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जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड में क्या फ़र्क है?
- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में हर साल लाखों छात्र इंजीनियर बनने का सपना लेकर जेईई (JEE) यानी जॉइंट एंट्रेंस एग्ज़ामिनेशन की तैयारी करते हैं और फिर ये इम्तहान देते हैं.
लेकिन एक सवाल जो स्टूडेंट और उनके माता-पिता समेत कई लोगों को परेशान करता है, वो ये कि जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड में फ़र्क क्या होता है.
साथ ही कौन से इम्तिहान से कहां दाख़िला मिलता है और इनकी तैयारी की सही रणनीति क्या होनी चाहिए, इसे लेकर भी पसोपेश रहती है.
जानकारों का कहना है कि जेईई कोई साधारण इम्तिहान नहीं, बल्कि कड़ी प्रतिस्पर्धा और सीमित मौकों की परीक्षा भी है, ऐसे में सही जानकारी होना और उसी हिसाब से योजना बनाया जाना ज़रूरी हो जाता है.
आज इस रिपोर्ट में समझेंगे उन सभी पहलुओं को जो जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड से जुड़े हैं और समझेंगे इनके बीच का अंतर.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा जेईई दो चरणों में होती है - जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड. दोनों परीक्षाओं का मक़सद, रूपरेखा और कठिनाई का स्तर अलग-अलग होता है.
जेईई मेन का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) करती है. वहीं जेईई एडवांस्ड की ज़िम्मेदारी हर साल बारी-बारी से देश के अलग-अलग आईआईटी संभालते हैं.
जेईई की तैयारी करवाने वाले ACE4 इंस्टीट्यूट के को-फ़ाउंडर गणेश पांडे बताते हैं कि जेईई मेन, जेईई एडवांस्ड के लिए एक तरह का स्क्रीनिंग टेस्ट है. जेईई एडवांस्ड के ज़रिए देश के 23 आईआईटी में दाख़िला मिलता है.
वहीं जेईई मेन के ज़रिए 31 एनआईटी, 26 आईआईआईटी, करीब 26 सरकारी फंडेड टेक्निकल संस्थान और कई अन्य सरकारी या निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला मिलता है.
जेईई मेन 2026 के लिए 14 लाख से ज़्यादा स्टूडेंट्स ने रजिस्ट्रेशन कराया है. गणेश पांडे कहते हैं कि इनमें से केवल करीब ढाई लाख छात्र ही जेईई एडवांस्ड देने के योग्य होते हैं.
कितनी बार दे सकते हैं परीक्षा?
जेईई मेन: कुल तीन बार. 12वीं में रहते हुए और उसके बाद लगातार दो साल.
जेईई एडवांस्ड: सिर्फ़ दो बार. 12वीं क्लास में रहते हुए और उसके अगले साल.
और इसके लिए पात्रता क्या चाहिए होती है?
जेईई देने के लिए 12वीं में फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स विषय ज़रूर होने चाहिए.
सामान्य वर्ग के लिए 75% अंक या बोर्ड के टॉप 20 पर्सेंटाइल में होना ज़रूरी है. आरक्षित वर्ग के लिए यह सीमा 65% है.
गणेश पांडे के मुताबिक, "पर्सेंटाइल वाला नियम इसलिए है कि मान लीजिए किसी बोर्ड के नतीजों में टॉपर ही 75 फ़ीसदी वाला हो और बाकी स्टूडेंट उससे पीछे हैं. मगर ये स्टूडेंट टॉप 20 पर्सेंटाइल में आते हैं, तो फिर वे जेईई मेन देने के लिए पात्र होते हैं."
इन परीक्षा का पैटर्न क्या होता है?
जेईई मेन
- तीन घंटे का कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट
- फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स. तीनों का बराबर वेटेज
- एमसीक्यू और न्यूमेरिकल वैल्यू आधारित सवाल
- एमसीक्यू में नेगेटिव मार्किंग, न्यूमेरिकल में नहीं
जेईई एडवांस्ड
- दो पेपर (पेपर-1 और पेपर-2), दोनों परीक्षाएं तीन-तीन घंटे की होती है
- एमसीक्यू, न्यूमेरिकल और मैट्रिक्स-मैच टाइप सवाल
- सवालों की संख्या और मार्किंग हर साल बदलती है
दोनों परीक्षाओं का सिलेबस मुख्य रूप से 11वीं-12वीं के फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स पर आधारित होता है.
फ़र्क बस कठिनाई के स्तर का यानी डिफ़िकल्टी लेवल का है. जेईई एडवांस्ड में सवाल ज़्यादा कॉन्सेप्चुअल और गहराई लिए होते हैं.
जेईई मेन साल में दो बार होता है. पहली बार होता है जनवरी में और दूसरी बार अप्रैल में. स्टूडेंट इन दोनों एग्ज़ाम में अपीयर हो सकते हैं और दोनों में से जिसमें ज़्यादा नंबर आए, उसके आधार पर रैंक बनती है. रैंक, अप्रैल वाले सेशन के बाद बनती है.
क्या होनी चाहिए रणनीति?
जेईई ऐसा एंट्रेंस टेस्ट नहीं है, जिसे बार-बार अटेम्प्ट किया जा सके. इसकी एक लिमिट तय है. इसलिए बच्चों पर दबाव रहता है कि वे पहले ही अटेम्प्ट में अच्छी रैंक हासिल कर लें.
तन्मय अग्रवाल आईआईटी बीएचयू से कम्प्यूटर साइंस पढ़ रहे हैं और इसी साल पहले प्रयास में उन्होंने जेईई एडवांस परीक्षा में एक हज़ार के अंदर रैंक हासिल की.
इसके पीछे उनकी क्या रणनीति रही, इस पर वो बताते हैं कि सबसे पहले तो मॉक टेस्ट देते रहिए और उसका विश्लेषण करें.
उन्होंने कहा, "अभी मेन में क़रीब एक महीने का समय बचा है. ऐसे में जो स्टूडेंट इस इम्तिहान को देने की तैयारी में हैं, उनका सिलेबस नवंबर तक पूरा हो गया होगा. अब वक्त है रिवीज़न का. सिर्फ़ मॉक देते रहने भर से ही काम नहीं बनेगा, बल्कि हर सब्जेक्ट में जो कमियां या कमज़ोरियां हैं, उन्हें एनालाइज़ करें, उन्हें सुधारने पर ज़ोर लगाएं. वरना कितने ही मॉक दे लें, सब बेकार हैं."
टाइम मैनेजमेंट के सवाल पर तन्मय बताते हैं, "ऐसा भी न हो कि पूरा-पूरा दिन पढ़ने में ही गुज़र जाए. बल्कि ब्रेक ले लेकर पढ़ें, एक टास्क लें और तय कर लें कि इसे कितने घंटे में पूरा करना है. पिछले सालों के मेन के पेपर सुलझाएं, उतने ही टाइम में जैसे सच में परीक्षा ही हो रही है."
वहीं रणनीति के सवाल पर वो कहते हैं कि ये अपने-अपने हिसाब से हो सकती है, बस कोशिश ये रहे कि जो भी आपकी रणनीति है, वो पेपर वाले दिन भी काम आए.
शिक्षक गणेश पांडे भी स्टूडेंट को लगातार मॉक टेस्ट देते रहने की सलाह देते हैं.
उन्होंने कहा, "हम लोगों के बीच ये बात बहुत कही जाती है कि इतने मॉक देते जाइए कि जब असल पेपर हो तो वो मॉक लगे."
उनकी मानें तो ज़्यादातर बच्चों को अपने ऊपर शक रहता है. उन्हें हमेशा ये डर सताता है, बेचैनी होती है कि उन्हें सब आता है या नहीं, उन्होंने सब पढ़ा है या नहीं, उन्हें सब याद भी है कि नहीं. मॉक टेस्ट में कम नंबर आए तो क्या करें?
गणेश पांडे के मुताबिक, "इन सवालों का कोई पक्का जवाब नहीं है. जवाब बस यही है कि प्रैक्टिस पूरी होनी चाहिए और इन बच्चों की काउंसलिंग करते रहें."
एडवांस क्लीयर हुआ मगर सीट न मिले तो क्या करें?
साल 2025 को ही देखें तो कुल 54,378 स्टूडेंट ने जेईई एडवांस्ड क्लीयर किया. मगर देश भर के 23 आईआईटी के सभी ब्रांचों को मिलाकर भी कुल सीटें 18,160 हैं.
ऐसे में एडवांस्ड क्लीयर करने वाले 50 फ़ीसदी से अधिक स्टूडेंट सफल होकर भी अधर में रहे.
हमने गणेश पांडे से पूछा कि इन स्टूडेंट के पास क्या विकल्प बचते हैं.
उन्होंने कहा, "ऐसे स्टूडेंट के लिए जेईई मेन की परफॉर्मेंस के आधार पर एनआईटी, आईआईआईटी, जीएफ़टीआई, डीटीयू, एनएसयूटी समेत अनेक दूसरे अच्छे कॉलेज का ऑप्शन होता है. या जो स्टूडेंट रिसर्च में करियर बनाना चाहते हैं, वो आईआईएसईआर, एनआईएसईआर जॉइन कर सकते हैं."
उनका कहना है कि कई बार आईआईटी में भी मौका मिल जाता है, क्योंकि कई स्टूडेंट बेहतर ब्रांच या टॉप आईआईटी के चक्कर में विकल्प छोड़ देते हैं, तो उनकी छोड़ी सीट पर किसी अगली रैंकिंग वाले को दाख़िला मिल सकता है. लेकिन ये सब काउंसलिंग के पूरा होने से पहले ही संभव है.
बीबीसी हिन्दी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.