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केशव प्रसाद मौर्य अचानक योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा क्यों करने लगे
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जमकर तारीफ़ की है.
इससे पहले दोनों नेताओं के बीच कथित मतभेद की वजह से यूपी में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें भी लगाई जा रही थीं.
उपचुनाव की तैयारी के बीच मिर्ज़ापुर विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी कार्यकर्ताओं के सामने केशव प्रसाद मौर्य ने रविवार को कहा, “प्रदेश के हमारे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में देश के सभी मुख्यमंत्रियों की तुलना में सबसे अच्छा काम हुआ है. ”
मौर्य ने कहा कि हमारी डबल इंजन की सरकार स्वतंत्र भारत में सबसे अच्छा काम कर रही है.
उन्होंने योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा में कार्यकर्ताओं से पूछा, “दुनिया में मोदी जी जैसा दूसरा कोई नेता है क्या, देश में योगी आदित्यनाथ जी जैसा कोई दूसरा मुख्यमंत्री है क्या?”
कैसे बदले मौर्य के सुर?
मौर्य का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके मतभेद की ख़बरें सुर्खियों में रही हैं. कयास यहाँ तक लगाए जा रहे थे कि बीजेपी की यूपी सरकार में बड़ा बदलाव हो सकता है.
इससे पहले पिछले महीने 14 जुलाई को लखनऊ में बीजेपी राज्य कार्यकारिणी की बैठक में दोनों नेताओं ने प्रदेश में लोकसभा में बीजेपी के ख़राब प्रदर्शन की अलग-अलग वजहें गिनवाई थीं.
इस बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद थे. सीएम योगी आदित्यनाथ ने बैठक में अति आत्मविश्वास को यूपी में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन का कारण बताया था.
दूसरी तरफ़ केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि संगठन, सरकार से बड़ा होता है.
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था, “संगठन, प्रदेश और देश के नेतृत्व के सामने कह रहा हूं, संगठन सरकार से बड़ा है. संगठन से बड़ा कोई नहीं होता है.”
केशव प्रसाद मौर्य के बयान को योगी सरकार के ख़िलाफ़ टिप्पणी के तौर पर देखा गया था और इसने कई तरह की चर्चा और अटकलों को जन्म दिया.
इस बयान के बाद से माना जाता है कि यूपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच बड़ी खाई है. ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य के रुख़ में अचानक यह बदलाव कैसे आया?
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं, “केशव प्रसाद मौर्य बुरी तरह आहत हैं और योगी के ख़िलाफ़ उनका विद्रोह शांत नहीं होने वाला है. इसमें उनको केंद्रीय नेतृत्व का भी समर्थन हासिल है. लेकिन यूपी में होने वाले विधानसभा उपचुनाव को देखते हुए उनका सुर बदला है.”
'राजनीति में बग़ावत सफल नहीं होते'
“लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है. ऐसे में पार्टी लोगों को यह मैसेज देना चाहती है कि योगी ही कमांडर हैं.”
नवीन जोशी के मुताबिक़ लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हिन्दुत्व को लेकर आक्रामकता कम हो गई थी और आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष की चाल भी काम कर रही थी.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की राजनीति को क़रीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल केशव प्रसाद मौर्य के बयान में आए इस बदलाव को थोड़ा अलग तरीके से देखते हैं.
उनका मानना है, “केंद्र ने केशव मौर्य को फ़िलहाल चुपचाप रहने को कह दिया गया है. जब तक संभानवाएं बनी होती हैं और उम्मीद होती है तब तक असंतोष और गतिरोध नज़र आते हैं.”
बृजेश शुक्ल के मुताबिक़ सियासत में बग़ावत करके कोई सफल नहीं होता है, ऐसा कोई उदारहण नहीं है कि बग़ावत करके कोई सफल रहा हो.
उनके अनुसार, मौर्य का तरीका और समय दोनों ग़लत था, इससे पार्टी की छीछालेदर हो रही थी. संगठन हमेशा बड़ा होता है लेकिन समय, काल और परिस्थियों की वजह से यह विवाद का रूप ले लेता है.
यूपी में बीजेपी का संकट
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 10 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. यह उपचुनाव एक तरह से बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है.
इससे पहले जुलाई में देश के सात राज्यों की 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इनमें इंडिया गठबंधन ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के खाते में केवल दो सीटें आई थीं.
लोकसभा चुनावों में बीजेपी को लगे झटके के बाद इन नतीजों को भी बीजेपी के गिरते ग्राफ़ की तरह देखा गया था.
राजनीतिक तौर पर उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन इस साल के लोकसभा चुनावों में उसे राज्य में बड़ा झटका लगा था.
चार जून 2024 को आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में यूपी में बीजेपी को 80 में से 33 सीटें मिली थीं, जो साल 2019 की तुलना में 29 कम हैं.
लोकसभा चुनावों में बीजेपी को लगे इस झटके की वजह से ही वो अपने दम पर केंद्र में बहुमत हासिल नहीं कर पाई.
उसके बाद से ही यूपी में बीजेपी की इस असफलता को लेकर कई तरह के आकलन किए जा रहे हैं.
इसे यूपी की सरकार के कामकाज से भी जोड़कर देखा गया है, तो कुछ लोग लोकसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को इस परिणाम के पीछे की वजह मानते हैं.
इन नतीज़ों का विश्लेषण बताता है कि लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने यूपी की 240 सीटों पर अपनी बढ़त बना ली है.
नवीन जोशी कहते हैं, “यही बढ़त बीजेपी के लिए बड़ी चिंता की बात है. मोदी और शाह भी योगी को पसंद नहीं करते हैं, यह बहुत स्पष्ट है. लेकिन जिस तरह से केशव प्रसाद मौर्य ने योगी की खुली मुख़ालफ़त की है उससे लगता है कि पार्टी में चिंता है.”
दूसरी तरफ मौजूदा समय में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव काफ़ी आक्रमक नज़र आ रहे हैं. वो संसद में भी कई मौक़ों पर सदन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी ज़्यादा आक्रमक दिखे हैं.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़े सवालों पर भी अखिलेश यादव मीडिया के सामने काफ़ी तीखे शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए दिखते हैं.
नवीन जोशी के मुताबिक अखिलेश यादव ने यूपी में अपनी पार्टी यूनिट को भी काफ़ी कसा है और केशव प्रसाद मौर्य के बयान को इन सभी संदर्भों से जोड़कर देखा जाना चाहिए.
क्यों खड़े हुए थे सवाल?
लखनऊ की बैठक में बयान देने के बाद 16 जुलाई को दिल्ली में केशव प्रसाद मौर्य और यूपी प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात की थी.
17 जुलाई को केशव प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर सोशल मीडिया के ज़रिए संदेश दिया, “संगठन सरकार से बड़ा. कार्यकर्ताओं का दर्द मेरा दर्द है, संगठन से बड़ा कोई नहीं, कार्यकर्ता ही गौरव है.”
इसी दिन यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के राज्यपाल से मुलाक़ात की थी. राज्यपाल के दफ़्तर की ओर से इस मुलाक़ात की तस्वीरें साझा कर कहा गया कि यह शिष्टाचार के नाते मुलाक़ात थी.
बीते डेढ़ महीने में अलग-अलग तारीख़ों पर हुई इन मुलाक़ातों और बयानबाज़ी ने कई तरह की अटकलों को जन्म दिया था.
सवाल ये भी उठ रहे थे कि क्या सीएम के तौर पर योगी आदित्यनाथ की कुर्सी सुरक्षित है?
इस सवाल को सबसे पहले बड़े स्तर पर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उठाया था.
केजरीवाल ने 11 मई 2024 को एक चुनावी सभा में कहा था, ''अगर ये चुनाव जीत गए तो मेरे से लिखवा लो- दो महीने के अंदर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बदल देंगे ये लोग. योगी आदित्यनाथ की राजनीति ख़त्म करेंगे, उनको भी निपटा देंगे.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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