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तस्करी, जासूसी और तोड़-फोड़: प्रतिबंधों के बावजूद रूस कैसे बेच रहा है तेल?
- Author, अलेक्सी कालमिकोव
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ रशियन
रूस का कहना है कि उसकी दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फ़ैसले से उस पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.
दरअसल, प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल को दुनिया तक पहुँचाने का ज़रिया टैंकरों का एक शैडो फ़्लीट यानी गुप्त बेड़ा है.
यह समुद्री बेड़ा दुनिया भर में सस्ते तेल की तलाश करने वालों को लाखों बैरल तेल बेचता है. ये जहाज़ सिर्फ़ रूसी तेल नहीं बेच रहे हैं. ईरान, वेनेज़ुएला और कुछ अवसरवादी पश्चिमी व्यापारी भी अपना तेल इन टैंकरों के सहारे बेच रहे हैं. ये व्यापारी सुरक्षा या पर्यावरण को होने वाले ख़तरे की तुलना में मुनाफ़े की ज़्यादा परवाह करते हैं.
यूक्रेन पर 2022 में हुए हमले के बाद से रूस के इस डार्क फ़्लीट की गतिविधियां तेज़ी से बढ़ी हैं.
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लेकिन इस गुप्त बेड़े का सबसे बड़ा फ़ायदा पुतिन को होता है.
रूस इसका इस्तेमाल सिर्फ़ रूसी तेल की तस्करी करने और जंग जारी रखने के लिए ही नहीं करता, बल्कि नेटो देशों के ख़िलाफ़ यूरोप में 'हाइब्रिड' जासूसी और तोड़फोड़ अभियानों के लिए भी करता है.
रूसी निशाने पर वे समुद्री केबल और पाइपलाइनें भी होती हैं जो नेटो देशों की लाइफ़लाइन हैं.
अमेरिका और सऊदी अरब के साथ रूस दुनिया के तीन बड़े तेल निर्यातकों में से एक है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, 2024 में रूस ने दुनिया के तेल का लगभग 10% उत्पादन किया था.
यूक्रेन में युद्ध से पहले, रूस का लगभग पूरा समुद्री तेल निर्यात पश्चिमी टैंकरों से किया जाता था. इनमें से ज़्यादातर टैंकर ग्रीस के होते थे. इनका सारा व्यापारिक लेन-देन स्विट्जरलैंड से होता था और बीमा लंदन से ख़रीदा जाता था.
लेकिन अब, रूसी तेल ले जाने वाले हर पाँच टैंकरों में से चार के पास मान्यता प्राप्त बीमा नहीं होता. यानी यह उन 12 बीमा कंपनियों में से किसी एक का नहीं होता जो इंटरनेशनल ग्रुप ऑफ़ प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी क्लब्स से जुड़ी हैं.
इस संस्था की सदस्य कंपनियां लगभग 90% समुद्री माल का बीमा करती हैं.
एसएंडपी ग्लोबल के विश्लेषकों का अनुमान है कि पश्चिमी प्रतिबंधों की अवहेलना करते हुए यह गुप्त बेड़ा अब 80% रूसी तेल ढुलाई कर रहा है.
कीव स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ अर्थशास्त्री बेंजामिन हिलगेनस्टॉक कहते हैं, "रूस ने प्रतिबंधों से बचने के लिए तेल टैंकरों का एक गुप्त बेड़ा खड़ा कर लिया है. इनमें कुछ पुराने जहाज़ भी हैं. इनका ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता है, इसलिए समुद्र में तेल के रिसाव की आशंका रहती है. ऐसे में उनका पर्याप्त बीमा होने की संभावना भी कम है."
"रूस का लगभग तीन-चौथाई समुद्री तेल निर्यात बाल्टिक और काला सागर पर मौजूद बंदरगाहों से बाहर आता है. इसका मतलब है कि ये जहाज़ हर दिन कई बार यूरोपीय जलक्षेत्रों से होकर गुज़रते हैं."
एसएंडपी के अनुसार, समुद्र में मौजूद हर पाँच टैंकरों में से लगभग एक इस गुप्त बेड़े का हिस्सा है. ये जंग खाए जहाज़ अज्ञात या धुंधले झंडों के साथ यात्रा करते हैं ताकि उन देशों से तेल की तस्करी कर सकें जिन पर प्रतिबंध लगे हैं.
इनमें से 50% केवल रूसी तेल और तेल उत्पाद ले जाते हैं, 20% केवल ईरानी तेल और 10% केवल वेनेज़ुएला का तेल ले जाते हैं. बाकी के 20% टैंकर किसी एक देश से जुड़े नहीं हैं और वे प्रतिबंधों के तहत आने वाले एक से ज़्यादा देशों का तेल ले जाते हैं.
रूस, ईरान और वेनेज़ुएला को सेवाएं देने वाले सबसे बड़े टैंकर मुख्य रूप से भारत और चीन की यात्रा करते हैं. ये दोनों देश तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के सबसे बड़े आयातक हैं.
रूसी तेल के छोटे खरीदारों में तुर्की, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं.
अपने निशान छिपाने के लिए गुप्त बेड़े के जहाज़ ये काम करते हैं:
- वे अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में सीधे जहाज़ से जहाज़ में तेल ट्रांसफ़र करते हैं क्योंकि वहाँ निगरानी कमज़ोर होती है.
- वे अपने ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) को बंद कर देते हैं या उसमें फेरबदल करते हैं. यह सिस्टम जहाज़ के प्रकार, स्थिति, गति, रास्ता, नाम और झंडा जैसी जानकारी भेजता है.
- ये जहाज़ अपने मालिकाना हक़ की जानकारी छिपाते हैं, अपना पंजीकरण झंडा बदल देते हैं या बिना किसी झंडे के ही चलते हैं. यहाँ तक कि वे पूरे टैंकर का नाम भी महीने में कई बार बदल देते हैं.
- वे इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (आईएमओ) के ऐसे ख़ास रजिस्ट्रेशन नंबर का प्रसारण करते हैं जो असल में कबाड़ में भेजे जाने वाले जहाज़ों को दिए गए होते हैं. यह बिल्कुल ऐसा है जैसे किसी मरे हुए आदमी की पहचान का इस्तेमाल किया जाए.
मैरीटाइम एनालिटिक्स कंपनी विंडवार्ड के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में फ़र्ज़ी झंडों वाले जहाज़ों की संख्या में कम से कम 65% की बढ़ोतरी हुई. विंडवार्ड का अनुमान है कि इस गुप्त बेड़े में अब 1,300 जहाज़ शामिल हैं.
झंडा-पंजीकरण सेवाएं भी तेज़ी से बढ़ी हैं. इनमें से कई तो पूरी तरह फ़र्ज़ी हैं, जबकि कुछ अन्य तकनीकी रूप से क़ानूनी रूप से सही हैं लेकिन उन पर नियंत्रण मज़बूत नहीं है. वजह यह है कि झंडा जारी करने वाले देश इस कारोबार में नए हैं और उनमें इस बात की निगरानी करने की न तो इच्छा है, न क्षमता, कि उनके झंडों का उपयोग कैसे किया जा रहा है.
हिलगेनस्टॉक कहते हैं, "वैश्विक शिपिंग की नियंत्रण प्रक्रिया में ज़िम्मेदारी झंडा लगाने वाले देशों की होती है. इसमें तकनीकी मानकों का पालन करवाना और तेल रिसाव बीमा पर्याप्त होना सुनिश्चित करना शामिल है."
अक्तूबर 2025 में, बेनिन के झंडे वाले एक टैंकर को फ्रांसीसी तट पर रोक लिया गया था. शक था कि उसे डेनमार्क में हवाई अड्डों को बंद करने के लिए मजबूर करने वाली रहस्यमय ड्रोन उड़ानों के लिए लॉन्चपैड के रूप में इस्तेमाल किया गया है.
ब्रेस्ट में सरकारी वकील स्टीफ़न केलनबर्गर ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि पहले टैंकर ने सहयोग करने से इनकार कर दिया और बाद में वह अपनी राष्ट्रीयता साबित करने में विफल रहा.
इस जहाज़ ने थोड़े समय पहले ही अपना नाम 'पुष्पा' से बदलकर 'द बोराके' किया था और इससे पहले वह 'ओडीसियस', 'वरुणा' और 'किवाला' जैसे नामों का इस्तेमाल कर चुका था.
यह जहाज़ सात अलग-अलग देशों के झंडों का इस्तेमाल कर चुका था.
जब फ्रांसीसी नौसेना ने इसे रोका, तो यह सेंट पीटर्सबर्ग के पास प्रिमॉर्स्क में स्थित रूसी तेल टर्मिनल से भारत के वडनगर तक साढ़े सात लाख बैरल कच्चा तेल ले जा रहा था.
स्वीडन, नॉर्वे और जर्मनी जैसे नेटो देशों पर भी संदिग्ध रूसी ड्रोन घुसपैठ हुई हैं.
छह नवंबर 2025 को ब्रसेल्स एयरपोर्ट को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा क्योंकि उसके आसपास कई जगहों पर ड्रोन देखे गए. लेकिन रूस, यूक्रेन के सहयोगियों के ख़िलाफ़ "हाइब्रिड युद्ध" छेड़ने से इनकार करता है.
'द बोराके' की जांच के बाद नेटो देशों ने बाल्टिक सागर में पहरेदारी अभियान या 'बाल्टिक सेंट्री मिशन' शुरू किया. नेटो के महासचिव मार्क रूटे ने कहा, "जहाज़ के कप्तानों को यह समझना होगा कि हमारे बुनियादी ढांचे को संभावित ख़तरे दिखने के परिणाम भुगतने होंगे. इसमें जहाज़ में प्रवेश करना, ज़ब्ती और गिरफ्तारी शामिल है."
ब्रिटेन, डेनमार्क, स्वीडन और पोलैंड का कहना है कि वे इंग्लिश चैनल, डेनिश जलडमरूमध्य, फ़िनलैंड की खाड़ी और स्वीडन-डेनमार्क के बीच के जलडमरूमध्य में बीमा दस्तावेज़ों की जांच कर रहे हैं.
एस्टोनिया, फ़िनलैंड, जर्मनी, आइसलैंड, लातविया, लिथुआनिया, नीदरलैंड और नॉर्वे ने भी रूस के गुप्त बेड़े को "बाधित करने और रोकने" पर सहमति व्यक्त की है.
बाल्टिक क्षेत्र में समुद्री केबल कटने और समुद्र की तह में कई अन्य घटनाओं के बाद इन देशों ने यह क़दम उठाया है. लेकिन गुप्त बेड़े के जहाज़ों को केवल बंदरगाह में या समुद्री सीमा के भीतर ही रोका जा सकता है.
और यह किनारे से 12 नॉटिकल मील का एक छोटा-सा इलाका होता है.
अंतरराष्ट्रीय जल में ऐसा करना बहुत मुश्किल है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि पश्चिमी देश दुनिया में नेविगेशन की स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थक हैं.
'इनोसेंट पैसेज' यानी 'निर्दोष आवागमन' के सिद्धांत के तहत, देश केवल उन्हीं जहाज़ों को रोक सकते हैं जिनसे उन्हें अपनी सुरक्षा को ख़तरा हो.
रूसी राजनेताओं ने रूसी तेल ले जाने वाले टैंकरों के ख़िलाफ़ किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई को रूस पर हमला मानने की बात कही है. और मई 2025 में, एस्टोनिया और फ़िनलैंड के बीच बिना झंडे के चल रहे एक तेल टैंकर को जब एस्टोनिया ने हिरासत में लेने की कोशिश की, तो रूस ने एक फ़ाइटर जेट भेज दिया था.
लेकिन यह गुप्त बेड़ा वैश्विक सुरक्षा के लिए भी बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है.
बड़ी शिपिंग कंपनियां आमतौर पर लगभग 15 साल के बाद टैंकर को हटा देती हैं. 25 साल के बाद, उन्हें कबाड़ में भेज दिया जाता है.
लेकिन गुप्त बेड़े के टैंकरों को कबाड़ के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता. दिसंबर 2024 में भारी तूफ़ान के दौरान 50 साल पुराने दो टैंकर कर्च जलडमरूमध्य में क्षतिग्रस्त हो गए थे. इससे फैले लगभग 5,000 टन तेल को नियंत्रित करने में रूसी अधिकारियों को भारी मशक्कत करनी पड़ी थी.
एक वरिष्ठ रूसी वैज्ञानिक ने इस रिसाव को 21वीं सदी की देश की सबसे बड़ी 'पर्यावरणीय आपदा' बताया. रूसी एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ के प्रमुख विक्टर दानिलोव-दानिल्यान ने एक रूसी अख़बार को बताया, "इतनी बड़ी मात्रा में ईंधन के तेल का रिसाव पहली बार हुआ है."
फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, दुबई जैसे अधिकार क्षेत्रों में बनी फ़र्ज़ी कंपनियां — जिनमें से कुछ को रूसी तेल कंपनियां पैसा देती हैं — अपना जीवनकाल पूरा कर चुके जहाज़ों को ख़रीद लेती हैं. इससे बाज़ार अस्थिर होता है और नए टैंकरों में निवेश घटता है.
इसके बाद अनाम या नई बनी कंपनियों के ज़रिए तेज़ी से खरीदने और बेचने की प्रक्रिया शुरू होती है ताकि जवाबदेही को और भी ज़्यादा उलझाया जा सके.
इन टैंकरों का रखरखाव भी काफ़ी ख़राब होता है. इनमें मशीनी गड़बड़ियों और रिसाव का ख़तरा रहता है. इसके अलावा, टूटे हुए या बंद किए गए ट्रांसपॉंडर संकीर्ण जलक्षेत्रों में अन्य जहाज़ों के साथ टकराने के जोखिम को बढ़ाते हैं.
इसके बावजूद यह जोखिम भरा गुप्त कारोबार बेहद फ़ायदेमंद है. एक्सक्लूसिव शिपब्रोकर्स के अनुसार, एक 15 साल पुराने स्वेज़मैक्स टैंकर की कीमत लगभग 4 करोड़ डॉलर होती है.
एसएंडपी का कहना है कि काला सागर से भारत तक रूसी तेल ले जाने वाली एक महीने की यात्रा भी इसके मालिक को 50 लाख डॉलर से ज़्यादा कमाई करवा सकती है.
इन डार्क शिप्स के मालिक मुनाफ़ा तो अपनी जेब में डालते हैं, लेकिन संभावित नुकसान बाकी दुनिया पर छोड़ देते हैं.
बिना बीमे की स्थिति में दुर्घटना या तेल रिसाव का हर्जाना किसी और को ही भरना पड़ता है.
भविष्य में जब रूस पर लगे प्रतिबंध हटा भी दिए जाएंगे, तब भी यह काला बेड़ा या डार्क फ़्लीट चलता रहेगा.
बिज़नेस मैगज़ीन 'लॉयड्स लिस्ट' का कहना है कि 'गुप्त बेड़ा 2.0' का ख़ाका पहले से ही उभरने लगा है.
(अतिरिक्त रिपोर्टिंग और संपादन: ओल्गा सावचुक, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित