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तुर्की ने सऊदी अरब और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट में शामिल होने पर कही अहम बात
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को कहा था कि तुर्की और क़तर के साथ सऊदी अरब की बढ़ती क़रीबी पर उनकी नज़र है.
द टाइम्स ऑफ़ इसरायल के एक सवाल के जवाब में प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नेतन्याहू ने कहा था, "जो हमारे साथ संबंध सामान्य करना चाहते हैं, उनसे यह अपेक्षा करते हैं कि वे उन कोशिशों में भाग न लें जो शांति के ख़िलाफ़ हैं.''
2023 में सात अक्तूबर को हमास ने दक्षिणी इसराइल पर हमला किया था. इस हमले के बाद इसराइल ने ग़ज़ा में जंग छेड़ दी थी. इसके बाद इसराइल के सऊदी अरब से संबंध सामान्य होने कोशिशों पर पानी फिरता गया.
सऊदी अरब शुरू से ही कहता रहा है कि इसराइल से वह संबंध तभी स्थापित करेगा, जब फ़लस्तीन 1967 वाली सीमा के साथ एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बनेगा.
लेकिन 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से यूएई, मोरक्को, सूडान और बहरीन को इसराइल से संबंध सामान्य करने के लिए तैयार किया था, उससे उम्मीद जगी थी कि आने वाले समय में सऊदी अरब भी ऐसा ही करेगा. लेकिन अक्तूबर 2023 के बाद चीज़ें बहुत जटिल हो गई हैं.
मध्य-पूर्व में बनते नए समीकरण
हाल के महीनों में सऊदी अरब मध्य-पूर्व में नाटकीय रूप से एक नए समीकरण की तरफ़ बढ़ता दिख रहा है.
यूएई के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है और तुर्की के साथ क़रीबी. दूसरी तरफ़ इसराइल से यूएई के संबंध सामान्य हैं और तुर्की के साथ तनातनी.
गुरुवार को अल-जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में तुर्की के विदेश मंत्री हकान फ़िदान ने मध्य-पूर्व के बदलते समीकरण पर कहा, "न तुर्की, न अरब, न फ़ारसी और न ही कोई अन्य वर्चस्व. क्षेत्र के देश एक साथ आ रहे हैं और ज़िम्मेदारी से काम कर रहे हैं. देखिए कि यूरोपीय संघ ने कैसे शून्य से शुरू होकर आज तक ख़ुद को संगठित किया है. हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं?"
तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी अरब रक्षा समझौते की योजनाओं परफ़िदान ने कहा, ''क्षेत्र में कोई भी समझौता अधिक समावेशी होना चाहिए. हम कोई नया गुट नहीं बनाना चाहते. हम एक क्षेत्रीय एकजुटता का मंच बनाना चाहते हैं. यह दो या तीन देशों से शुरू हो सकता है, लेकिन समय के साथ अगर यह किसी व्यापक ढांचे में विकसित होता है, तो वह ज़्यादा अच्छा होगा.''
फ़िदान ने कहा, ''हमें अपनी समस्याओं को ख़ुद सुलझाने में सक्षम होना होगा. हमें क्षेत्रीय स्वामित्व दिखाना होगा. इसके लिए एक निश्चित स्तर की एकजुटता और संस्थागत ढांचे की ज़रूरत होती है.''
''जब आप संस्था की बात करते हैं, तो इसका अर्थ यह भी होता है कि आप कुछ समझौते और मंच स्थापित करें. आपको अपनी सुरक्षा को बाहर के हाथों में नहीं सौंपना चाहिए.''
मंगलवार की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नेतन्याहू ने कहा था, ''जो इसराइल की वैधता को ख़ारिज करते हैं और उन तमाम ताक़तों को समर्थन करते हैं जो इसराइल के ख़िलाफ़ हैं, उनसे राजनयिक संबंध कायम करने का कोई मतलब नहीं है. अगर सऊदी अरब सुरक्षित और मज़बूत इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करना चाहता है, तब उन्हें ख़ुशी होगी.''
मध्य-पूर्व की न्यूज़ विश्लेषण वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई के तुर्की ब्यूरो चीफ़ रेयिप सोइलु ने एक्स पर लिखा है, ''यह एक और संकेत है कि सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ती गर्मजोशी से नेतन्याहू परेशान हैं.''
एक दशक पहले सऊदी अरब ओबामा प्रशासन के ईरान समझौते का प्रमुख आलोचक था. तब सऊदी और इसराइल आम तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम से चिंतित रहते थे.
यूएई बनाम सऊदी अरब
समय के साथ यूएई भी सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ काफ़ी नज़दीकी से जुड़ गया. यूएई मुस्लिम ब्रदरहुड के ख़िलाफ़ विरोध का नेतृत्व कर रहा था.
यूएई और सऊदी अरब दोनों मिस्र के क़रीबी मित्र थे, जहाँ मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.
उस समय तुर्की को मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के ज़्यादा क़रीब माना जाता था और काहिरा में अब्देल फ़तह अल-सीसी के नेतृत्व वाली सरकार से संबंध बहुत अच्छे नहीं थे.
2017 में सऊदी अरब ने क़तर से संबंध तोड़ने के लिए कई देशों का नेतृत्व किया और यूएई का भी साथ मिला था. तब अमेरिका में ट्रंप का पहला कार्यकाल था. ईरान के मामले में भी सऊदी और यूएई एक साथ थे.
अब्राहम एकॉर्ड के समय तक यूएई और सऊदी अरब में अच्छी समझ थी. दूसरी तरफ़ तुर्की और क़तर बहुत क़रीब हो गए थे. हालांकि इसके बाद चीज़ें बदलने लगीं.
सऊदी अरब ने इराक़ और चीन की मध्यस्थता से हुए एक समझौते के तहत ईरान के साथ रिश्ते सुधार लिए.
मार्च 2023 में सात सालों के बाद सऊदी और ईरान के बीच राजनयिक संबंध बहाल हुआ. दूसरी तरफ़ यूएई ने सीरिया में तत्कालीन बशर अल-असद शासन के साथ संपर्क बढ़ाया.
यूएई ने लीबिया के गृह युद्ध में पूर्वी लीबियाई सरकार का भी समर्थन किया. जब सूडान में गृह युद्ध शुरू हुआ, तो यूएई पर वहाँ आरएसएफ का समर्थन करने के आरोप लगे जबकि मिस्र और सऊदी को सूडानी सेना के समर्थक के रूप में देखा जा रहा था.
तुर्की और सऊदी की दोस्ती
तुर्की सऊदी अरब और यूएई की कम आलोचना करने लगा. सऊदी अरब के संबंध चीन, रूस और भारत से भी गहरे हो रहे थे. ग़ज़ा में युद्ध के बाद सऊदी अरब इसराइल की खुलकर आलोचना करने लगा.
पिछले साल अक्तूबर में इसराइल के वित्त मंत्री बेज़लेल स्मोत्रिच ने कहा था कि इसराइल सऊदी अरब के साथ किसी राजनयिक संबंध बनाने वाले समझौते पर तभी राज़ी होगा, जब उसमें फ़लस्तीन स्टेट की स्थापना की शर्त शामिल नहीं होगी.
स्मोत्रिच ने कहा था, "अगर सऊदी अरब हमसे कहता है कि 'फ़लस्तीन एक राष्ट्र बनता है, तभी रिश्ते सामान्य होंगे,' तो हमें ये नहीं चाहिए. उनका शुक्रिया. सऊदी अरब के लोग रेगिस्तान में ऊँटों पर सवारी करते रहें. हम अपनी अर्थव्यवस्था, समाज और देश के विकास का काम करते रहेंगे."
हालांकि विवाद बढ़ने के बाद दक्षिणपंथी 'रिलिजियस ज़ायोनिज़्म' पार्टी के नेता स्मोत्रिच ने माफ़ी माँग ली थी. लेकिन इससे ये संदेश गया कि इसराइल सऊदी अरब के बारे में जो सोचता है, वो ग़लती से ही लेकिन सामने आ गया.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर रहे एके पाशा कहते हैं कि तुर्की, सऊदी और क़तर की क़रीबी से इसराइल का परेशान होना स्वाभाविक है.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''इसराइल ने पिछले साल सितंबर में क़तर की राजधानी दोहा में हमला किया था. इससे गल्फ़ के देशों में एक संदेश गया कि इसराइल कुछ ज़्यादा ही दुःसाहस कर रहा है. सऊदी को लगा कि इसराइल जब दोहा में हमला कर सकता है तो रियाद को सुरक्षित मान लेना समझदारी नहीं है.''
सऊदी का डर
''ऐसे में सऊदी अरब एक सैन्य गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है. इस इलाक़े में तुर्की के पास बड़ी सैन्य शक्ति है. परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के साथ वह डिफेंस पैक्ट पहले ही कर चुका है. इसमें तुर्की भी शामिल होगा तो सऊदी को मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित होने का अहसास हो सकता है.''
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''लेकिन तुर्की इसराइल विरोधी एक हद से ज़्यादा नहीं हो सकता है. तुर्की नेटो का सदस्य है और नेटो इसराइल के साथ हमेशा खड़ा रहता है. तुर्की इसराइल विरोधी उसी हद तक होगा, जितनी अनुमति अमेरिका की होगी. तुर्की और क़तर के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से भी इसराइल बहुत ख़ुश नहीं है लेकिन उसे पता है कि बोर्ड ऑफ पीस में चलेगी ट्रंप की.''
उन्होंने कहा, ''सऊदी और तुर्की भले क़रीब आ रहे हैं, लेकिन इसकी भी एक सीमा है. मुस्लिम ब्रदरहुड से तुर्की के संबंध आज भी हैं. हमास से भी हैं. मुझे नहीं लगता है कि सऊदी अरब तुर्की के इस पक्ष की उपेक्षा कर सकता है.''
पिछले साल जुलाई में इसराइल के प्रवासी मामलों के मंत्री अमीचाई चिक्ली ने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा को मिटाने की अपील की थी.
उन्होंने अल शरा को 'आतंकवादी' और 'क्रूर हत्यारा' बताया था. सीरिया में अल शरा की सरकार को भी तुर्की परस्त माना जाता है.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, ''इसराइल से इस तरह के बयान आते हैं तो सऊदी अरब को लगता है कि यह इलाक़ा कहीं फिर से अस्थिरता में ना समा जाए. सऊदी अरब आर्थिक रूप से एक मज़बूत देश है और अमेरिका का प्रमुख सहयोगी होने के साथ-साथ अमेरिकी रक्षा उत्पादों का बड़ा ख़रीदार भी है. उसे लगता है कि उसका सम्मान किया जाना चाहिए और क्षेत्र की स्थिरता में उसकी एक भूमिका है. सऊदी अरब को लगता है कि इसराइल उसकी हर बात को बहुत ही हल्के में लेता है.''
सुपर स्पार्टा की आकांक्षा
पिछले साल सितंबर महीने में बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा था कि इसराइल के पास आत्मनिर्भर बनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
नेतन्याहू ने कहा था, ''इसराइल अपनी तकनीकी क्षमता के कारण दुनिया भर में 'स्टार्टअप नेशन' के रूप में जाना जाता है. लेकिन अब हमें व्यापार प्रतिबंधों और बहिष्कारों के दौर का सामना करते हुए 21वीं सदी का "सुपर-स्पार्टा" बनने की महत्वाकांक्षा रखनी चाहिए.''
स्पार्टा सभी ग्रीक नगर–राज्यों में सबसे अधिक प्रभावशाली राज्यों में से एक था और अक्सर उसकी एथलेटिक के साथ सैन्यवादी मूल्यों के लिए याद किया जाता है.
नेतन्याहू की इस स्पार्टन महत्वाकांक्षा की आलोचना करते हुए इसराइली पत्रकार बेन कैसपिट ने मारिव न्यूज़पेपर में लिखा था, "वीर और तपस्वी स्पार्टनों के बारे में कल्पना करना कितना रोमांटिक है, जिनमें से महज कुछ सौ ने शक्तिशाली फ़ारसी सेना से सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी. समस्या यह है कि स्पार्टा का विनाश हो गया. वह हार गया और ग़ायब हो गया."
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट सर्जियो रेस्तेली ने द टाइम्स ऑफ इसराइल में 'सऊदी-पाकिस्तान-टर्की-इजिप्ट डिफेंस पैक्ट, क्राइसिस इन वेस्ट एशिया' शीर्षक से एक ब्लॉग लिखा है.
सर्जियो रेस्तेली ने इस संभावित गुट पर लिखा है, ''इसके परिणाम केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे. पाकिस्तान की भागीदारी दक्षिण एशियाई प्रतिद्वंद्विताओं को अंतरराष्ट्रीय रूप दे देगी.''
''मध्य पूर्व के किसी रक्षा समझौते के ज़रिये पाकिस्तान की रणनीतिक हैसियत में कोई भी बढ़ोतरी अनिवार्य रूप से भारत–पाकिस्तान संबंधों को प्रभावित करेगी, संशोधनवादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करेगी और तनाव कम करने की कोशिशों को कमज़ोर करेगी.''
सर्जियो ने लिखा है, ''भारत, जिसने इसराइल, खाड़ी के देशों और मिस्र के साथ रणनीतिक साझेदारियों में भारी निवेश किया है. अपने पश्चिमी समुद्री मार्गों के आसपास ख़ुद को कहीं अधिक प्रतिकूल माहौल में पाएगा. हिंद महासागर, लाल सागर और पूर्वी भूमध्यसागर, जो पहले से ही व्यापार और ऊर्जा प्रवाह के माध्यम से जुड़े हुए हैं, वे प्रतिस्पर्धी सैन्य टकराव के मंच बन सकते हैं. यह विशेष रूप से ऐसे समय में ख़तरनाक है, जब वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा गलियारे दबाव में हैं.''
सर्जियो मानते हैं, ''सैन्य साजो-सामान से परे, ऐसा समझौता वैचारिक महत्व भी रखेगा. यह मुस्लिम दुनिया की एक गुट-आधारित अवधारणा को ज़िंदा करने का जोखिम पैदा करता है, जो सुरक्षा और धार्मिक पहचान के बीच की रेखा धुंधली कर देती है.''
''भले ही ये चारों देश वैचारिक रूप से समान न हों लेकिन उनका पश्चिमी और इसराइली प्रभुत्व के ख़िलाफ़ सभ्यतागत एकजुटता की स्क्रिप्ट को वैधता देगा. यह स्क्रिप्ट, भले ही सभी द्वारा समान रूप से स्वीकार न किया जाए, नॉन स्टेट एक्टर्स को ऊर्जा देगी, क्षेत्रीय स्तर पर उदारवादी आवाज़ों को कमज़ोर करेगी और आतंकवाद-रोधी सहयोग को और जटिल बना देगी.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.