बांग्लादेश: अंतरिम सरकार पर उम्मीदों का बोझ, सलाहकारों के सामने चुनौतियां

    • Author, तफ़सीर बाबू
    • पदनाम, बीबीसी बांग्ला, ढाका से

बांग्लादेश में सरकार गिरने के बाद डॉ. यूनुस के नेतृत्व में नई अंतरिम सरकार का गठन हो गया है.

इसके साथ ही कुछ दिनों के लिए राज्य की सत्ता में बना खालीपन ख़त्म हो गया है.

यह खालीपन शेख़ हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद पैदा हुआ था.

लेकिन देश में नई सरकार को शुरुआत से ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. यह सरकार ऐसे समय में कार्यभार संभाल रही है जब देश में कानून व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई है.

बांग्लादेश में अशांति का माहौल है. देश के आर्थिक हालात भी तनाव के दौर में है. इसके साथ ही राज्य में सुधार की भी बड़ी ज़रूरत है.

बांग्लादेश में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं, इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है.

बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने ढाका में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार नदीम क़ादिर से नई सरकार पर बात की है.

नदीम क़ादिर का कहना है, “नई सरकार में दो छात्रों को जगह दी गई है. यह बांग्लादेश के लिए नया अनुभव है. संविधान के मुताबिक़ देश में तीन महीने में चुनाव होना चाहिए लेकिन अभी इसके बारे में कुछ कहा नहीं गया है.”

इस बीच बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार ने शपथ लेने के 16 घंटे के भीतर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों का बंटवारा कर दिया है.

कैबिनेट ने शुक्रवार को संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है. इसके मुताबिक़ सरकार के प्रधान सलाहकार मोहम्मद यूनुस रक्षा, शिक्षा, खाद्य, भूमि समेत कुल 27 मंत्रालयों के प्रभारी होंगे.

उनके साथ 13 अन्य सलाहकारों के बीच 13 मंत्रालयों का बंटवारा हुआ है.

नई सरकार में मो. तौहीद हुसैन को विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिली है.

रिटायर सैन्य अधिकारी एम सखावत हुसैन को गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी मिली है.

जबकि बांग्लादेश बैंक के गवर्नर रहे सालेह उद्दीन अहमद को वित्त मंत्रालय सौंपा गया है.

वहीं मौजूदा छात्र आंदोलन में शामिल रहे ढाका विश्वविद्यालय के छात्र नाहिद इस्लाम को डाक, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, औरआसिफ महमूद सजीब भुइयां को युवा और खेल मंत्रालय मिला है.

कानून और व्यवस्था

सरकार गिरने के बाद ढाका के लगभग सभी पुलिसकर्मी ग़ैरमौजूद हैं. वहीं देश के कई इलाक़ों में पुलिस थानों पर हमले किये गए हैं.

लोगों ने मुख्य रूप से कानून और व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों पर लोगों के उपर गोलीबारी करने, गिरफ्तारी और यातना देने का आरोप लगाया है.

इसी के ख़िलाफ़ लोगों ने विरोध प्रदर्शन कर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया है.

बांग्लादेश में एक बार फिर से थाने पर आक्रोशित भीड़ के हमले और इन हमलों में पुलिसकर्मियों की मौत के मामले सामने आ रहे हैं.

कुल मिलाकर देश में कानून और व्यवस्था लागू कराने वाली एजेंसियों और आम जनता के बीच भरोसे का संकट साफ तौर पर दिख रहा है.

लूट, डकैती और तोड़ फोड़ का सिलसिला

राजनीतिक विश्लेषक ज़ुबैदा नसरीन का मानना है कि नई सरकार की सबसे बड़ी चुनौती मौजूदा हालात में कानून-व्यवस्था की स्थिति को सामान्य करना होगा.

उन्होंने कहा, ''यहां अब कानून लागू करने वाली एजेंसियां और लोग; कोई किसी पर भरोसा नहीं कर सकता. दोनों ही ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं. इनमें जल्द भरोसा बनाना होगा.”

उनके मुताबिक़ देश में कानून लागू करने वाली एजेंसियों में भ्रष्टाचार, लोगों को तकलीफ़ देने का सिलसिला और सेवा भाव की कमी का इतिहास बदला जाना चाहिए.

“यदि कहीं कोई अनियमितता है और उसे दूर कर लिया जाए तो लोगों का भरोसा लौट आएगा. इसके लिए सबसे पहले सरकार की मानसिकता को बदलना जरूरी है.”

ज़ुबैदा नसरीन का कहना है, “सरकार इन ताक़तों का इस्तेमाल करती है. अगर उसका तानाशाही रवैया बदलेगा तो सेना के भीतर भी सुधार होगा. इनका राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, ”

सुधार की ज़रूरत

बांग्लादेश में लोगों ने भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग सहित कई जगहों पर सुधार की ज़रूरत महसूस की है. कई लोग देश में राजनीतिक सरकार के गठन से पहले इनमें सुधार की मांग कर रहे हैं.

पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक अहसान एच मंसूर का कहना है कि राज्य व्यवस्था में सभी संस्थानों को अब थोड़ा बहुत सुधारना होगा.

उनका कहना है, “यहां भ्रष्टाचार हमारी बड़ी समस्या है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बने आयोग का क्या होगा, न्यायपालिका में क्या सुधार होगा, रैपिट एक्शन बटालियन को उतारा जाएगा या नहीं, कई बातें स्पष्ट करने की ज़रूरत है.”

दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषक ज़ुबैदा नसरीन का मानना है कि सभी संवैधानिक संस्थाओं में सुधार किया जाना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें. तब यह राज्य को सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार जैसी चीज़ों से दूर रखेगा.

उनका कहना है, " यहाँ राज्य प्रबंधन की संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकती थीं. वो राजनीतिक सरकार के प्रभाव में निष्पक्षता से काम नहीं कर पाए. इसलिए बदलाव यहीं से करना होगा.”

'अर्थव्यवस्था में जल्द नतीजे की ज़रूरत'

हाल के वर्षों में बांग्लादेश में आर्थिक संकट की वजह से सार्वजनिक जीवन में असंतोष धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा था.

छात्र आंदोलन में हर तरह के लोगों की भागीदारी के पीछे यह एक बड़ी वजह बनकर उभरी है.

देश की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे ख़राब हो रही है, वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं, मुद्रास्फीति असहनीय हालात की तरफ जा रही है.

पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक अहसान एच मंसूर का मानना है कि अगर नई सरकार को जनता का भरोसा बरकरार रखना है, तो उसे शुरू में मुद्रास्फीति और ज़रूरी वस्तुओं की कीमतों को कम करने पर ध्यान देना चाहिए.

उन्होंने कहा, ''दो से तीन महीने के भीतर अर्थव्यवस्था के कुछ पहलुओं में स्थिरता लानी चाहिए. चार पाँच महीने में महंगाई कम हो जानी चाहिए. विनिमय दर को सामान्य किया जाना चाहिए, भंडार को थोड़ा बढ़ाना चाहिए. यहाँ लोगों को जल्दी कुछ परिणाम दिखाने की जरूरत है."

लेकिन क्या इन मामलों में जल्दी सफलता मिलना संभव है?

अहसान एच मंसूर का कहना है कि यह असंभव नहीं है.

उनका कहना है, “कई पश्चिमी देश छह महीने के भीतर मुद्रास्फीति को दस-बारह फ़ीसदी से घटाकर तीन फ़ीसदी करने में कामयाब रहे हैं. हम भी ऐसा कर सकते हैं. हम लंबे समय से ज़रूरी कदम नहीं उठा पाए हैं. यहां मुद्रा की दर बाज़ार के आधार पर रखनी चाहिए."

“ज़्यादा पैसे छापकर सरकारी खर्च पूरा नहीं किया जा सकता. ज्यादा पैसे छापकर बैंक नहीं चलाए जा सकते. यदि वो ऐसा कर सकते हैं और विदेशी मदद हासिल कर सकते हैं, तो देश की अर्थव्यवस्था स्थिर हो जाएगी.”

नई सरकार का कार्यकाल कितना होगा?

बांग्लादेश में छात्र और नागरिक समाज जिस सुधार की मांग कर रहे हैं उसके लिए पर्याप्त समय की ज़रूरत है.

लेकिन राजनीतिक दल देश में जल्द चुनाव की मांग कर रहे हैं. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने तो बुधवार को ढाका में रैली कर तीन महीने के भीतर चुनाव शुरू करने को कहा है.

ऐसी चर्चा है कि अंतरिम सरकार के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए तीन महीने का समय पर्याप्त नहीं हैं.

अहसान एच मंसूर का कहना है कि कोई भी सरकार थोड़े समय में जरूरी सुधार नहीं कर पाएगी और यदि सुधार नहीं होगा तो राज्य व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा.

उनका कहना है, “अगर सरकार तीन महीने या छह महीने के लिए रहे तो सुधार का कोई मतलब नहीं है. हमें एक और तानाशाही, और एक और राजवंश मिलेगा. यहां बड़े बदलावों में तीन से छह साल लगेंगे.”

वहीं बांग्लादेश में अंतरिम सरकार को बहुत दिनों तक बनाए रखने के ख़िलाफ़ भी तर्क हैं, क्योंकि यह सरकार चुनी हुई नहीं है और इसका अपना कोई राजनीतिक दल नहीं है.

अहसान एच मंसूर कहते हैं, "नई सरकार के लिए जल्दबाजी में चुनाव कराना भी जोखिम भरा होगा. राज्य की संस्थाओं को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने में समय लगेगा. लेकिन अगर इसमें लंबा वक़्त लगा तो इससे देश में एक तरह की अस्थिरता भी पैदा हो सकती है.''

कुल मिलाकर सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं.

उनकी राय है कि नई सरकार को इस चुनौती का सामना करने के लिए राजनीतिक दलों को भरोसे में लेना चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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