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शेख़ हसीना को सज़ा-ए-मौत: भारत को अब क्या रुख़ अपनाना चाहिए?- द लेंस
बांग्लादेश में पिछले साल हुई राजनीतिक हलचल की गूँज इस हफ़्ते फिर एक बार सुनाई पड़ी. बांग्लादेश में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को मौत की सज़ा सुनाई.
इससे संबंधित मामले की सुनवाई शेख़ हसीना की ग़ैर मौजूदगी में हुई थी क्योंकि वो बांग्लादेश छोड़ने के बाद से भारत में हैं.
शेख़ हसीना ने फ़ैसले के बाद दिए बयान में एक तरह से ये तो माना कि बीते साल हुए छात्रों के आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जान गई थी, मगर उसकी ज़िम्मेदारी से इनकार किया.
अब बांग्लादेश सरकार का भारत से कहना है कि उसे शेख़ हसीना को बांग्लादेश को सौंप देना चाहिए. हालांकि जानकारों का कहना है कि भारत ऐसा करने से परहेज़ करेगा.
इन हालात में बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्त्व वाली अंतरिम सरकार अगले साल फ़रवरी में चुनाव कराना चाहती है.
इससे जुडे़ कई सवाल हैं, जैसे- भारत के लिए इस फ़ैसले के क्या मायने हैं? क्या ये शेख़ हसीना की राजनीति का अंत है? क्या ये चीन और पाकिस्तान के लिए एक अवसर की तरह है? इसे लेकर क्या भारत को कूटनीतिक रुख़ अपनाना चाहिए?
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा की.
इन सवालों पर चर्चा के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे और भारत के पूर्व विशेष प्रतिनिधि एस डी मुनि, बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास और द हिंदू में विदेश मामलों के सीनियर असिस्टेंट एडिटर कल्लोल भट्टाचार्जी शामिल हुए.
शेख़ हसीना को सज़ा और भारत के सामने जटिल प्रश्न
बांग्लादेश में व्यापक जनउभार के बाद बीते साल पांच अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी.
तब से वो यहीं रह रही हैं और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, भारत के साथ ये मुद्दा उठाती रही है.
बांग्लादेश में शेख़ हसीना को सज़ा सुनाने के बाद भारत से उन्हें प्रत्यर्पित करने की अपील की गई है.
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास ने कहा, "न्यायिक प्रक्रिया के नतीजे से किसी को ताज्जुब नहीं हुआ. जिस तरह से इस कोर्ट को बनाया गया, बचाव पक्ष को अपने पसंद के वकील को नहीं लेने दिया गया, सरकार ने जिस वकील को नियुक्त किया, केस ख़त्म होने के बाद उनका एक वीडियो सामने आया जिसमें वो हंस हंस कर बोल रहे हैं कि उन्हें मुकदमे के नतीजे से दुख हो रहा है. लग रहा था कि पूरा मामला ही फ़िक्स सा था."
"बचाव पक्ष के वकील ने किसी भी सबूत की पड़ताल नहीं की, सवाल नहीं पूछे, किसी गवाह को नहीं बुलाया, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने किसी भी सुनवाई में स्थगन की अपील की. जिस तेज़ी से यह पूरी प्रक्रिया की गई, उससे हम यही उम्मीद कर रहे थे कि यही नतीजा होना था."
हालांकि इस फ़ैसले का बांग्लादेश के छात्र नेताओं ने स्वागत किया.
बांग्लादेश में शेख़ हसीना के प्रति अभी भी नाराज़गी की भावना अधिक दिखती है.
हालांकि रीवा गांगुली कहती हैं, "चूंकि मीडिया में एक पक्ष को बहुत दिखाया जा रहा है लेकिन अवामी लीग के समर्थकों में नाराज़गी है और ऐसे हालात में वे मीडिया के सामने बोलेंगे नहीं. लेकिन इस फ़ैसले पर एक समझदारी भरी और तार्किक बात निकली है वो विदेशों से निकली है और विदेश में ऐसे लोगों की ओर से बातें आई हैं जो अवामी लीग के आलोचक रह चुके हैं."
वो कहती हैं, "छात्र संगठनों की ही मांग थी कि चुनाव से पहले शेख़ हसीना का मुक़दमा ख़त्म हो. शायद इसी वजह से इस प्रक्रिया को इतनी तेज़ी से पूरा किया गया है. कुछ लोगों का तो ये भी कहना है कि ये प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय न्याय के मानकों के अनुरूप नहीं थी."
शेख़ हसीना के सामने क्या हैं विकल्प?
सवाल उठता है कि अपने ख़िलाफ़ फ़ैसला आने के बाद क्या शेख़ हसीना के लिए सारे दरवाज़े बंद हो गए हैं.
या अपने देश वापसी के लिए उनके सामने अब बस इंतज़ार करने का ही विकल्प बचा है?
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे और भारत के पूर्व विशेष प्रतिनिधि एस डी मुनि कहते हैं, "बांग्लादेश में अभी अवामी लीग के समर्थकों को कोई स्वतंत्रता नहीं है. सैकड़ों लोगों को जेल के अंदर डाल दिया गया है. हालांकि शेख़ हसीना लगातार बयान देकर अपने लोगों से संपर्क की कोशिश कर रही हैं."
"लेकिन एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि शेख़ हसीना की पूर्व सरकार बहुत लोकप्रिय नहीं रही है. जिस तरह विपक्ष का दमन किया गया और छात्रों के साथ बर्ताव किया गया, वे लोग अब बदला लेने के मूड में दिखाई देते हैं. ये ठीक नहीं है. कोर्ट उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा भी दे सकती थी, लेकिन जिस तरह की सज़ा हुई है उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं."
वो कहते हैं, "शेख़ हसीना के साथ ज़्यादती हो रही है और उसका कोई न्यायिक आधार नहीं है. ऐसे में हसीना अकेले तो कुछ नहीं कर सकती हैं. एक सूरत है कि अगर प्रतिबंध हटा दिए जाएं तो अवामी लीग उभर सकती है. वहां के लोग, यहां तक कि मोहम्मद यूनुस भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की बात कर रहे हैं ऐसे में आप पूरी अवामी लीग को चुनाव से कैसे बाहर कर सकते हैं."
हालांकि शेख़ हसीना ने भी जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया था और चुनाव से बाहर रखा था.
प्रोफ़ेसर मुनि सवाल करते हैं कि शेख़ हसीना ने ग़लत किया था लेकिन बांग्लादेश की मौजूदा सरकार अगर वही काम करेगी तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को कैसे निभा पाएगी.
वो कहते हैं, "अवामी लीग को मौका देना चाहिए तभी वो उभर सकती है और भारत के लिए उसका उभरना ज़रूरी है."
बांग्लादेश की राजनीति पर प्रभाव
अंतरिम सरकार फ़रवरी में आम चुनाव कराने जा रही है. ऐसे में शेख़ हसीना को मिली सज़ा का वहां की घरेलू राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है?
द हिंदू में विदेश मामलों के सीनियर असिस्टेंट एडिटर कल्लोल भट्टाचार्जी कहते हैं, "शेख़ हसीना ने 1971 के दौरान हुए जनसंहार की साज़िश में शामिल लोगों को सज़ा दिलाने के लिए इस इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्राइब्यूनल को स्थापित किया था. 2013 से 2016 तक इसी ट्राइब्यूनल ने ज़मात-ए-इस्लामी के बड़े बड़े नेताओं को फांसी की सज़ा दी थी. 2025 में जो ट्राइब्यूनल है उसका भी एक राजनीतिक संदर्भ है."
"अंतरिम सरकार ने पहले ही कहा था उनके एजेंडे में तीन मुद्दे हैं-पहला, पिछले साल हुए आंदोलन के दौरान उनके हिसाब से 1400 युवा लड़के लड़कियां मारे गए और घायल हुए, उन्हें न्याय दिलाना, दूसरा, सुधार करना और तीसरा चुनाव कराना."
उनका कहना है कि शेख़ हसीना अतीत की बात हो गई हैं, अब न तो वो चुनाव लड़ने वाली हैं और ना ही अवामी लीग आने वाली है. तो एक तरीक़े से शेख़ हसीना पर सुनाए गए फ़ैसले से चुनावी बिगुल बज रहा है.
वो कहते हैं, "अब सवाल ये है कि शेख़ हसीना के अलावा जो पार्टियां हैं, जैसे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जमात-ए-इस्लामी, एनसीपी (नेशनल सिटिजंस पार्टी) आदि, क्या वे एक होकर एक दोस्ताना तरीक़े से चुनाव लड़ सकती हैं? क्योंकि कई लोग पहले के चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं और धांधली के आरोप लगाते रहे हैं."
"अभी भी बहुत मतभेद हैं. जमात-ए-इस्लामी का कहना है कि पहले संविधान सुधार हो फिर चुनाव हो, कुछ लोगों का कहना है कि दोनों एक साथ हो, ताकि जुलाई चार्टर (जिसमें संविधान सुधार की बात है) का मक़सद भी पूरा हो जाए."
हालांकि उनका कहना है, "इस फ़ैसले से बांग्लादेश के चुनाव पर बहुत फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि चुनाव आते आते और भी घटनाक्रम आ जाएंगे."
अवामी लीग बांग्लादेश की बड़ी पार्टी है. उसे प्रतिबंधित करने से उसके ज़मीनी स्तर के काडर और समर्थक ख़त्म नहीं हो जाएंगे.
लेकिन अगर उसके बिना चुनाव कराया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता का सवाल पैदा होगा.
कल्लोल भट्टाचार्जी कहते हैं, "बांग्लादेश की ओर से कहा जा रहा है कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव होगा. वे समावेशी चुनाव का ज़िक्र नहीं करते क्योंकि इससे अवामी लीग के शामिल होने का मुद्दा उठता है. जबकि भारत समावेशी चुनाव पर ज़ोर देता है."
"लेकिन चाहे शेख़ हसीना वापस न लौटें या अवामी लीग हिस्सा न ले लेकिन उसकी मौजूदगी बनी रहेगी. शेख़ मुज़ीब और ताज़ीउद्दीन की विरासत से अवामी लीग पार्टी बनी थी और उसकी जगह हमेशा ही बनी रहेगी. आज भी गोपालगंज, मदारीपुर जैसे इलाक़ों में अवामी लीग के समर्थक बड़ी संख्या में प्रदर्शन कर रहे हैं. पिछले एक साल में वहां कई हिंसक घटनाएं भी हुई हैं."
उनके मुताबिक़, "इस वक़्त बांग्लादेश के 25 से 26 डिवीज़न में अवामी लीग का गढ़ है और वो बना रहेगा. ऐसे में उसके समर्थकों में वोट विभाजन की स्थिति पैदा होगी कि क्या वोट न दिया जाए और दिया जाए तो किसे."
बीएनपी का कितना असर
बांग्लादेश में अवामी लीग के अलावा दूसरी सबसे पार्टी है बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी).
आम तौर पर चुनावों में जो विपक्षी पार्टी होती है उसे सबसे अधिक फ़ायदा होता है.
लेकिन नेतृत्व के अभाव में राजनीतिक रूप से वो भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है.
इसके पीछे कारणों पर रीवा गांगुली दास कहती हैं, "बीएनपी एक बड़ी पार्टी है और उसके कार्यकर्ताओं की ज़मीनी स्तर तक पहुंच है. लेकिन जब अवामी लीग सरकार का पतन हुआ, उसके वर्कर भाग गए या जेल चले गए तो बीएनपी के कार्यकर्ताओं का सभी संस्थाओं पर दबदबा क़ायम हो गया, चाहे वो ट्रक एसोसिएशन हो या उगाही हो. इससे बीएनपी की काफ़ी बदनामी हुई. हज़ारों लोगों को पार्टी से निकालना पड़ा. उसके सामने कुछ मुश्किलें हैं और चुनाव जितना टलेगा उसे नुकसान उठाना पड़ेगा."
हालांकि वो कहती हैं, "चाहे जितनी आलोचना की जाए, अवामी लीग के टक्कर की अगर कोई पार्टी है तो वो बीएनपी है. ख़ालिदा ज़िया के बेटे तारिक रहमान चुनाव से पहले आते हैं तो बीएनपी का सपोर्ट बढ़ जाएगा. अगर वो नहीं आते हैं तो भी बीएनपी के पास इस बार अच्छा मौका है."
उनका कहना है कि जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ता बहुत हैं लेकिन वोट में तब्दील कहां तक हो पाते हैं, देखना होगा. जबकि एनसीपी एक नई नवेली पार्टी है और बहुत ऊर्जावान है लेकिन उसका प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है. हालांकि उन्हें उम्मीद है कि उन्हें कुछ सीटों पर बढ़त मिल सकती है.
दास का भी कहना है कि सबसे बड़ा सवाल है अवामी लीग के 20 प्रतिशत मतदाताओं का, कि वे किधर जाएंगे. एक जातियो पार्टी भी है, जिसके देश के उत्तरी हिस्से में वोट हैं. उन पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन उनकी राजनीतिक गतिविधियों को रोक दिया जा रहा है.
वो कहती हैं, "बैक चैनल बहुत सारी बातचीत चल रही है, मसलन सीट बंटवारे और समर्थन को लेकर."
हालांकि प्रोफ़ेसर मुनि का कहना है कि शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में ज़मात-ए-इस्लामी की काफ़ी भूमिका रही थी. अभी ढाका यूनिवर्सिटी के चुनाव में उसकी जीत हुई है. इसलिए उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
वो कहते हैं, "अगर बीएनपी आती है तो भारत के लिए बातचीत का मौका खुलेगा, जमात-ए-इस्लामी के साथ ऐसा नहीं है और एनसीपी अभी पूरी तरह संगठित भी नहीं हुई है."
मोहम्मद यूनुस का प्रभाव बना रहेगा?
अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने अपने कार्यकाल के दौरान भारत पर बांग्लादेश की निर्भरता को काफ़ी हद तक कम करने की कोशिश की है.
ऐसे में जो नई सरकार बनेगी क्या उस पर, ऐसी नीति को जारी रखने का दबाव बनेगा और क्या मोहम्मद यूनुस का प्रभाव बरक़रार रहेगा?
प्रोफ़ेसर मुनि का कहना है कि मोहम्मद यूनुस की ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर की है, वो अर्थशास्त्री हैं, लेकिन उन्हें बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी मिलकर चला रहे हैं.
वो कहते हैं, "यूनुस की बातों में विरोधाभास दिखता है. वो अंतरिम सरकार चार साल तक चलाना चाहते थे लेकिन बीएनपी के दबाव में चुनाव की घोषणा करनी पड़ी. इसके अलावा जिस समय शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहा था, वो अमेरिका में बैठे हुए थे. उन्हें एक तरह से लाया गया. तो मुझे नहीं लगता कि उनका कोई प्रभाव बचा रहेगा."
संबंध बनाए रखने में भारत को कितनी मुश्किल?
हसीना सरकार के पतन के बाद से ही बांग्लादेश में भारत के प्रति नाराज़गी की एक भावना है. ऐसे में भारत के लिए उसके साथ संबंध बढ़ाने में एक चुनौती है.
इस पर कल्लोल भट्टाचार्जी ने कहा, "रिश्ते बनाए रखने का प्रमुख तत्व है बातचीत जारी रखना, चाहे वहां बीएनपी हो, अवामी लीग हो या कोई और. ये बातचीत दोनों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों, विदेश मंत्रियों या अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार और पीएम मोदी के बीच हो."
"पिछले 15 महीनों में ऐसे कई मौके आए जब शीर्ष स्तर पर बातचीत नहीं हुई. ये एक दुखद बात है. भारत ने भी अवामी लीग के फिर से खड़ा होने का इंतज़ार किया, लेकिन ये हुआ नहीं. अब भारत हसीना सरकार के बाद की परिस्थियों के लिए खुद को तैयार कर रहा है."
"लेकिन एक और बात पर ध्यान देना ज़रूरी है. जुलाई चार्टर के माध्यम से जो सत्ता के पुनर्गठन की कोशिश हो रही है, उसमें प्रधानमंत्री के अलावा राष्ट्रपति के पास भी शक्तियां होंगी और वो भी काफ़ी पावरफुल होंगे. जुलाई चार्टर के लागू होने के बाद कई संस्थाओं के पास बहुत सारी शक्तियां आएंगी. ऐसे में भारत को उस ढांचे के साथ संवाद जारी रखना होगा."
उनका कहना है कि बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते बहुआयामी हैं, जैसे, वित्त, ऊर्जा, रक्षा, रणनीतिक और राजनीतिक. ऐसे में ज़रूरी है कि बातचीत जारी रखी जाए.
शेख़ हसीना को लेकर भारत के सामने क्या हैं विकल्प
हालांकि शेख़ हसीना भारत में हैं और कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत उन्हें प्रत्यर्पित नहीं करेगा.
भारत के पास क्या विकल्प हैं, इस पर कल्लोल भट्टाचार्जी का कहना है, "भारत एक क्षेत्रीय शक्ति है और दक्षिण एशिया में बाकी देश भी भारत के अगले क़दम को देख रहे हैं, चाहे वो मालदीव हो या नेपाल. क्योंकि शेख़ हसीना ने लगातार 15-16 सालों तक भारत के साथ साझेदारी की, चाहे सीमा समझौता हो, व्यापार हो, बिजली हो, कनेक्टिविटी हो."
"अगर भारत शेख़ हसीना को त्याग देता है तो पूरे दक्षिण एशिया में एक संदेश जाएगा कि बुरे दिनों में वो अपने साझेदार का साथ नहीं देता. मुझे लगता है कि भारत में शेख़ हसीना को एक क़ानूनी शरण देना ज़रूरी है इससे स्पष्ट हो जाएगा कि वो भारत में क़ानूनी तौर पर रह सकती हैं."
हालांकि रीवा गांगुली दास का भी मानना है कि भारत के लिए शेख़ हसीना का सवाल कठिन ज़रूर है लेकिन उतना भी कठिन नहीं है.
वो कहती हैं, "ऐसे मुश्किल हालात से निपटने की भारत में क्षमता है और उसने पहले भी ऐसा किया है. हालांकि जो भी सरकार बांग्लादेश में आएगी उसके साथ यह मुद्दा बना रहेगा. प्रत्यर्पण एक जटिल प्रक्रिया है और उसमें भारत की न्याय प्रणाली की भी भूमिका होगी."
भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार के मुद्दे
रीवा गांगुली दास का कहना है कि शेख़ हसीना के अलावा भी भारत और बांग्लादेश के बीच कई मुद्दे हैं.
वो कहती हैं, "इतने सारे प्रतिबंधों के बावजूद अगस्त 2024 से अगस्त 2025 के बीच भारत का व्यापार कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा है. दूसरा एनर्जी ट्रेड. बांग्लादेश बड़े पैमाने पर भारत से बिजली खरीदता है. काफ़ी दिनों से वे 1000 मेगावाट त्रिपुरा-पश्चिम बंगाल से खरीदते थे. अडानी पावर से 1400 मेगावाट की ख़रीद है."
"पांच अगस्त 2024 के बाद से भारत नेपाल बांग्लादेश के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ है. जिसमें बांग्लादेश भारत की ग्रिड का इस्तेमाल करके नेपाल से 40 मेगावाट की बिजली ख़रीद रहा है. असम से पाइप के माध्यम से हाईस्पीड डीज़ल भी वो ख़रीदता है."
रीवा गांगुली दास कहती हैं, "हम पहले भी साझेदारी करते आए थे और आगे भी कर पाएंगे. और चुनी हुई कोई सरकार आए, उसके सामने इस संबंध का एक आर्थिक तर्क होगा, और वो इस बारे में संवेदनशील होगी."
उनका कहना है कि बांग्लादेश के बहुत से मरीज़ भारत में इलाज कराते थे, अब कुछ इमरजेंसी परिस्थितियों में ही वीज़ा दिया जा रहा है. ये भी लोगों के बीच संपर्क का एक प्रमुख आधार रहा है. पहले दोनों देशों के बीच तीन ट्रेनें चलती थीं. उससे व्यापार होता था. अब ये सब बंद हैं.
क्या चीन और पाकिस्तान के लिए मौके
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के आने के बाद मोहम्मद यूनुस ने भारत पर निर्भरता को काफ़ी कम करने की कोशिश की है.
दोनों देशों के बीच कड़वाहट में बढ़ी है जिसे चीन और पाकिस्तान अवसर की तरह देखते हैं.
प्रोफ़ेसर मुनि का कहना है कि चीन और पाकिस्तान की कोशिश रहेगी कि बांग्लादेश में भारत के प्रभाव को कम किया जाए.
वो कहते हैं, "हसीना के समय से ही चीन के साथ बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते थे और वो मदद कर रहा था. लेकिन हसीना चीन और भारत के बीच एक संतुलन बनाते हुए दोनों के हितों को संभाल कर चलने की नीति अपना रही थीं. लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं होगा. बताया जाता है कि रक्षा और इंटेलिजेंस के 11 प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान से बांग्लादेश जा चुके हैं. यूनुस को इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता की चीन का प्रभाव बढ़ता है या घटता है. अभी तक वो पाकिस्तान के प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम रहे हैं."
प्रोफ़सर मुनि ने कहा, "देखना होगा कि भारत अपनी वैचारिक और राजनीतिक धारा मज़बूत करने के लिए वहां की घरेलू ताक़तों को कहां तक लामबंद कर सकता है, जिसमें जातीय पार्टी, छात्रों की पार्टी और बीएनपी का एक धड़ा भी आता है."
"भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि जो उसकी मान्यताएं और हित हैं उन्हें बचाने के लिए बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में वो कहां तक अपना प्रभाव बढ़ा सकता या बचा सकता है. इसी पर निर्भर करता है कि वहां पाकिस्तान या चीन का प्रभाव कितना बढ़ेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.