मोदी से लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बात करने से अमेरिका क्यों कतराया?

राघवेंद्र राव

बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा से पहले ये सवाल बार-बार उठ रहा था कि क्या अमेरिकी सरकार या राष्ट्रपति जो बाइडन मोदी से भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, लोकतंत्र में गिरावट और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर अमेरिकी चिंताओं का ज़िक्र करेंगे?

यात्रा शुरू होने से पहले ही अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने कहा था कि अमेरिका अपनी बात ज़रूर कहता है लेकिन वो इस तरह से कहता है कि वो लेक्चर या उपदेश न लगे. साथ ही उन्होंने कहा था कि अमेरिका ये दावा नहीं करना चाहता कि उनके सामने चुनौतियाँ नहीं हैं.

इस बात से अंदाज़ा तो लग ही गया था कि अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति जो बाइडन प्रधानमंत्री मोदी से इन विषयों पर सार्वजनिक तौर पर बात करने से बचेंगे.

हालांकि यह मुद्दा सार्वजनिक तौर पर उभर आया, जब गुरुवार को अमेरिकी मीडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि उनकी सरकार मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा के लिए क्या क़दम उठाएगी. साथ ही ये भी पूछा गया कि मानवाधिकार संगठन कहते हैं कि भारत सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया है.

मोदी का जवाब और बीजेपी की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके जवाब में कहा कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों में धर्म, जाति, उम्र या भू-भाग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है. साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार लोकतंत्र के मूल्यों के आधार पर बने संविधान के आधार पर चलती है तो "पक्षपात का कोई सवाल ही नहीं उठता है".

प्रधानमंत्री मोदी के इस जवाब के बाद भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग के इंचार्ज अमित मालवीय ने ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री मोदी ने मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की 'रक्षा' के लिए उठाए जा रहे कदमों पर पूछे गए एक प्रेरित प्रश्न को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया. अपने जवाब में उन्होंने मुसलमानों या किसी अन्य संप्रदाय का उल्लेख नहीं किया पर संविधान, पात्रता के आधार पर सरकारी संसाधनों तक पहुंच और जाति, पंथ, धर्म या भूगोल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होने की बात की... इसी तरह के सवाल पर राष्ट्रपति बाइडन की ठंडी प्रतिक्रिया के बाद यह टूलकिट गैंग के लिए एक और झटका था."

समय-समय पर अमेरिकी सरकार के शीर्ष अधिकारी और अमेरिकी संस्थान भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट के ऊपर बयान और रिपोर्ट्स जारी करते रहे हैं.

तो ये सवाल उठना लाज़िमी है कि अलग-अलग मौकों पर इन मुद्दों को उठाने वाली अमेरिकी सरकार ऐसे महत्वपूर्ण दौरे के दौरान सार्वजानिक तौर पर इन मुद्दों पर बात करने से क्यों बचती रही.

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भारत के लोकतंत्र पर उठते सवाल

बीते कुछ वर्षों के दौरान भारत में लोकतंत्र के कथित गिरते स्तर को लेकर लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बनती रही हैं.

वैश्विक मीडिया वॉचडॉग रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की इस साल मई के महीने में मीडिया स्वतंत्रता पर जारी की गई नवीनतम रिपोर्ट मुताबिक 2023 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 180 देशों में से 161वें स्थान पर खिसक गई. साल 2022 में भारत इस सूची में 150वें स्थान पर था.

पिछले साल जून के महीने में अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता (आईआरएफ़) पर अमेरिकी विदेश विभाग की 2021 की रिपोर्ट जारी करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा था कि धार्मिक असहिष्णुता की वजह से भारत में लोगों और पूजा स्थलों पर हमलों में वृद्धि देखी गई है.

आईआरएफ़ के राजदूत राशद हुसैन ने तब कहा था कि भारत में कुछ अधिकारी लोगों और पूजा स्थलों पर बढ़ते हमलों को नज़रअंदाज कर रहे हैं, कुछ उनका समर्थन भी कर रहे हैं.

साल 2021 में अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने कहा था कि उन्होंने भारत के केंद्रीय मंत्रियों के साथ देश में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के मुद्दे पर चर्चा की.

इसी साल मार्च में अमेरिकी सरकार से फंडेड ग़ैर लाभकारी संगठन फ्रीडम हाउस ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में लगातार तीसरे साल भारत को आंशिक रूप से स्वतंत्र देश की 2021 की रिपोर्ट में भारत के फ्रीडम स्कोर को घटा दिया है. रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि भारत में लोकतंत्र अपनी पकड़ खो रहा है.

हालांकि भारत सरकार ने ऐसी सभी रिपोर्ट को ग़लत बताते हुए अपना विरोध जताया था.

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मोदी की यात्रा के दौरान फिर उठा मुद्दा

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा शुरू होने से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी के 75 अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति बाइडन को पत्र लिखकर भारत के हालिया लोकतांत्रिक रिकॉर्ड के बारे में उनसे (पीएम मोदी से) बात करने को कहा.

साथ ही अमेरिकी संसदीय समिति यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने भी राष्ट्रपति बाइडन से कहा कि वो प्रधानमंत्री मोदी की राजकीय यात्रा के दौरान भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार के मुद्दों पर बात करें.

यूएससीआईआरएफ़ का कहना है कि पिछले कई सालों से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने भेदभावपूर्ण नीतियों का समर्थन किया है जिसकी वजह से अल्पसंख्यक समूहों की धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर असर हुआ है.

साथ ही यूएससीआईआरएफ़ का ये भी कहना है कि हिजाब प्रतिबंध, धर्मांतरण विरोधी क़ानून और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसी भेदभावपूर्ण नीतियों को देखते हुए यह महत्वपूर्ण है कि भारत की सरकार भारत में सभी धार्मिक समुदायों के लिए मानवाधिकारों को आगे बढ़ाए और धार्मिक स्वतंत्रता, गरिमा और अंतरधार्मिक संवाद को बढ़ावा दे.

यूएससीआईआरएफ़ के आयुक्त स्टीफन श्नेक कहते हैं, "यह बेहद चिंताजनक है कि भारत सरकार ऐसी नीतियां लागू कर रही है जो ईसाइयों, मुसलमानों, सिखों और हिंदू दलित समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं."

श्नेक का कहना है कि इस राजकीय यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बाइडन को प्रधानमंत्री मोदी से धार्मिक स्वतंत्रता बढ़ाने की बात उठानी चाहिए और साथ ही ये आग्रह करना चाहिए कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली या उनका दमन करने वाली नीतियों में संशोधन किया जाए या उन्हें रद्द किया जाए.

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'अमेरिका रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है'

अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर कहती हैं कि अमेरिकी प्रशासन प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के लिए प्रोटोकॉल और प्रतीकात्मकता के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी और इसका उद्देश्य यह संकेत देना है कि वे भारत के साथ संबंधों को कितना महत्व देते हैं.

वे कहती हैं, "ये संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक नज़दीकी से प्रेरित है. हां, कुछ हलकों में भारत सरकार की घरेलू नीतियों को लेकर भी चिंताएं हैं लेकिन मेरा मानना है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है और चिंता के इन अन्य मुद्दों को प्राथमिकता में निचला क्रम मिलता है और इन्हें चतुराई से निपटाया जाएगा."

पूर्व राजदूत कहती हैं, "वास्तव में अब तक बाइडन प्रशासन जिस तरह से इन मुद्दों से निपट रहा है वह काफी नाज़ुक रहा है और अगर इन्हें उठाया जाता है तो यह निजी तौर पर होगा. मुझे उम्मीद नहीं है कि इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक लेक्चर होगा."

ये सवाल भी बार-बार उठता रहता है कि क्या अमेरिका के इन मुद्दों को सार्वजनिक तौर पर न उठाने के पीछे सिर्फ़ रणनीतिक वजहें हैं या दोनों देशों के बीच के व्यापारिक संबंधों की भी कोई भूमिका है.

मीरा शंकर कहती हैं, "भारत भविष्य में तेज़ी से विकास करने वाला है और भारत में बाज़ार का विस्तार होने वाला है. तो ज़ाहिर है कि ये अमेरिका के लिए दिलचस्पी का विषय है क्योंकि भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है. पिछले साल वस्तुओं और सेवाओं का दोतरफा व्यापार 190 अरब डॉलर से अधिक था. लेकिन हमारे पास कवर करने के लिए और भी बहुत कुछ है क्योंकि हमने 500 बिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा है. भारत का संपूर्ण आईटी और हाई-टेक क्षेत्र वास्तव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ाव के आधार पर विकसित हुआ है."

पूर्व राजदूत के मुताबिक़ भारत का क़रीब 60-70 फ़ीसद सॉफ्टवेयर या सेवा निर्यात अमेरिका को होता है.

वे कहती हैं, "ये दोनों देशों को एक साथ लाता है. लेकिन मैं कहूंगी कि इस समय रणनीतिक पहलू महत्वपूर्ण है और आप देख सकते हैं कि यह अमेरिकी आर्थिक नीति में भी दिखता है जहां वे चीन से जुड़ा जोख़िम कम करना चाहते हैं. उन्होंने चीन से डी-कपल करने या अलग होने की बात नहीं की है लेकिन वे चीन से जोख़िम कम करने और आपूर्ति के एकल स्रोत पर आत्मनिर्भरता को कम करने की तरफ़ देख रहे हैं."

मीरा शंकर कहती हैं कि अगर भारत वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बन सकता है तो इससे भारत को लाभ होगा और इससे अमेरिका को चीन से जुड़े जोखिम को कम करने में भी मदद मिलेगी.

'अमेरिका की ख़ामोशी की वजह राजनीतिक'

स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट विभाग में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर अशोक स्वैन कहते हैं कि भारत में मानवाधिकारों और लोकतंत्र के मुद्दों पर अमेरिका की ख़ामोशी की वजह राजनीतिक है.

वे कहते हैं, "व्हाइट हाउस में मुलाक़ात और फ़ोटो-ऑप बाइडन और मोदी दोनों की राजनीति के लिए अच्छा है. यह सरासर राजनीतिक सुविधा और रणनीतिक लाचारी है जो बाइडन को मानवाधिकारों, अल्पसंख्यक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर मोदी के भयानक रिकॉर्ड को नज़रअंदाज करने के लिए मजबूर कर रही है."

प्रोफ़ेसर स्वैन कहते हैं कि अमेरिका-भारत संबंधों में सुधार लगभग तीन दशकों से हो रहा है और मोदी की यात्रा इस किताब का एक और पन्ना मात्र होगी.

वे कहते हैं, "हालाँकि, ऐसे कई कारण हैं कि यह रिश्ता कभी भी पूर्ण विश्वास के रिश्ते में तब्दील नहीं हो पाएगा. भारत अपनी सुरक्षा के लिए कभी भी पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता. यूक्रेन युद्ध ने अमेरिका-भारत संबंधों में दरार को उजागर कर दिया है. अमेरिका भारत को अपने पक्ष में रखना चाहता है क्योंकि वह धीरे-धीरे दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में अलग-थलग पड़ता जा रहा है."

प्रोफ़ेसर स्वैन के मुताबिक़ "बाइडन भी भारत के साथ कुछ बड़े रक्षा सौदों पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद कर रहे हैं क्योंकि उनका चुनावी वर्ष नजदीक आ रहा है".

वे कहते हैं, "मोदी अपने समर्थकों को अमेरिका में अपनी स्वीकार्यता दिखाने के लिए भी उत्सुक हैं क्योंकि इससे उन्हें यह दावा करने में मदद मिलती है कि वह वैश्विक कद के नेता हैं. यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि जब वह प्रधानमंत्री नहीं थे तो अमेरिका ने एक दशक से अधिक समय तक उन्हें वीज़ा जारी करने से इनकार कर दिया था."

भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती नज़दीकी के बीच प्रोफ़ेसर स्वैन को संदेह है कि भारत शायद ही चीन जैसी वैश्विक शक्ति को सफलतापूर्वक चुनौती देने में प्रभावशाली अमेरिकी साझेदार हो सकेगा.

वे कहते हैं, "भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ गई है और इस वजह से भारत के लिए सैन्य क्षमताओं में चीन की बराबरी करना संभव नहीं है. भारत को अपने दो पड़ोसी विरोधियों से भी क्षेत्रीय सुरक्षा का खतरा है. मोदी ने अमेरिका के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत भारत का हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स जीई के साथ लड़ाकू जेट इंजन बनाएगा. भारत की अमेरिका से प्रीडेटर ड्रोन ख़रीदने की संभावना भी है. हालाँकि ये हथियार सौदे द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में कितनी मदद कर सकते हैं, यह अभी तक बहुत स्पष्ट नहीं है. दोनों देशों ने लगभग डेढ़ दशक पहले परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिससे उनके संबंधों में अभी तक कोई चमत्कार नहीं हुआ है."

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