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चीन क्या ट्रेड वॉर में अमेरिका से जीत रहा है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, लंदन से
दक्षिण कोरिया में मंच तैयार है. गुरुवार को यहाँ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात होगी.
इसे पहले से ही साल की सबसे अहम बैठक बताया जा रहा है. दोनों नेता एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन आपसी सम्मान भी रखते हैं.
उम्मीद है कि इस मुलाक़ात में अमेरिका और चीन के बीच एक नया व्यापार समझौता होगा.
सच यह है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ वर्षों से चल रहे टकराव से थक चुकी हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं.
ट्रंप का एशिया दौरा (मलेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया) इस साल जनवरी में उनके व्हाइट हाउस लौटने के बाद उनकी पहली बड़ी विदेश यात्रा है.
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ट्रंप की टीम ने संकेत दिए हैं कि चीन के साथ एक "अहम" समझौते की शर्तें तैयार हैं, जिसे गुरुवार को शी जिनपिंग से मुलाक़ात में अंतिम रूप दिया जाएगा.
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि इसमें टिकटॉक के अमेरिका में ऑपरेशन पर समझौता, कुछ टैरिफ़ में ढील और चीन के रेयर अर्थ निर्यात पर अस्थायी रोक शामिल है.
असल में अमेरिका का लहजा अब व्यावहारिक हो गया है. ट्रंप प्रशासन जानता है कि टैरिफ़ वॉर को जारी नहीं रखा जा सकता है.
ट्रंप के 100 प्रतिशत टैरिफ़ की धमकी भले ही सुर्खियों में रही हो, लेकिन उनके अपने लोगों में भी बहुत कम लोगों का मानना है कि यह कभी लागू होगी.
चीन पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी वजह साफ़ है.
दोनों पक्षों के पास सीमित विकल्प हैं. ट्रंप के टैरिफ़ ने अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों को उतना ही नुक़सान पहुँचाया, जितना चीनी निर्यातकों को.
चीन की जवाबी कार्रवाइयों (ख़ासकर रेयर अर्थ निर्यात पर नियंत्रण) से अमेरिकी रक्षा और तकनीकी क्षेत्र की चिंता बढ़ गई हैं.
नतीजतन दोनों अर्थव्यवस्थाएँ नुक़सान झेल रही हैं, जबकि उनके नेता अपनी-अपनी जीत का दावा करने की कोशिश कर रहे हैं.
हाल के दिनों में चीन ने तनाव कम करने के लिए कुछ रणनीतिक संकेत दिए हैं.
उसने अमेरिका से बड़े पैमाने पर सोयाबीन की ख़रीद फिर से शुरू करने के संकेत दिए हैं और कुआलालंपुर में आसियान सम्मेलन के दौरान स्कॉट बेसेंट से मुलाक़ात के लिए वरिष्ठ व्यापार प्रतिनिधियों को भेजा है.
ऐसा माना जा रहा है कि अमेरिका ने इसके बदले में चीन को कुछ उपभोक्ता वस्तुओं पर टैरिफ़ की समीक्षा और अब आगे टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र से जुड़े प्रतिबंधों पर रोक लगाने का भरोसा दिया है.
बेसेंट ने कुआलालंपुर में कहा, "टैरिफ़ टाले जाएँगे."
क्या अमेरिका और चीन के बीच समझौता होगा?
चीन के लिए यह समय बेहद अहम है.
बीजिंग के थिंक टैंक चार्हार इंस्टीट्यूट के रिसर्च फ़ेलो डेविड चेन ने बीबीसी से कहा, "वर्तमान चीन-अमेरिका वार्ता को रचनात्मक और सकारात्मक माना जा रहा है. सप्लाई चेन की वास्तविकताओं और घरेलू दबावों से प्रेरित होकर दोनों देश संतुलित रियायतों पर आधारित एक अस्थायी समझौते की ओर बढ़ रहे हैं."
उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में चीन के शेयर बाज़ार में तेज़ी आई है, जो निवेशकों के भरोसे को दिखाता है कि दोनों सरकारें बीच का रास्ता निकाल लेंगी.
लेकिन चेन बताते हैं कि समझौते की तमाम बातों के बावजूद, बुनियादी मतभेद अब भी बरकरार हैं.
वह कहते हैं, "यह समझौता सिर्फ़ एक अस्थायी संतुलन है. दोनों देश पहले से ही अगले दौर की तैयारी कर रहे हैं. चीन अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता को तेज़ कर रहा है, जबकि अमेरिका सप्लाई चेन को नया आकार दे रहा है."
दूसरे शब्दों में, भले ही दक्षिण कोरिया में होने वाली बैठक से कुछ बात बने, लेकिन यह एक ऐसा युद्धविराम होगा, जिसके बाद युद्ध दोबारा शुरू होने को तैयार होगा.
ट्रंप की एशिया यात्रा में उनके बयान भी व्यावहारिक रहे हैं. वॉशिंगटन से रवाना होने से ठीक पहले उन्होंने पत्रकारों से कहा, "चीन को रियायतें देनी होंगी और शायद हमें भी."
उनकी टोन पहले से कहीं अधिक संयमित थी. यहाँ तक कि उनके समर्थकों के बीच भी यह भावना है कि जिस व्यापारिक हथियार का ट्रंप ने कभी प्रभावी इस्तेमाल किया था, उसकी धार अब कमज़ोर पड़ चुकी है.
चीन ने न केवल इस दबाव को झेला है, बल्कि ख़ुद को उसके मुताबिक़ ढाल भी लिया है.
चीन का पलटवार
ट्रंप के साथ दक्षिण कोरिया में बैठक से पहले चीनी राष्ट्रपति का जवाबी क़दम चीनी रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण था.
उन्होंने रेयर अर्थ एलिमेंट्स के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा कर दिया, जिसके तहत दिसंबर से अब छोटी शिपमेंट्स के लिए भी सरकारी मंज़ूरी ज़रूरी होगी.
यह दुनिया को यह याद दिलाने जैसा था कि ग्लोबल सप्लाई चेन में असली ताक़त किसके पास है.
रेयर अर्थ यानी 17 तत्वों का समूह, जिनसे इलेक्ट्रिक कारों से लेकर स्मार्टफ़ोन, फ़ाइटर जेट और विंड टर्बाइन तक चलते हैं.
एक तरह से रेयर अर्थ 21वीं सदी के उद्योगों का आधार हैं.
चीन इस क्षेत्र की 85 से 90 प्रतिशत वैश्विक प्रोसेसिंग क्षमता पर नियंत्रण रखता है.
चीन को यह नियंत्रण दशकों के निवेश और पर्यावरणीय उपेक्षा से मिला, जिसे बाक़ी देश करने को तैयार नहीं थे.
चीन के पूर्व राष्ट्रपति देंग शियाओ पिंग ने कहा था, "मध्य पूर्व के पास तेल है, चीन के पास रेयर अर्थ हैं." यह भविष्यवाणी थी.
सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) की ग्रेसलिन बास्करन के अनुसार, शी जिनपिंग की यह नीति "ट्रंप के लिए झटका" थी.
अमेरिका के राष्ट्रपति, जो हमेशा धमकी देने की भूमिका में रहते हैं, अचानक रक्षात्मक स्थिति में दिखे.
पेंटागन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि चीन पर रेयर अर्थ निर्भरता अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि ये तत्व उन्नत हथियार प्रणालियों के लिए ज़रूरी हैं.
चीन ये बात जानता है और इसका उसने इस्तेमाल किया. ट्रंप की तरह शोर मचाकर नहीं बल्कि असरदार तरीक़े से.
साख बचाने की कोशिश?
ट्रंप के समर्थकों का कहना है कि अमेरिका चीन पर निर्भरता को ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया और यहाँ तक कि पाकिस्तान पर शिफ़्ट कर सकता है, जिसने हाल ही में अपने खनिज समृद्ध बलूचिस्तान प्रांत को इसकी खोज के लिए खोल दिया है.
लेकिन असल समस्या खनन नहीं, बल्कि रिफ़ाइनिंग है. चीन की बेजोड़ प्रोसेसिंग क्षमता ही उसकी असली ताक़त है. बाक़ी देशों को इस स्तर तक पहुँचने में सालों, शायद दशकों लगेंगे.
हांगकांग के भू-राजनीतिक विश्लेषक हेई सिंग ताओ का कहना है कि दक्षिण कोरिया की बैठक ट्रंप के लिए "साख बचाने" का प्रयास है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "अगर ट्रंप शिखर सम्मेलन से पहले कोई समझौता नहीं कर पाए, तो यह उनकी साख और पार्टी में नेतृत्व को प्रभावित करेगा."
ताओ का मानना है कि चीन अस्थायी तौर पर रेयर अर्थ निर्यात में ढील और सोयाबीन ख़रीद बढ़ाने की पेशकश करेगा ताकि ट्रंप अपने मतदाताओं के सामने कुछ दिखा सकें.
लेकिन वे चेतावनी देते हैं, "यह केवल कुछ समय के लिए और अस्थायी है. ट्रंप हमेशा अपनी बात बदलते हैं, यही उनका अंदाज़ है. लंबे समय तक की स्थिरता संभव नहीं."
विश्लेषकों का कहना है कि दोनों पक्ष अपने-अपने घरेलू राजनीतिक दबावों को देखते हुए बातचीत कर रहे हैं. ट्रंप को यह दिखाना है कि उनकी वापसी सफल रही है.
वहीं शी जिनपिंग को सुस्त अर्थव्यवस्था और युवाओं में बेरोज़गारी के दबाव में नियंत्रण, धैर्य और लचीलापन दिखाना होगा.
ट्रेड वॉर को रोकने की दोनों की इच्छा सामरिक है, न कि बदलाव लाने वाली. तकनीकी श्रेष्ठता, बाज़ार नियंत्रण और वैश्विक प्रभाव की असली जंग जारी रहेगी.
बीजिंग के शोधकर्ता डेविड चेन का कहना है, "अमेरिका को रक्षा और हाई-टेक उत्पादन के लिए रेयर अर्थ से जुड़ी चीन पर निर्भरता को लेकर तुरंत कुछ करना होगा. चीन का यह दबाव तो बस शुरुआत है, असली संघर्ष तकनीक और व्यापार को लेकर जारी रहेगा."
टैरिफ़ के बावजूद चीन के निर्यात में बढ़ोतरी
यह प्रतिस्पर्धा पहले ही वैश्विक व्यापार को नया रूप दे रही है.
2024 में चीन-अमेरिका व्यापार लगभग 659 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष से थोड़ा अधिक था.
लेकिन आसियान देशों के साथ व्यापार इसी अवधि में एक ट्रिलियन डॉलर पार कर गया. यूरोपीय संघ अब अमेरिका से बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है.
मौजूदा साल के पहले नौ महीनों का रुझान भी यही दिखाता है. टैरिफ़ के बावजूद चीन के निर्यात बढ़ रहे हैं. इसका मतलब है कि चीन पर लगाए गए टैरिफ़ का कोई असर नहीं हुआ.
द्विपक्षीय व्यापार के संदर्भ में भी चीन का अमेरिका को निर्यात बढ़ा है, जबकि अमेरिकी निर्यात स्थिर है.
ट्रंप की वापसी ने भले ही ट्रेड वॉर को भड़का दिया हो, लेकिन इसने उसकी सीमाएँ भी उजागर कर दी हैं.
अमेरिका आसानी से नया औद्योगिक इकोसिस्टम खड़ा नहीं कर सकता और न ही चीन सरकारी सब्सिडी और निर्यात पर प्रभुत्व के ज़रिए विकास को हमेशा बरकरार रख सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अब यह मुक़ाबला इस बात पर निर्भर करता है कि कौन दबाव को ज़्यादा देर तक झेल सकता है और कौन तेज़ी से सामंजस्य बना सकता है.
अमेरिका टैरिफ़ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, जबकि चीन इसका जवाब धैर्य और दृढ़ता के साथ देता है.
हांगकांग के स्कॉलर ताओ कहते हैं कि चीन की डाइवर्सिफ़िकेशन स्ट्रैटेजी ट्रंप के टैरिफ़ वॉर से पहले की है.
वह कहते हैं, "चीन ने ट्रंप से बहुत पहले ही डाइवर्सिफ़िकेशन को अपनाया था. लेकिन ट्रंप इसे और तेज़ करेंगे."
चीन अब दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ़्रीका के साथ व्यापारिक संबंध गहरा रहा है, कुछ देशों को आर्थिक सहयोग के ज़रिये ख़रीदार बनने में मदद कर रहा है.
यह धीमी प्रक्रिया है, लेकिन चीन इसमें माहिर है.
शुरुआती बढ़त चीन के पास
दक्षिण कोरिया में जब दोनों राष्ट्रपति मिलेंगे, तो तस्वीरें उतनी ही अहम होंगी जितना नतीजा.
ट्रंप की मशहूर मुस्कान और शी जिनपिंग का संयमित चेहरा बाज़ारों को स्थिरता का संदेश देंगे.
लेकिन इस तस्वीर के नीचे एक नाज़ुक संतुलन छिपा होगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष बस इतना झुक रहे हैं ताकि वक़्त मिल सके, न कि वे अपना रुख़ बदल रहे हैं.
टैरिफ़ पर फ़िलहाल रोक लग सकती है, बयानबाज़ी नरम पड़ सकती है, लेकिन मुक़ाबला जारी रहेगा.
आख़िरकार, दोनों पक्षों के लोग जानते हैं कि यह ट्रेड वॉर अब टैरिफ़ या व्यापार असंतुलन का नहीं है.
यह शक्ति का युद्ध है - औद्योगिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों में प्रभुत्व का युद्ध है.
शुरुआती दौर चीन के पक्ष में हो सकता है. क़िस्मत भी शी जिनपिंग के साथ है. उनके पिछले कुछ हफ़्ते बहुत अच्छे रहे हैं.
अमेरिका पर पलटवार के साथ-साथ उन्होंने भारत के साथ संबंधों में सुधार दिखाया है. कोविड के बाद दोनों देशों के बीच उड़ानों की बहाली भी उनकी उपलब्धियों में एक है.
लेकिन चीन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के साथ लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है. यह सालों, शायद दशकों तक चलेगी, जिसमें टकराव और समझौते के दौर बारी-बारी से आते रहेंगे.
फ़िलहाल इतना तय है कि ट्रंप और शी जिनपिंग दोनों को जीत नहीं, बल्कि ट्रेड वॉर में संघर्षविराम चाहिए.
दोनों की तनातनी से तंग आकर दुनिया उसे भी स्वीकार कर लेगी.
लेकिन जैसा कि हम जानते हैं, प्रतिद्वंद्विता में विराम युद्धविराम की तरह होता है, जो स्थायी शांति की गारंटी नहीं दे सकता.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित