दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में किया दावा, 'नेताओं को पिलाई चाय, प्रदर्शनकारियों को दिया ताज़ा खाना'

सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान जो कार्रवाई दिल्ली पुलिस ने की उस पर सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी गई है.
इमेज कैप्शन, सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान जो कार्रवाई दिल्ली पुलिस ने की उस पर सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी गई है
    • Author, विनीत भल्ला
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

10 और 11 अक्तूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए राजनेताओं को पुलिस थानों में चाय-कॉफ़ी पिलाई गई, जबकि आम प्रदर्शनकारियों को "गर्म और ताज़ा खाना" परोसा गया- ये दावे दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में किए हैं.

इसके अलावा हलफ़नामे में पुलिस ने ये भी कहा है कि किसी भी वकील या पत्रकार के पेशेवर काम में बाधा नहीं डाली गई, और सिर्फ़ क़ानूनी पाबंदियाँ तोड़ने वालों को हिरासत में लिया.

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने ये भी दावा किया है कि कुछ घंटों के बाद ही प्रदर्शनकारियों को छोड़ दिया गया था.

पुलिस का दावा है कि "ख़ुफ़िया जानकारियों" के आधार पर की गई इस कार्रवाई से दिल्ली में एक "बड़ा क़ानून-व्यवस्था का संकट" टल गया.

10 और 11 अक्तूबर को दिल्ली में हुए भारी सुरक्षा बंदोबस्त, इंटरनेट शटडाउन, ट्रेनों के रद्द होने और कथित अवैध हिरासत के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार और शनिवार को याचिकाएँ दायर की गई थीं.

इनके जवाब में दिल्ली पुलिस, केंद्रीय गृह सचिव और रेलवे ने बुधवार और गुरुवार को हलफ़नामे दायर कर अपनी कार्रवाई का बचाव किया है.

पुलिस ने क्या कहा?

हलफ़नामे में 10 अक्तूबर की पुलिस कार्रवाई को लेकर कई ऐसे दावे किए गए हैं, जो आम धारणा से बिल्कुल अलग हैं.

पुलिस ने हलफ़नामे में दावा किया है कि 10 अक्तूबर को किसी को भी जेल या लॉक-अप में नहीं डाला गया.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

पुलिस के मुताबिक़, "जिन लोगों को (प्रदर्शन स्थल से) हटाया गया, उन्हें अस्थायी केंद्रों में रखा गया. दिल्ली पुलिस ने उन्हें गर्म, ताज़ा और अच्छा खाना दिया और दो से छह घंटे के भीतर जाने की अनुमति दे दी."

हिरासत में लिए गए नेताओं के बारे में पुलिस ने लिखा है, "जहाँ तक राजनीतिक नेताओं का सवाल है, उनसे एसएचओ के कमरों में बैठने का अनुरोध किया गया था. उनके पद की गरिमा को पूरी तरह बनाए रखते हुए उन्हें चाय, कॉफ़ी, भोजन और अन्य जलपान उपलब्ध कराए गए."

वकीलों और पत्रकारों के काम में बाधा डालने के आरोपों पर पुलिस ने कहा, "किसी भी प्रोफ़ेशनल्स को अपना काम करने से नहीं रोका गया."

सुप्रीम कोर्ट के पास से शनिवार को वकीलों को हिरासत में लेने के सिलसिले में हलफ़नामे में कहा गया है, "यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इस संवैधानिक अदालत के गरिमामय परिसर को प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और इसकी पवित्रता हर क़ीमत पर बनाए रखनी होगी."

पुलिस ने स्पष्ट किया कि उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत कार्रवाई की, जिसके तहत भीड़ जुटने पर रोक लगती है.

पुलिस का दावा है कि ये आदेश "सिर्फ़ जंतर-मंतर तक सीमित नहीं थे, बल्कि कई थानों ने ऐसे आदेश जारी किए थे."

हालाँकि, हलफ़नामे में इन थानों के नाम नहीं हैं. पुलिस ने अपनी कार्रवाई को "बोनाफ़ाइड" और हालात के हिसाब से बताया है.

'फ्रीलांस पत्रकारों ने उकसाया, बसों के शीशे तोड़े'

ये तस्वीर जुलाई में दिल्ली में हुए सीजेपी के प्रोटेस्ट के दौरान की है
इमेज कैप्शन, ये तस्वीर जुलाई में दिल्ली में हुए सीजेपी के प्रोटेस्ट के दौरान की है

10 और 11 अक्तूबर की इस करवाई को सही ठहराने के लिए पुलिस ने अक्तूबर के पहले हफ़्ते और जुलाई में हुए प्रदर्शनों का विस्तार से हवाला दिया है.

पुलिस ने आरोप लगाया कि 6 से 8 अक्तूबर के बीच कांग्रेस के विरोध मार्च के कारण सेंट्रल दिल्ली पूरी तरह से 'चोक' हो गई थी, जिससे लोग अपनी ट्रेनें और फ़्लाइट्स तक नहीं पकड़ पाए.

हलफ़नामे में आरोप लगाया गया है कि इन प्रदर्शनों में भीड़ बहुत आक्रामक थी.

पुलिस के शब्दों में, "'स्वतंत्र पत्रकारिता' (फ़्रीलांस जर्नलिज्म) की आड़ में आए कुछ लोगों ने भीड़ को उकसाया. कुछ उपद्रवियों ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की."

पुलिस का दावा है कि जब प्रदर्शनकारियों को बसों में डाला गया, तो उन्होंने "हिंसा की हदें पार करते हुए बसों के टायर पंक्चर कर दिए और शीशे तोड़ दिए."

'भीड़ में थे हत्या और रेप के अभियुक्त'

दिल्ली पुलिस का दावा है कि आम प्रदर्शनकारियों को भी जेल में नहीं रखा गया.
इमेज कैप्शन, दिल्ली पुलिस का दावा है कि आम प्रदर्शनकारियों को भी जेल में नहीं रखा गया

सबसे गंभीर आरोप 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर पर किए गए प्रदर्शन को लेकर है.

पुलिस ने हलफ़नामे में लिखा है, "20 जुलाई को जंतर-मंतर पर 30 हज़ार से ज़्यादा लोग जमा हुए थे, जिनमें दंगा, हत्या, रेप और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में शामिल लोग भी थे."

पुलिस के मुताबिक़, "वीडियो फुटेज में दिख रहा है कि प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों के सुरक्षा उपकरण हटा रहे हैं, उन्हें घसीट रहे हैं, उनके हेलमेट उतार रहे हैं. जो भीड़ की हिंसा और पुलिसकर्मियों की लिंचिंग (पीट-पीटकर हत्या करने की कोशिश) जैसा प्रतीत होता है."

पुलिस का दावा है कि इस हिंसा में 240 से ज़्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए थे.

दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि उसके आदेश पर 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखे गए.
इमेज कैप्शन, दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि उसके आदेश पर 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रखे गए

प्रशासन ने 10 अक्तूबर को दिल्ली में बड़े पैमाने पर शटडाउन किया था, जिसकी विस्तार से जानकारी हलफ़नामों में है.

रेलवे के हलफ़नामे के अनुसार, 9 और 10 अक्तूबर के बीच दिल्ली आने-जाने वाली लगभग 241 ट्रेनें (200 पैसेंजर और 41 एक्सप्रेस) रद्द कर दी गई थीं.

दिल्ली पुलिस ने "उपद्रवी भीड़ की आवाजाही" रोकने के लिए 25 घंटे के लिए 45 मेट्रो स्टेशनों को बंद करवा दिया था.

केंद्रीय गृह सचिव ने अपने हलफ़नामे में बताया कि रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में नौ अक्तूबर को रात 10 बजे से 10 अक्तूबर रात 10 बजे तक के लिए मोबाइल इंटरनेट बंद किया गया था.

उन्होंने इसे क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित क़दम कहा और स्पष्ट किया कि ब्रॉडबैंड और वाई-फ़ाई जैसी सेवाओं को जानबूझकर चालू रखा गया था.

प्रदर्शन क्यों हुआ और जुलाई की घटना का इससे क्या संबंध है?

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और एसआईआर को वापस लेने की मांग को लेकर प्रदर्शन बुलाया था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, 10 और 11 अक्तूबर के दौरान दिल्ली में 7,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था. इसके अगले दिन राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता सरकार की कार्रवाई के विरोध में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने निकले थे.

दिल्ली पुलिस का कहना है कि अक्तूबर में उठाए गए क़दमों के पीछे 20 जुलाई के प्रदर्शन का अनुभव भी था.

सीजेपी ने उस समय पेपर लीक और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी.

पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़े गए, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाया गया और पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ.

वहीं, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने पुलिस पर प्रदर्शनकारियों, ख़ासकर महिलाओं के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया था.

उस समय पुलिस ने पांच एफ़आईआर दर्ज की थीं. इनमें दंगा करने, सरकारी और निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने और ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने से जुड़ी धाराएं लगाई गई थीं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.