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समंदर में छा रहा है अंधेरा, हमारी ज़िंदगी पर किस तरह पड़ेगा प्रभाव?
- Author, एलियट बॉल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, साउथ वेस्ट
- Author, सु-मिन ह्वांग
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
एक अध्ययन के मुताबिक़ दुनिया के महासागरों में अंधेरा छा रहा है. पिछले दो दशकों में समंदर के अंदर प्रकाश का प्रवेश मुश्किल हुआ है, जिसे 'ओशन डार्कनिंग' कहते हैं. ये शोध यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ़ प्लिमथ ने किया है.
'ओशन डार्कनिंग' तब होता है, जब समंदर की ऊपरी सतह पर बदलाव के कारण अंदर पानी में प्रकाश का प्रवेश मुश्किल हो जाता है.
समंदर के अंदर जहां तक प्रकाश पर्याप्त रूप से पहुंचता है, उस हिस्से को 'फ़ोटिक ज़ोन' कहा जाता है.
समुद्री जीवन का 90 फ़ीसदी हिस्सा इसी फ़ोटिक ज़ोन में होता है और जैव-रासायनिक चक्रों को अच्छी तरह से बरकरार रखने के लिए ये ज़रूरी है.
ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में छपे अध्ययन में पाया गया है कि 2003 और 2022 के बीच वैश्विक महासागर का 21 फ़ीसदी हिस्सा अंधकारमय हुआ है.
समंदर में अंधेरा छाने की वजह क्या है?
अध्ययन के अनुसार, ओशन डार्कनिंग का कारण पानी में शैवालों की संख्या बढ़ने की प्रक्रिया में बदलाव और समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन माना जाता है.
ये सबसे अधिक तटीय क्षेत्रों में देखा जाता है, जहां पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर आ जाता है और अधिक बारिश के कारण भूमि से कृषि अपशिष्ट और तलछट पानी में चले जाते हैं, जिनसे समुद्र की सतह पर रहने वाले सूक्ष्म जीवों को, जिन्हें प्लवक कहते हैं, पोषण मिलता है.
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर के कई क्षेत्रों में भारी बारिश की घटनाएँ बढ़ गई हैं.
ओशन डार्कनिंग का संबंध समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से जोड़ा जा सकता है, जिसके कारण समुद्र की सतह पर प्लवक बढ़ सकते हैं, जो प्रकाश को समुद्र में जाने से रोकते हैं.
कौन से क्षेत्र प्रभावित हुए हैं?
अध्ययन में पाया गया कि महासागर के 9% से अधिक हिस्से - जो अफ्रीका के आकार के बराबर का क्षेत्र है - में फ़ोटिक ज़ोन की गहराई में 164 फीट (50 मीटर) की कमी आई है.
वहीं महासागर के 2.6% फ़ीसदी हिस्से में फ़ोटिक ज़ोन में 328 फ़ीट (100 मीटर) की कमी आई है.
इस अध्ययन के मुताबिक़ फ़ोटिक ज़ोन की गहराई में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन गल्फ़ स्ट्रीम, आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में देखा गया, जहां जलवायु परिवर्तन का काफ़ी असर देखा जा रहा है.
ओशन डार्कनिंग तटीय क्षेत्रों और बाल्टिक सागर में बड़े पैमाने पर देखी गई है.
हालांकि, ये सिर्फ़ तटीय क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, इसका प्रभाव समुद्र तट से दूर महासागर के विशाल क्षेत्रों तक पड़ता है.
अध्ययन के मुताबिक़ ऐसा भी नहीं है कि महासागर के सभी हिस्सों में अंधेरा छा रहा है. इसी अवधि में समुद्र के लगभग 10% हिस्से में फ़ोटिक ज़ोन की गहराई बढ़ी भी है.
अध्ययन के लेखकों के अनुसार, यह मिली-जुली तस्वीर समुद्र की जटिलता और समुद्री पानी को प्रभावित करने वाले कई कारकों को दिखाती है.
यह समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित करता है?
समुद्र में अंधेरा छाने से क्या होगा, ये पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे समुद्री जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं.
यूनिवर्सिटी में मरीन कंज़र्वेशन के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. थॉमस डेविस कहते हैं, "शोध से पता चला है कि पिछले 20 वर्षों में समुद्र की सतह का रंग कैसे बदल गया है. ऐसा संभव है कि ये प्लवक यानी समुद्र में बहने वाले जीवों में आए परिवर्तन से हुआ हो."
"लेकिन हमारे शोध के नतीजे इस बात का प्रमाण देते हैं कि ऐसे परिवर्तन के कारण बड़े पैमाने पर अंधेरा छा जाता है, जिससे वे समुद्री जीव प्रभावित होते हैं, जो अपने अस्तित्व और प्रजनन के लिए सूर्य और चंद्रमा पर निर्भर रहते हैं."
समुद्र का फ़ोटिक ज़ोन समुद्री जीवन का आधार है और यहीं पर सूक्ष्म समुद्री पौधे, जिन्हें पादप प्लवक, प्रकाश संश्लेषण करते हैं यानी सूर्य की रोशनी में अपना खाना बनाते हैं. ये सूक्ष्म जीव फ़ूड चेन यानी खाद्य श्रृंखला का आधार हैं और यह समुद्री सतह के पास पाए जाते हैं क्योंकि इन्हें प्रकाश संश्लेषण करने के लिए प्रकाश की ज़रूरत होती है.
यही कारण है कि कई समुद्री जीव फ़ोटिक ज़ोन यानी समुद्र में जहां तक सूर्य का प्रकाश पहुंचता है, वहां शिकार करते हैं और प्रजनन करते हैं क्योंकि यहां भोजन भरपूर मात्रा में होता है. पादप प्लवक वायुमंडल का लगभग आधा ऑक्सीजन भी उत्पन्न करते हैं. ये कार्बन चक्र और समुद्री जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं.
'चिंता का असल कारण'
डॉ. डेविस का कहना है कि ओशन डार्कनिंग का असर उस हवा पर पड़ सकता है, जिसमें इंसान सांस लेते हैं. इसका उन मछलियों पर असर पड़ सकता है, जो इंसान खाते हैं. साथ ही, इससे जलवायु परिवर्तन से लड़ने की दुनिया की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.
"हमारे निष्कर्ष चिंता का वास्तविक कारण पेश करते हैं."
यूनिवर्सिटी ऑफ़ प्लिमथ की मरीन लैब में साइंस फ़ॉर बायोजिओकेमिस्ट्री एंड ऑब्ज़र्वेशन्स के हेड प्रोफ़ेसर टिम स्मिथ कहते हैं कि इस परिवर्तन के कारण कुछ समुद्री जानवर सतह के क़रीब आ सकते हैं, जिन्हें प्रकाश की ज़रूरत है. इससे भोजन और अन्य संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.
प्रोफ़ेसर टिम स्मिथ कहते हैं, "इससे पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बुनियादी बदलाव आ सकते हैं."
ये अध्ययन कैसे किया गया?
'डार्कनिंग ऑफ़ द ग्लोबल ओशन' नाम के अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने उन्नत महासागर मॉडलिंग के साथ-साथ लगभग दो दशकों के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया.
नासा के ओशन कलर वेब डेटा- जो वैश्विक महासागर को 9 किलोमीटर पिक्सल में बांटता है - से शोधकर्ताओं ने हर पिक्सल के लिए महासागर की सतह पर होने वाले परिवर्तनों की निगरानी की.
वहीं जबकि समुद्री जल में प्रकाश को मापने के लिए डिज़ाइन किए गए एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके हर स्थान पर फ़ोटिक ज़ोन की गहराई का अनुमान लगाया गया.
सौर और चंद्र विकिरण मॉडलों का इस्तेमाल यह जांचने के लिए भी किया गया कि प्रकाश की स्थिति में परिवर्तन - दिन और रात दोनों के दौरान - समुद्री जीवों को किस तरह प्रभावित कर सकता है.
अध्ययन में पाया गया कि रात के समय प्रकाश के स्तर में परिवर्तन दिन की तुलना में कम था, लेकिन फिर भी ये पारिस्थितिक रूप से अहम था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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