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2024 से पहले बीजेपी छोटे दलों को एनडीए की नाव में क्यों सवार कर रही है?
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की मंगलवार को दिल्ली में बैठक हुई.
इस बैठक की अध्यक्षता बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा कर रहे हैं और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए हैं.
बीजेपी इस बैठक के ज़रिए नई पार्टियों के साथ अपना गठबंधन बनाने के अवसर तलाश रही है. बैठक में वो दल तो शामिल हुए जो एनडीए का हिस्सा हैं लेकिन कुछ ऐसे दल भी आए जो एनडीए का हिस्सा नहीं हैं.
बैठक से एक दिन पहले एनडीए में चिराग पासवान की एंट्री हो गई थी. रामविलास पासवान के निधन के बाद एलजेपी में बंटवारा हो गया था.
चिराग पासवान के साथ जेपी नड्डा और अमित शाह की मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया में छाई रहीं.
चिराग पासवान के अलावा बिहार से इस बैठक में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा, विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश साहनी और हम पार्टी के जीतन राम मांझी शामिल हुए.
एनडीए में शामिल हुआ एनसीपी का अजित पवार धड़ा भी इस बैठक में शामिल हुआ.
बदले एनडीए में छोटे दलों की जगह
साल 1998 में जब एनडीए बना था तो इसमें 24 पार्टियां शामिल हुई थीं. लेकिन उस समय के एनडीए और आज के एनडीए में काफ़ी बदलाव आ चुका है. आज बीजेपी के साथ शिवसेना (अविभाजित), जनता दल यूनाइटेड, अकाली दल जैसे उसके सहयोगी रहे दल साथ नहीं हैं.
ऐसे में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी एनडीए को एकबार फिर बनाने और इसका विस्तार करने में जुट गई है.
बीजेपी की हालिया कोशिश उत्तर प्रदेश में रंग लाई है जहां पूर्वांचल की राजनीति में बड़ा नाम ओम प्रकाश राजभर ने लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर पाला बदल लिया है और अब फिर एनडीए में शामिल हो चुके हैं.
राजभर पिछड़ों के ऐसे नेता हैं जिनका कद उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके की राजनीति में काफ़ी बड़ा है. इसी इलाके में निषादों के बड़े नेता संजय निषाद तो पहले से ही एनडीए का हिस्सा हैं.
चार साल पहले ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने एनडीए से रिश्ता तोड़ा था लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी इस पुराने सहयोगी को मनाने में कामयाब हुई है.
ओमप्रकाश राजभर की एनडीए में एंट्री ना सिर्फ़ ये बताता है कि जातीय समीकरण की राजनीति में वो कितना दम रखते हैं बल्कि ये पता चलता है कि कैसे बीजेपी छोटे-छोटे दलों को अपने करीब लाने में जुटी हुई है.
जानकार मानते हैं कि बीजेपी छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को आने वाले चुनाव में साधने की कोशिश कर रही है. कर्नाटक में हुई हार के बाद बीजेपी ये समझ चुकी है कि उसे पार्टियों के साथ की ज़रूरत है.
खासकर दक्षिण में जहां बीजेपी उत्तर भारत के मुकाबले कमज़ोर है और क्षेत्रीय दल काफ़ी मज़बूत हैं.
दक्षिण में 130 लोकसभा सीटें हैं. यहां बीजेपी की मुख्य सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके है जिसने 2019 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में 39 सीटें जीती थीं. ख़बर है कि तेलंगना में बीजेपी टीडीपी के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत चल रही है.
बीजेपी ने बीते लोकसभा चुनाव में खुद के दम पर 303 सीटें जीती थीं, बीजेपी का वोट शेयर 37 फ़ीसदी था. ऐसे में उसे आखिर गठबंधन की ज़रूरत क्यों है?
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी इस सवाल का जवाब देते हुए कहती हैं, “बीजेपी आज भी इस स्थिति में नज़र आती है कि वो सरकार बना सकती है लेकिन सबसे अहम ये है कि विपक्ष जिस तरह से एकजुट हो रहा है उसे देखते हुए बीजेपी एनडीए का वर्चुअल पुर्नगठन कर रही है. बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती, उसे पता है कि नरेंद्र मोदी जितनी पॉपुलैरिटी वाला नेता देश में कोई और नहीं है लेकिन फिर भी वो तमाम छोटे दलों को दिल्ली की बैठक में बुला रही है. इनमें से कई पार्टियों के पास लोकसभा में एक-दो सीटें हैं कुछ के पास तो एक भी सीट नहीं है.”
“बीजेपी का कहना है कि 38 पार्टियां उसके डिनर मीटिंग में शामिल होने वाली हैं. पटना में बैठक के बाद बीजेपी ने ये हलचल तेज़ की है. राजनीति नज़रिए का खेल है. ये संदेश देना ज्यादा अहम माना जाता है कि किसके पास कितने पार्टियों का समर्थन है.”
“बीजेपी के लिए एनडीए से नई पार्टियों को जोड़ने के साथ-साथ ये संदेश देना भी अहम है कि अगर विपक्ष की बैठक में 26 दल शामिल हुए हैं तो बीजेपी की बैठक में 38 दल आ रहे हैं.”
छोटे दल बीजेपी के पास क्यों आ रहे हैं?
हालांकि कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं. मसलन हरियाणा जहां अमित शाह ने अपनी हालिया रैली में कहा कि-"सभी दस सीटें बीजेपी को दें."
यहां मनोहर लाल खट्टर की सरकार जननायक जनता पार्टी के साथ गठबंधन में हैं लेकिन अटकलें हैं कि लोकसभा चुनाव दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ सकती हैं.
वहीं अटकलों का बाज़ार गरम है कि कर्नाटक में जेडीएस लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ लड़ सकती है.
यूपी और बिहार में कई पार्टियां ऐसी हैं जिसने लोकसभा चुनाव एनडीए का हिस्सा बन कर लड़ा, लेकिन राज्य के विधानसभा चुनाव में या तो वो विपक्षी खेमे में चली गईं या चुनाव के बाद पाला बदल लिया. जेडीयू, एलजेपी इसके उदाहरण हैं.
लोकनीति-सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, “ये समझना होगा कि जो पार्टियां बीजेपी से दूर गई थीं उनका कोई बहुत बड़ा विचारधारा का मतभेद नहीं था. अगर ओमप्रकाश राजभर की ही बात करें तो उन्होंने उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए ये सोचकर छोड़ा होगा कि अखिलेश यादव के चुनाव जीतने पर उनको कोई अहम पद मिल जाएगा.”
“विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों का अलग हो जाना आम बात है क्योंकि विधानसभा में सीटें अधिक होती हैं इस सीटों पर जाति और पहचान की राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए जीतने के मौके अधिक होते हैं. 30 साल का इतिहास देख लें तो पता चलता है कि विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों का वोट शेयर बढ़ता है और लोकसभा चुनावों में इन्हीं पार्टियों का वोटशेयर घटता है.”
राजनीतिक विश्लेषक ये भी कहते हैं कि बीते दो आम चुनाव में देखा गया है कि जनता नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट देती है और उनकी लोकप्रियता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियां भी इस बात को समझते हुए एनडीए में जाती हैं.
'बीजेपी के लिए छोटे दलों को कंट्रोल करना आसान'
इस साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की थी, इस बैठक में एक खास संदेश दिया गया कि क्षेत्रीय दलों के बीच बीजेपी को लेकर एक धारणा बन रही है कि वह इन पार्टियों को ‘सहयोगी दल बनाने के लिए बहुत इच्छुक नहीं है.’ इस धारणा को तोड़ना होगा.
दरअसल साल 2014 से अब तक एनडीए से जिस तरह बड़े और पुराने दल दूर हुए हैं उन्हें देखा जाए तो क्षेत्रीय दलों की इस सोच के पीछे का तर्क समझ आता है.
साल 2014 से अब तक एनडीए से शिरोमणि अकाली दल, तेलुगू देशम पार्टी, शिवसेना (एकजुट) और जेडीयू अलग हो चुकी हैं.
नीरजा चौधरी कहती हैं, “बीजेपी के संदर्भ में छोटी पार्टियों को एक डर ये है कि अगर वो अपने दम पर अधिक सीटें ले आईं तो उसे इन दलों की ज़रूरत नहीं होगी. अतीत में सबने देखा है कि बीजेपी ने अपने पुराने और घनिष्ट सहयोगियों को भी बांध कर रखने की कोशिश नहीं की. ”
“बीजेपी के पास छोटी पार्टियों को जोड़ने का एक बड़ा फ़ायदा ये है कि छोटे दलों को कंट्रोल करना बड़े दलों की तुलना में अधिक आसान है. बदले में इन पार्टियों को राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म मिलता है.”
संजय कुमार भी यही मानते हैं कि ये समझना होगा कि ये गठबंधन जो हो रहे हैं या जो होने वाले हैं वो विचारधारा के गठबंधन नहीं हैं वो मौके को ध्यान में रख कर किए जाते हैं. इसलिए हम देखते हैं कि रातों-रात कैसे दल पाले बदलते हैं. ये 90 का दशक नहीं है जब वैचारिक तौर पर गठबंधन किए जाते थे.
राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं. विपक्ष की पटना और बेंगलुरु में हुई बैठक ने बीजेपी में हलचल बढ़ा दी है.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी के लिए चुनाव जीतना अब तक तो बहुत मुश्किल नज़र नहीं आ रहा लेकिन उसके लिए चैलेंज है कि कैसे वो अपनी सीटों को कम होने से रोके.
नीरजा कहती हैं, "अगर बीजेपी की 40-50 सीटें कम हो जाती हैं तो इससे देश की तमाम संस्थाओं में ये संदेश चला जाएगा कि बीजेपी को लेकर अब वो माहौल नहीं रहा जो 2014 से 2019 के चुनावों में था. बीजेपी ऐसा होने के रिस्क को कम करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है. "
"विपक्ष के लिए ये लोकसभा चुनाव करो या मरो वाले स्थिति है क्योंकि अगर तीसरी बार बीजेपी सत्ता में आई तो ये पार्टियां ख़त्म होने की कागार पर आ जाएंगी."
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