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पाकिस्तान को मात देने की स्थिति में कैसे पहुँची अफ़ग़ानिस्तान की टीम
- Author, संजय किशोर
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
क्रिकेट वर्ल्ड कप में सोमवार को खेले गए मैच में भारत नहीं खेल रहा था मगर चेन्नई के एमए चिदंबरम स्टेडियम पर भीड़ कम नहीं थी. दुर्गा पूजा और विजयदशमी की छुट्टियाँ भी इसकी वजह थी.
मगर मैच में दिलचस्पी की और भी वजहें थी. दरअसल, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दो पड़ोसी मुल्क ज़रूर हैं लेकिन दोस्त नहीं हैं. प्रतिद्वंद्विता क्रिकेट के मैदान पर भी नज़र आती है. मैदान में नीली जर्सी से ज़्यादा हरी दिखाई दे रही थी. मगर भीड़ खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ा सकती है, नतीजे नहीं तय कर सकती.
अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम मानो इस विश्व कप में उलटफ़ेर की पटकथा तैयार कर आई है. चेन्नई में हशमतुल्लाह शाहिदी की टीम ने दूसरा बड़ा धमाका कर दिया. अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को पटखनी दे दी.
टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए पाकिस्तान ने कप्तान बाबर आज़म और अब्दुल्लाह शफ़ीक़ के अर्धशतकों की बदौलत सात विकेट पर 282 रन का स्कोर खड़ा किया. अफ़ग़ानिस्तान की तरफ से पहला वर्ल्ड कप मैच खेल रहे 18 साल के नूर अहमद ने सबसे ज़्यादा तीन विकेट चटकाए.
इब्राहिम ज़ादरान और रहमानुल्लाह गुरबाज़ की ओपनिंग जोड़ी की साझेदारी की बदौलत अफ़ग़ानिस्तान ने एक ओवर रहते आठ विकेट से ज़बरदस्त जीत दर्ज कर इतिहास रच डाला.
लगातार तीसरा वर्ल्ड कप
अफ़ग़ानिस्तान तीसरी बार विश्व कप में हिस्सा ले रहा है. इस वर्ल्ड कप के पहले 17 मैचों में 16 में उनकी हार हुई थी. इकलौती जीत 2015 में मिली थी जब उन्होंने स्कॉटलैंड को हराया था.
इस बार भी पहले मैच में बांग्लादेश ने छह विकेट से हरा दिया और दूसरे मैच में दिल्ली में भारत ने आठ विकेट से शिकस्त दी. मगर टीम का मनोबल नहीं टूटा.
अफ़ग़ानिस्तान ने अगले मैच में मौजूदा चैंपियन इंग्लैंड को 69 रनों से हराकर तहलका मचा दिया और उसके बाद अब पाकिस्तान पर जीत अफ़ग़ानी टीम की बड़ी उपलब्धि है.
कम समय में अफ़ग़ानिस्तान की टीम ने तेज़ी से तरक़्क़ी की है. वर्ल्ड कप में टीम के मेंटॉर अजय जडेजा का मानना है कि अफ़ग़ानी खिलाड़ियों की सबसे बड़ी ख़ासियत है निडरता. वे किसी भी टीम की आँख में आँख डालकर टक्कर दे सकते हैं.
लेकिन टीम यहां तक उतार चढ़ाव का सफ़र तय करके पहुंची है.
अभी दुनिया के ज़हन में वो तस्वीरें ताज़ी हैं जब तालिबान को सत्ता सौंप कर अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर अमेरिकी सैनिक वापस जा रहे थे.
तालिबान के क़हर से बचने के लिए अफ़ग़ानिस्तानी नागरिक देश छोड़कर भाग रहे थे. यहाँ तक कि कुछ नासमझ अमेरिकी विमानों के डैनों पर सवार हो गए थे.
दुनिया के नक़्शे पर अफ़ग़ानिस्तान की तस्वीर बहुत भयावह है. शीत युद्ध के दौरान दशकों तक दो महाशक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच खींचतान का शिकार रहा अफ़ग़ानिस्तान चार दशक से भूख, ग़रीबी, लाचारी, बेबसी और ज़ुल्म से जूझता रहा है.
प्राकृतिक और मानवीय त्रासदी के बीच अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट उम्मीद की रोशनी है. क्रिकेट की कामयाबियों के बीच अफ़ग़ानी अपनी पीड़ा भूलने की कोशिश करते हैं. हर जीत उनके लिए मरहम है.
निडर हैं अफ़ग़ानिस्तानी क्रिकेटर
1979 में जब रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो लाखों लोगों ने पाकिस्तान पलायन किया. उन्होंने शरणार्थी शिविरों में क्रिकेट खेला और वहीं सीखा. ये लोग जब अफगानिस्तान लौटे तो क्रिकेट उनके साथ आया.
तमाम विरोधों और दुश्वारियों के बीच 1995 में अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) की स्थापना हुई. हालांकि पहले तालिबान ने क्रिकेट पर प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन इसकी लोकप्रियता को देखते हुए साल 2000 में उन्हें भी मान्यता देनी पड़ी.
छोटी लीगों में खेलने से लेकर टेस्ट का दर्जा हासिल करने तक टीम ने लंबा सफ़र तय किया है मगर बहुत कम समय में.
साल 2001 में अफ़ग़ानिस्तान को आईसीसी की सदस्यता मिल गई. अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहली कामयाबी मिली 2007 में जब नवरोज़ मंगल की कप्तानी में टीम एसीसी ट्वेंटी-20 कप की संयुक्त विजेता बनी.
ओमान के साथ फ़ाइनल टाई रहा था. 2009 में टीम को वनडे में अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिला. दक्षिण अफ़्रीका में वर्ड कप क्वॉलीफ़ायर में अफ़ग़ानिस्तान सुपर-8 तक पहुँचने में सफल रहा.
अफगानिस्तान क्रिकेट टीम ने 2009-10 और 2015-17 में ICC का इंटरकॉन्टिनेंटल कप जीता, जबकि 2011-13 में वो उपविजेता रहे थे.
अफ़ग़ान टीम की छलांग
अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम ने बला की तेज़ी से तरक़्क़ी की है. टीम ने 2010 में आईसीसी वर्ल्ड टी20 के लिए क्वालीफ़ाई किया. 2012 में अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के साथ अपना पहला वनडे मैच खेला जिसमें वे सात विकेट से हार गए. 2013 तक अफ़ग़ानी टीम ICC एसोसिएट सदस्य भी बन गई.
2017 में अफ़ग़ानिस्तान और आयरलैंड को टेस्ट स्टेट्स भी मिल गया. अफ़ग़ानिस्तान और आयरलैंड 11वें और 12वें टेस्ट स्टेटस पाने वाले देश बने. 2018 में अफ़ग़ानिस्तान ने भारत के साथ पहला टेस्ट खेला.
अफ़ग़ानिस्तान में पिछले दो दशक में क्रिकेट की लोकप्रियता बेतहाशा बढ़ी है. अब क्रिकेट वहाँ सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला खेल है. जब अफ़ग़ानिस्तान जीतता है तो देश में त्योहार सा माहौल हो जाता है. ऐसे भी लोग हैं जो क्रिकेट नहीं समझते लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के झंडे को लहराते देखने के लिये मैच देखते हैं.
टीम की कामयाबी में भारत का रोल
क्रिकेट अब वह खेल बन गया, जो बेहतर भविष्य के लिए प्रयासरत युद्धग्रस्त देश की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है. क्रिकेट अफ़ग़ानी लोगों के समर्पण, दृढ़ता और अडिग भावना का प्रतीक है.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अफ़ग़ानिस्तान के इस सफ़र में भारत और बीसीसीआई साथी रहा है. वनडे और टेस्ट क्रिकेट का दर्जा दिलाने में भारत की भूमिका अहम रही है. अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम को हालांकि आईसीसी और बाक़ी देशों से और सहयोग की ज़रूरत है. उनके पास क्रिकेट का बुनियादी ढांचा नहीं है.
एक ही विश्व स्तरीय मैदान काबुल में है. लेकिन यहाँ अब तक कोई भी अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेला गया. भारत अफ़ग़ानिस्तान दूसरा घर रहा है. अपने देश में सुविधाओं के अभाव में अफ़ग़ानी टीम ने लखनऊ, ग्रेटर नोएडा और देहरादून को अपना घरेलू मैदान बनाया था.
प्रतिकूल हालात के बावजूद राशिद खान, नवीन उल हक़ और मोहम्मद नबी जैसे अफ़ग़ानी क्रिकेटर अपनी प्रतिभा और क्षमता से विश्व क्रिकेट का चेहरा बन गए हैं. ये खिलाड़ी अफ़ग़ानिस्तान में युवा क्रिकेटरों को उम्मीद की किरण हैं. वे राशिद खान, मुजीब, नबी जैसे क्रिकेटरों को आईपीएल में चमक बिखेरते देखते हैं तो प्रेरित होते हैं.
इंग्लैंड पर जीत के बाद अफ़ग़ानिस्तान के पत्रकार इनायतुल्लाहक यासिनी ने कहा, ‘करीब चार दशक तक युद्ध की विभीषिका झेलने वाले देशवासियों के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम सिर्फ़ क्रिकेट ने किया है और यह जीत देश के क्रिकेट इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी.’
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