जाति जनगणना पर सरकार से क्या हैं योगेंद्र यादव के तीन सवाल?

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जाति जनगणना की पैरवी करने वाले और स्वराज अभियान के सह-संस्थापक योगेंद्र यादव ने बीबीसी से विशेष बातचीत में कहा कि, "बीजेपी को मजबूरी में जाति जनगणना की मांग को स्वीकार करना पड़ा है."

उनके मुताबिक़, ये घोषणा सामाजिक न्याय आंदोलन की जीत है जिसमें बीते दो वर्षों से कांग्रेस और ख़ास तौर पर राहुल गांधी ने नई जान फूंकी.

योगेंद्र यादव इसे राहुल गांधी की 'व्यक्तिगत जीत' बताते हैं.

योगेंद्र यादव ने कहा, "जाति जनगणना विरोधी तमाम बयान देने के बाद, बीजेपी का पलटना उसकी विजय नहीं हो सकती. ज़ाहिर है मोदी जी को, जैसा किसान आंदोलन ने किया था, घुटने टेकने पर मजबूर किया गया है."

उनके मुताबिक, "इसमें कोई शक़ नहीं है कि बीजेपी को इसे मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा है."

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बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से विस्तृत बातचीत में जाति जनगणना की घोषणा के समय, उस पर अमल, उसकी आलोचना, और शंकाओं से जुड़े कई पहलुओं पर योगेंद्र यादव ने क्या कहा और सरकार से क्या सवाल पूछे?

पढ़िए योगेंद्र यादव के जवाब -

जाति जनगणना का एलान इस वक़्त क्यों किया गया?

इस वक़्त की वजह में पहलगाम के सवाल पर सरकार का अपने लिए थोड़ा वक्त हासिल करना या आगामी बिहार चुनाव हो सकते हैं. ये सब होना सामान्य है.

लेकिन ये निर्णय तात्कालिक नहीं है. ये एक दीर्घकालिक सोच के तहत लिया गया है. बीजेपी को लगता है कि इस मुद्दे को कांग्रेस और ख़ास तौर पर राहुल गांधी हथिया रहे थे.

और लंबे दौर में चुनाव जीतने के लिए बीजेपी के लिए सिर्फ अगड़ी जातियों का समर्थन काफी नहीं होगा. उन्हें ओबीसी वर्ग को अपनी तरफ करना बहुत ज़रूरी है.

इस चुनौती को देखते हुए बीजेपी और आरएसएस ने कुछ समय पहले फ़ैसला कर लिया था.

इसीलिए आरएसएस ने ये बयान दिया था कि हमें जाति जनगणना पर ऐतराज़ नहीं है, बशर्ते इस पर राजनीति ना हो.

शंकाओं को लेकर सरकार से क्या हैं सवाल?

तीन सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिए.

  • पहला: जनगणना कब होगी और जातीय जनगणना सम्पूर्ण होगी या अधूरी?

अब तक हर जनगणना में एससी-एसटी जातियों की गणना होती आई है. उनके भीतर की अलग-अलग जातियों तक की गणना होती आई है.

अब अगर सरकार इसके साथ-साथ ओबीसी जातियों की ही गणना जोड़े तो ये अधूरी जनगणना होगी.

सरकार को अगड़ी जातियों की भी गणना करनी चाहिए, तभी आप पिछड़ेपन को सही तरीके से माप पाएंगे.

  • दूसरा: जाति की जानकारी क्या सिर्फ़ जनगणना में इकट्ठा की जाएगी?

जनगणना अपने आप में बहुत सारी जानकारी नहीं देती है.

नौकरियों, विकास और विभिन्न तरह के मौकौं में किसे कितना हक़ मिल रहा है ये जानने के लिए 'इकॉनॉमिक सेंसस' और 'ऐग्रिकल्चरल सेंसस' में भी जातीय जनगणना की ज़रूरत होगी.

क्या सरकार ऐसा करेगी या ये फैसला सिर्फ़ आबादी वाली जनगणना के लिए है.

  • तीसरा सवाल: क्या मोदी सरकार आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा बढ़ाने के लिए तैयार है?

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत पर तय कर रखी है. हालांकि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए उन्होंने अलग से 10 प्रतिशत दिया है.

तो अगर जनगणना से पता चलता है कि ओबीसी 27 प्रतिशत से ज़्यादा हैं, जिसकी मुझे आशंका है, तो ज़ाहिर है समुदाय की मांग होगी कि उन्हें उसी हिसाब से आरक्षण बढ़ाकर दिया जाए.

अरक्षण पर क्या होगा असर?

सामाजिक न्याय की लड़ाई में सड़कों पर विरोध भी होगा और उसका समर्थन भी.

मंडल के दौर में जानकारी का अभाव था, लोग पूरी तरह नहीं समझ पाए थे कि आरक्षण का क्या असर होगा. आज ऐसा नहीं है.

ये ज़रूरी नहीं कि सीमा 70 या 80 प्रतिशत हो जाए. लेकिन इसका फ़ैसला इससे होगा कि आबादी में कितनी संख्या है.

अगर आबादी में ज़्यादा हैं तो आरक्षण बढ़ाना ग़लत नहीं होगा. क्योंकि देश में इस वक़्त किसी भी धड़े को देखें, मीडिया, न्यायालय, बैंक इत्यादि सब में अगड़े ज़्यादा हैं चाहे वो आबादी में कम हों.

देखना होगा कि जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या रुख़ रहता है.

असमानताओं के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी?

असमानताओं पर ये कह कर बात ना करना कि वो समाज को बांटती हैं, सही नहीं है.

किसी भी असमानता को ख़त्म करना हो तो पहला क़दम है उसे मानना, कि असमानता है.

दूसरा क़दम उसकी जानकारी जुटाना, गिनती करना. तीसरा क़दम है उसे कम करने के लिए काम करना और चौथा क़दम है उस पर ध्यान रख उन क़दमों का आकलन करना.

दुनियाभर में हम ये देखते हैं. जैसे अमेरिका में काले लोगों की बात करने का मतलब नस्लवाद को बढ़ाना देना नहीं है. उसी तरह जातीय असमानताओं के बारे में बात करना उन्हें बढ़ाने का नहीं, बल्कि कम करने का पहला क़दम है.

क्या जाति जनगणना लागू हो पाएगी?

जाति जनगणना करने में कई अड़चनें आएंगी. सड़कों पर विरोध होगा. लेकिन उस विरोध का भी विरोध होगा.

नौकरशाही में विरोध होगा. क्योंकि इस देश का अधिकारी वर्ग अब भी कुछ ख़ास लोगों के चंगुल में है.

मीडिया से भी विरोध आएगा. तमाम सर्वेक्षण हमें बताते हैं कि 20 प्रतिशत की आबादी वाले लोग मीडिया की 80 से 90 प्रतिशत नौकरियों में बैठे हैं.

अभी तक भारत की न्यायपालिका, सामाजिक न्याय के हक़ में ही रही है पर आने वाले समय में ना जाने उनका क्या रुख़ रहेगा.

मेरे ख़्याल से इन सब विरोधों को पीछे से आरएसएस-बीजेपी से शह भी मिलेगी, लेकिन इस सबके बावजूद इतिहास के प्रवाह को कोई रोक नहीं सकता, ऐसी मेरी आस्था है, ऐसी मेरी धारणा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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