्रतिशत आवारा कुत्तों की संख्या में कमी आई है."
वहीं साराजेवो कैंटन में आवारा कुत्तों की संख्या में 70 प्रतिशत की कमी आई है.
बोस्निया हर्जे़गोविना में आवारा कुत्तों की आबादी की नसबंदी दर को 70 प्रतिशत से अधिक बनाए रखने के लिए ज़्यादा पशु चिकित्सकों को ट्रेनिंग देनी पड़ी.
डॉग्स ट्रस्ट फाउंडेशन ने पशु मालिकों को नसबंदी से होने वाले लाभ बताए और इसको लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया.
वेटनरी क्लीनिकों की संख्या दोगुने से भी अधिक होने से पालतू और आवारा कुत्तों की बेहतर देखरेख हो सकी.
साराजेवो शहर में इस अभियान के सफल होने के बाद साल 2015 में इसे कैंटन के बाकी हिस्सों में भी चलाया गया.
पिछले साल थाईलैंड में सोई डॉग फाउंडेशन ऐसा पहला संगठन बना जिसने पिछले 20 सालों में 10 लाख आवारा पशुओं का टीकाकरण और नसबंदी की. इनमें से 5 लाख से अधिक आवारा पशु राजधानी बैंकॉक में पकड़े गए.
यह लंबी प्रक्रिया साल 2003 में फुकेत द्वीप से एक छोटे पैमाने में शुरू की गई थी.
सोई डॉग फाउंडेशन में पशु कल्याण की अंतरराष्ट्रीय निदेशक डॉ एलिक्जा इज़ीडोर्जिक कहती हैं, "स्थानीय समुदायों में विश्वास बनाने के साथ इसकी शुरुआत हुई."
इस अभियान के बाद फुकेत में आवारा कुत्तों की संख्या को 80 हज़ार से 6 हज़ार तक कम किया गया.
इस सफलता के बाद इस तरीके़ को बैंकॉक में भी अपनाया गया, जहां आवारा कुत्तों की संख्या कहीं ज़्यादा है. लेकिन इसे लागू करने में कई बाधाएं भी आईं.
करीब पांच साल पहले थाईलैंड सरकार ने एक अभियान शुरू किया, जिसके तहत सभी आवारा कुत्तों को शेल्डर में डालना था. यह अभियान तुर्की के नए क़ानून के तरह ही था.
लेकिन बाद में सरकार को अहसास हुआ कि यह संभव नहीं है. इस अभियान के परिणामस्वरूप शेल्टरों में काफ़ी भीड़ हो गई.
डॉ हिबी कहती हैं, "बोस्निया और थाईलैंड की योजनाओं की वजह से आवारा कुत्तों की आबादी में कमी आई है. इसके अलावा रेबीज़ और काटने के मामलों में भी कमी आई है. इससे आवारा कुत्तों के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है."
वो देश जो अब भी इस समस्या से जूझ रहे
हाल ही में मोरक्को ने बड़ी संख्या में कुत्तों को मारना शुरू किया है.
हालांकि सरकार ने इसके पीछे का कारण नहीं बताया है. कुछ लोगों का मानना है कि अफ्रीका कप ऑफ नेशंस 2025 और फीफा विश्व कप 2030 के मेज़बान देश होने के नाते सरकार ने ऐसा कदम उठाया है.
मोरक्को की ह्यूमन सोसाइटी के संस्थापक और पशु संरक्षण संघों के समन्वयक अली इज़दीन कहते हैं, "देश में टीएनवीआर (ट्रीट, न्यूट्रल, वैक्सीनेट और रिलीज़) अभियान नहीं है."
मोरक्को की ह्यूमन सोसाइटी के अनुमान के मुताबिक़ देश में आवारा कुत्तों की आबादी 30 लाख है और हर साल 50 हज़ार कुत्तों को मार दिया जाता है.
इनमें से कई घटनाएं ऐसी हैं जिनमें कुत्तों को सार्वजनिक रूप से गोली मारी जाती है या ज़हर दिया जाता है.
इज़दीन कहते हैं, "कुत्तों को मारने से समस्या हल नहीं होती. क्योंकि जो आवारा कुत्ते बच जाते हैं वो ज़्यादा तेज़ी से प्रजनन करते हैं और अधिक जीवित रहने वाले एक साथ कई कुत्तों को जन्म देते हैं, जो मारे गए कुत्तों की जगह ले लेते हैं."
इज़दीन के संगठन का कहना है, "उन्हें हाल ही में पता चला कि मोरक्को ने दो बड़े फुटबॉल आयोजनों से पहले और भी अधिक आवारा कुत्तों को मारने के लिए घातक इंजेक्शन की तीस लाख खुराक मंगाई है. किसी भी आधिकारिक स्रोत ने इसकी पुष्टि या घोषणा नहीं की है."
बीबीसी ने मोरक्को सरकार, कैसाब्लांका नगर पालिका और माराकेश नगर पालिका से इस पर जवाब देने के लिए संपर्क किया, लेकिन इस लेख के प्रकाशित होने के पहले तक किसी का भी कोई जवाब नहीं आया.
वहीं डॉ हिबी का कहना है, "वर्तमान रुझान से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर आवारा कुत्तों की आबादी के प्रबंधन में सुधार हुआ है, जिसका सीधा संबंध जनता के दबाव से है. क्योंकि कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए लोग अधिक मानवीय तरीकों की मांग कर रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित