You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ट्रंप फिर लड़ेंगे चुनाव पर राह में हैं ये छह रोड़े
- Author, एंथनी ज़र्चर
- पदनाम, बीबीसी उत्तरी अमेरिका संवाददाता
पूर्व अमेरिकी डोनल्ड ट्रंप ने तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में भाग लेने का एलान किया है.
अमेरिकी राजनीति के लिहाज़ से चुनाव हारने वाले किसी राष्ट्रपति का एक बार फिर चुनाव लड़ना थोड़ा दुर्लभ है.
कुछ ख़बरों के मुताबिक़, ट्रंप के पूर्व सहयोगियों ने बताया है कि इस बार उनका चुनाव अभियान 2020 जैसा नहीं बल्कि 2016 जैसा दिखेगा.
ट्रंप इस चुनाव में खुद को एक बाहरी शख़्स के रूप में पेश करते हुए अमेरिकी राजनीति में बड़े फेरबदल करने की बात करेंगे.
वह उन ताकतों को चुनौती देते दिखेंगे जो उनके प्रति दोस्ताना व्यवहार नहीं रखती हैं.
साल 2016 में डोनल्ड ट्रंप ने सबसे पहले अपनी पार्टी में प्रतिद्वंदियों को परास्त किया. इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को बेहद कम अंतर से पराजित किया.
ये एक ऐसी सफ़लता थी जिसकी उम्मीद नहीं की गयी थी. लेकिन इस सफ़लता ने एक उम्मीदवार के रूप में डोनल्ड ट्रंप की मजबूती का परिचय दिया.
उन्हें इस बात की बेहद बारीक समझ है कि ज़मीनी कंज़र्वेटिव्स के लिए कौन से मुद्दे अहम हैं. उनके चौंकाने वाले बयान और भड़कीले बयान न्यूज़ कवरेज़ पर छाए रह सकते हैं जिसकी वजह से उनके प्रतिद्वंदियों के लिए ख़बरों में बने रहना मुश्किल हो सकता है.
उनके प्रति समर्पित समर्थकों की संख्या अच्छी ख़ासी है और वह स्वाभाविक रूप से वोट न डालने वाले अमेरिकी नागरिकों को पोलिंग बूथ तक ला सकते हैं.
उनके पिछले कार्यकाल में उनके कई समर्थक रिपब्लिकन पार्टी में अहम पदों पर रहे हैं.
लेकिन उनके पक्ष में जाने वाले इन तमाम कारणों के बावजूद साल 2024 का राष्ट्रपति चुनाव जीतना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.
1. पिछले कार्यकाल से जुड़े सवाल
आठ साल पहले अमेरिकी सियासत में उनका अनुभव शून्य था. वह कभी किसी पद पर नहीं रहे थे. ऐसे में मतदाता उनकी उम्मीदवारी से अपनी उम्मीदें और ख़्वाहिशें जोड़ सकते थे.
वह भी अपनी पार्टी को चुनाव जिताने समेत कई बड़े वादे कर सकते थे. उनके आलोचकों के पास राजनीतिक असफ़लताओं को गिनाने के लिए कुछ भी नहीं था.
लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. ट्रंप ने अपने चार साल लंबे कार्यकाल में कई टैक्स में कमी से लेकर क्रिमिनल जस्टिस के क्षेत्र में सुधारों समेत कई सफ़लताएं हासिल की हैं.
लेकिन उन्होंने कुछ असफ़लताओं का भी सामना किया है. रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े लोग याद रखेंगे कि ट्रंप किस तरह डेमोक्रेटिक पार्टी के हेल्थकेयर क्षेत्र से जुड़े सुधारों को रोकने में असक्षम रहे थे.
वे ये भी याद रखेंगे कि ट्रंप ने आधारभूत ढांचा खड़ा करने से जुड़े जो वादे किए थे, वो कभी पूरे नहीं हुए.
इसके साथ ही कोरोना वायरस महामारी के दौरान उनके प्रशासन के रवैये की आलोचना हो सकती है.
डेमोक्रेटिक पार्टी लगातार महामारी रोकने की दिशा में उनकी सरकार की प्रतिक्रिया को नाकाफ़ी बताती रही है.
लेकिन कुछ दक्षिणपंथी ये भी मानते हैं कि ट्रंप ने महामारी रोकने की दिशा में सरकार की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का कुछ ज़्यादा ही समर्थन किया.
2. अमेरिकी संसद पर हमले की छाया
इस चुनाव में ट्रंप को अपने पिछले कार्यकाल की नीतियों का बचाव करना होगा.
लेकिन इससे भी ज़्यादा मजबूती से उन्हें अमेरिकी संसद पर छह जनवरी, 2020 को हुए हमले में अपनी भूमिका के साथ-साथ इसे रोकने की दिशा में उठाए गए कदमों को लेकर अपने प्रशासन का बचाव करना होगा.
छह जनवरी के दिन जिस तरह ट्रंप समर्थक उनके नाम वाले बैनर लहराते हुए कैपिटॉल हिल की इमारत में घुसे थे और उसके बाद जिस तरह अफ़रा-तफ़री की तस्वीरें सामने आई थीं, उन्हें आसानी से भुलाया नहीं जा सके.
मध्यावधि चुनाव में इस बात के संकेत मिले हैं कि छह जनवरी की घटना और उस पर ट्रंप के बयान और उससे पहले के राजनीतिक घटनाक्रम का असर अभी भी अमेरिकी मतदाताओं के मन पर है.
रिपब्लिकन पार्टी के ऐसे उम्मीदवार जिन्होंने 2020 की हार न स्वीकार करने पर ट्रंप का समर्थन किया, वे चुनाव हार गए हैं. ऐसे कई नेताओं ने उन रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाया जो चुनाव के नतीजे स्वीकार नहीं करने पर मुखर नहीं थे.
3. ट्रंप के सामने मौजूद कानूनी चुनौतियां
डोनाल्ड ट्रंप की आगामी चुनावों में अपनी उम्मीदवारी को लेकर गंभीरता की एक वजह उनके ख़िलाफ़ लगे कानूनी मुकद्दमे भी बताए जा रहे हैं. क्योंकि ऐसा करके वह अपने ख़िलाफ़ लगे आपराधिक और सिविल इंवेस्टिगेशन के मामलों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई ठहरा सकते हैं.
हालांकि, ट्रंप का ये हथकंडा सार्वजनिक छवि के लिहाज़ से काम कर सकता है. लेकिन इन मुकदमों में ट्रंप को जोख़िम काफ़ी ज़्यादा है.
ट्रंप इस समय जॉर्जिया में चुनाव से छेड़छाड़ के मामले में आपराधिक जांच का सामना कर रहे हैं. वहीं, न्यू यॉर्क में उनका व्यावसायिक साम्राज्य सिविल फ्रॉड केस का सामना कर रहा है.
इसके साथ ही वह यौन शोषण के एक मामले में डिफेमेशन से जुड़े मामले का सामना कर रहा है.
इसके अतिरिक्त फेडरल स्तर पर उनके ख़िलाफ़ कैपिटॉल हिल हमले और राष्ट्रपति पद से हटने के बाद गुप्त सामग्री के रखरखाव को लेकर जांच चल रही है.
इनमें से किसी भी एक मामले में सुनवाई हो सकती है जो अख़बारों की सुर्खियां बटोरते हुए ट्रंप के चुनाव अभियान को तात्कालिक रूप से टाल सकती है.
अगर सब कुछ ठीक रहा तो ये उनके लिए काफ़ी महंगा डिस्ट्रेक्शन साबित होगा. अगर हालात उनके पक्ष में नहीं रहे तो उनको भारी आर्थिक जुर्माने के साथ-साथ जेल जाना पड़ सकता है.
4. कद्दावर प्रतिद्वंद्वी
आठ साल पहले ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी के लिए फ़्लोरिडा के गवर्नर रहे जेब बुश के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा था.
जेब बुश को पार्टी का प्रत्याशी बनने के लिए फ़ेवरेट माना जा रहा था. पर वे काग़ज़ी शेर साबित हुए.
जेब बुश के लिए प्रतिष्ठित नाम और धन-दौलत काफ़ी साबित नहीं हुई. लेकिन इमिग्रेशन से लेकर शिक्षा की नीति पर अपनी पार्टी से अलग खड़े थे.
और रिपब्लिकन पार्टी में बुश नाम का उतना प्रभाव नहीं रह गया था, जो एक समय में हुआ करता था.
लेकिन अगर ट्रंप को 2024 में अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनना है तो उन्हें एक बार फ़्लोरिडा के गवर्नर का सामना करना होगा.
जेब बुश की तुलना में रॉन डीसेंटिस ने हाल ही में भारी मार्जिन से जीत दर्ज की है जो पार्टी में उनकी लोकप्रियता दर्शाता है.
हालांकि, अमेरिका की राष्ट्रीय राजनीति में डीसेंटिस कितना कमाल दिखा पाएंगे, ये देखना अभी शेष है लेकिन उनका राजनीतिक सफर उछाल पर है.
हालांकि, अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि डीसेंटिस आगामी चुनाव में उतरेंगे या नहीं. और ये भी स्पष्ट नहीं है कि अभी रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप को कौन चुनौती देगा.
5. लोकप्रियता में आई कमी
ट्रंप की ओर से उम्मीदवारी का एलान करने वाली शाम एक कंज़र्वेटिव ग्रुप ने कुछ पोल्स जारी किए हैं.
इन पोल्स में सामने आया है कि आयोवा और न्यू हैंपशायर में ट्रंप अपनी पार्टी के ही नेता रॉन डीसेंटिस से पीछे चल रहे हैं.
इन राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के नामांकन पर मतदान पहले होता है.
हाल ही में संपन्न हुए मध्यावधि चुनाव के एक्ज़िट पोल्स में भी ट्रंप उन राज्यों में लोकप्रिय नज़र नहीं आए हैं जहां राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए उन्हें समर्थन हासिल करना होगा.
न्यू हैंपशायर में सिर्फ तीस फीसद मतदाताओं ने कहा है कि वे ट्रंप को राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ते हुए देखना चाहते हैं. फ़्लोरिडा में भी ऐसे मतदाताओं की संख्या 33 फीसद है.
6. बढ़ती उम्र
डोनल्ड ट्रंप अगर अगला चुनाव जीतते हैं तो शपथ लेते वक़्त उनकी उम्र 78 साल हो जाएगी. हालांकि, अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन भी शपथ लेते वक़्त 78 साल के थे.
ऐसे में वह राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका के दूसरे सबसे वृद्ध राष्ट्रपति बन जाएंगे. हर शख़्स पर बढ़ती उम्र का असर अलग ढंग से दिखाई देता है.
इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ट्रंप इस उम्र में अपनी पार्टी की उम्मीदवारी जीतने के लिए चुनौती भरा अभियान चला पाएंगे जब उनका मुकाबला युवा राजनेताओं से हो रहा हो.
हालांकि, ट्रंप अतीत में शारीरिक रूप से काफ़ी सक्षम दिखे हैं. लेकिन हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती हैं.
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)