ईरान के साथ समझौता करने पर डोनाल्ड ट्रंप को क्या मजबूर होना पड़ा है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने बीते बुधवार को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को चिट्ठी लिखकर परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से समझौते के लिए आमंत्रित किया है.

ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान वार्ता में शामिल नहीं होता है तो अमेरिका को तेहरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए कुछ करना होगा.

हालांकि संयुक्त राष्ट्र में ईरान के मिशन ने कहा है कि उसे ऐसा कोई पत्र नहीं मिला है.

शुक्रवार को फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा था, "मैं ईरान के साथ बातचीत करके समझौता करना पसंद करूंगा. ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते."

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साल 2017 में पहली बार चुनकर व्हाइट हाउस पहुंचने के तुरंत बाद ही ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु क़रार तोड़ने का एकतरफ़ा फैसला लिया था.

यही नहीं अमेरिका ने ईरान के महत्वपूर्ण तेल निर्यात, वित्तीय लेन-देन और अन्य क्षेत्रों पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए और किसी भी अन्य देश के साथ व्यापार को मुश्किल बनाने की कोशिशें कीं.

पहले ट्रंप प्रशासन की रणनीति रही है- ईरान पर 'अधिकतम दबाव' की रणनीति अपनाना. दूसरे प्रशासन में भी उन्होंने इस रणनीति को जारी रखा है. हालांकि दूसरी तरफ़ उन्होंने नरमी के भी संकेत दिए हैं.

ट्रंप ने क्या कहा?

अपनी जीत के बाद से ही ट्रंप लगातार बयान देते रहे हैं कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकेंगे, हालांकि उन्होंने तेहरान के साथ बातचीत के माध्यम से समझौता करने पर भी ज़ोर दिया है.

व्हाइट हाउस में दूसरी बार कार्यभार ग्रहण करने के एक महीने के अंदर, पांच फ़रवरी को ट्रंप ने ईरान पर 'अधिकतम दबाव' बनाने से जुड़े के एक आदेश पर हस्ताक्षर किया था.

फॉक्स न्यूज़ से राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "मैं एक डील करना चाहूंगा. मुझे नहीं पता कि हर कोई मुझसे सहमत है, लेकिन हम एक ऐसी डील कर सकते हैं जो सैन्य ताक़त से मिली जीत जितनी ही बेहतर होगी."

उन्होंने कहा, "समय आ रहा है... किसी न किसी रूप में कुछ होने जा रहा है. मैं उम्मीद करता हूं और मैंने एक चिट्ठी भी लिखी है कि आप समझौता करेंगे क्योंकि अगर हमें सैन्य ताक़त का इस्तेमाल करना पड़ा तो यह बहुत भयानक होगा."

टाइम्स ऑफ़ इसराइल के अनुसार, ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट से कहा, "परमाणु अप्रसार को लेकर ईरान के साथ समझौता करना पसंद करूंगा....वे मरना नहीं चाहते...कोई भी मरना नहीं चाहता."

"अगर हम समझौता कर लेते हैं, इसराइल उन पर बमबारी नहीं करेगा...मुझे उम्मीद है कि जो वे करने की सोच रहे हैं, उसे नहीं करेंगे. मुझे लगता है कि इससे उन्हें वाक़ई ख़ुशी होगी."

इस महीने की शुरुआत में ही ट्रंप ने इससे इनकार किया था कि अमेरिका और इसराइल ईरान पर हमला करने की योजना बना रहे हैं.

ईरान की प्रतिक्रिया

खामेनेई और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने पहले ही अमेरिका के साथ किसी तरह के समझौते से इनकार किया है.

7 फ़रवरी 2025 को आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने कहा था कि अमेरिकी सरकार के साथ वार्ता 'समझदारी भरा और सम्मानजक नहीं' है.

ट्रंप के ताज़ा दावे के तुरंत बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की जेद्दा में बैठक से इतर कहा, "अमेरिका के साथ हम तब तक कोई वार्ता नहीं करेंगे जब तक वह अधिकतम दबाव की नीति को जारी रखता है."

हालांकि उन्होंने कहा कि वह अन्य देशों से बातचीत कर रहा है जिसमें रूस और चीन के अलावा तीन यूरोपीय देश शामिल हैं, लेकन ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार से बातचीत नहीं होगी.

ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी इरना के मुताबिक़, अब्बास अराग़ची ने कहा, "ईरान का परमाणु कार्यक्रम किसी सैन्य हमले से नष्ट नहीं किया जा सकता. इस टेक्नोलॉजी को हमने हासिल कर लिया है और दिमाग में मौजूद टेक्नोलॉजी को बम से नष्ट नहीं किया जा सकता."

अराग़ची ने ईरान पर इसराइल के हमले को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि यह पूरे मध्यपूर्व को व्यापक संघर्ष की ओर ले जाएगा.

इससे पहले दो मार्च को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने कहा कि वह अमेरिका के साथ वार्ता के पक्षधर थे लेकिन सर्वोच्च नेता के विरोध के बाद वह उनकी बात पर अमल करेंगे.

पेज़ेश्कियान ने कहा था, "मैं अब भी मानता हूं कि वार्ता ज़रूरी है, लेकिन जैसा कि सर्वोच्च नेता ने साफ़ कर दिया है, हम इस रास्ते पर अटल रहेंगे."

शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माईल बक़ाई ने कहा कि 'अधिकतम दबाव डालना क़ानून का उल्लंघन है और इंसानियत के ख़िलाफ़ अपराध' है.

उन्होंने कहा, "अलग-अलग समय में ईरानी लोगों के ख़िलाफ़ दबाव और धमकी नीति विफल रही है और उन लोगों को आज़माना भारी ग़लती है जो पहले ही आज़माए जा चुके हैं. अमेरिका नीति निर्माता पहले से अलग नतीजे पर नहीं पहुंचने जा रहे."

अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अब तक कितने पत्र भेजे?

ईरान और अमेरिका के बीच अतीत में भी गुप्त वार्ताएं हुई हैं और उनके बीच गोपनीय पत्राचार भी हुए हैं.

लेकिन बीते डेढ़ दशक में ईरानी और अमेरिकी नेताओं के बीच कुछ पत्राचार सार्वजनिक हुए हैं.

मई 2009 में बराक ओबामा ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई को पहली चिट्ठी लिखी थी, इसका ज़िक्र 10 जून 2009 को जुमे की नमाज़ के दौरान ख़ामेनेई ने ख़ुद किया था.

ईरान के सर्वोच्च नेता ने ओबामा को जवाब दिया था.

इसके बाद सितंबर 2009 में ख़ामेनेई को बराक ओबामा का दूसरा पत्र मिला.

टैबनक वेबसाइट के अनुसार, पत्र का विवरण स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसके माध्यम से अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के साथ बातचीत का रास्ता तलाश रहे थे. जबकि वॉशिंगटन टाइम्स ने लिखा कि ओबामा दोनों देशों के बीच "बेहतर सहयोग" की मांग कर रहे थे.

ओबामा ने तीसरा पत्र 2011 में लिखा. संसद में तेहरान के प्रतिनिधि अली मोताहारी ने जनवरी 2011 के अंत में इस पत्र के बारे में बताया कि इसका पहला हिस्सा धमकी भरा था, जबकि दूसरा हिस्सा दोस्ताना संबंधों के बारे में था.

इसके तीन साल बाद अक्तूबर 2014 में ओबामा ने चौथा पत्र लिखा. वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, बराक ओबामा ने ईरान और अमेरिका के बीच "साझा हितों" का ज़िक्र किया और तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमलों के बारे में टिप्पणी की थी.

इससे पहले फ़रवरी 2014 में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने बराक ओबामा को पत्र लिखा, जिसमें कोई वादा नहीं किया गया था.

ट्रंप ने ख़ामेनेई को 13 जून 2019 को पत्र लिखा था. इस पत्र को देने के लिए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ख़ुद ईरान गए थे. इस बैठक में भी ख़ामेनेई ने अमेरिका से वार्ता करने से इनकार किया था.

ईरान का परमाणु कार्यक्रम कहां खड़ा है?

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नज़र रखने वाली तमाम संस्थाओं का कहना है कि यह इस्लामिक देश परमाणु बम हासिल करने से चंद क़दम ही दूर है.

पिछले साल के अंत में संयुक्त राष्ट्र परमाणु निगरानी संस्था ने बीबीसी को बताया था कि ईरान के अधिक संवर्द्धित यूरेनियम का उत्पादन बढ़ाने का फ़ैसला 'बहुत चिंताजनक' है.

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के डायरेक्टर जनरल रफ़ाएल ग्रॉसी ने कहा था, "ईरान 60 प्रतिशत शुद्धता वाले संवर्द्धित यूरेनियम का भंडारण कर रहा है जो कि परमाणु हथियार के लिए ज़रूरी शुद्धता से थोड़ा ही कम है."

ग्रॉसी के अनुसार, "अब यह कोई सीक्रेट नहीं रह गया है. ईरान के कुछ नेता परमाणु हथियार बनाने का आह्वान कर रहे हैं."

ईरान के परमाणु संयंत्रों पर संभावित इसराइली हमले को लेकर चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा था कि तेहरान के जवाबी हमले और रेडियेशन के फैलने की आशंका के चलते "यह बहुत ज़्यादा गंभीर" है.

उनके अनुसार, तेहरान के पास फॉरदो न्यूक्लियर प्लांट अब 60 प्रतिशत शुद्धता वाला यूएफ़6 (यूरेनियम) का हर महीने 34 किलोग्राम उत्पादन कर सकता है, पहले उसकी क्षमता महज़ 4.7 किलोग्राम थी.

उन्होंने कहा, "2025 का ईरान 2015 के ईरान से काफ़ी अलग है. अगर वे चाहें तो बहुत तेज़ गति से परमाणु हथियार बना सकते हैं."

अपने शीर्ष कमांडर के मारे जाने के बाद ईरान ने सितंबर 2024 में इसराइल पर रॉकेट दागे थे. इसके बाद इसराइल की ओर से कहा जाने लगा था कि वह ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला करेगा. लेकिन एक अक्तूबर 2024 को इसराइल ने ईरान के सीमित सैन्य ठिकानों पर हमला किया.

हालांकि एक अमेरिकी अधिकारी ने पुष्टि की थी कि यह हमला ईरान के परमाणु संयंत्रों पर नहीं किया गया.

ईरान किस योजना पर काम कर रहा है?

ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी इरना के मुताबिक़, ईरानी अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप के आने के बाद से ही इस्लामिक देश ने किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए अपनी तैयारी कर ली है.

ईरान के विदेश मंत्री एस्माइल बाक़ेई के अनुसार, नेबर्स फ़र्स्ट पॉलिसी ने पड़ोसी अरब देशों के साथ ईरान के तनाव को कम करने में काफ़ी मदद की है.

मार्च 2023 में एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे ईरान और सऊदी अरब के बीच चीन की मध्यस्थता से हुई सुलह और अक्तूबर 2023 में हमास के इसराइल पर हमले ने दोनों देशों को काफ़ी क़रीब ला दिया है.

ईरान ज्वाइंट काम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए) के तहत चीन, रूस और यूरोप के देशों के साथ समझौते की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है, जबकि दूसरी ओर अमेरिका से दूरी बना रखी है.

हाल के हफ़्तों में ईरान-अमेरिका वार्ता में मध्यस्थ के रूप में रूस की भूमिका के बारे में अटकलें लगाई जा रही थीं.

ख़ासतौर पर सऊदी अरब में अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ बैठक के बाद रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की तेहरान यात्रा के बाद इसे और बल मिला.

उसी दौरान अपने रूसी समकक्ष के साथ बैठक के बाद अब्बास अराग़ची ने कहा, "ईरान अपने परमाणु मामले के संबंध में सीधे तौर पर अमेरिका के साथ बातचीत नहीं करेगा और रूस और चीन के साथ समन्वय में परमाणु मुद्दे पर आगे बढ़ेगा. "

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में रूस के शीर्ष प्रतिनिधि मिखाइल उल्यानोव ने वियना में बीबीसी फ़ारसी से पुष्टि की कि हाल ही में रियाद में हुई वार्ता में में द्विपक्षीय संचार के लिए एक चैनल स्थापित करने पर सहमति बनी है, लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता शुरू करने के लिए कोई "निश्चित योजना" नहीं है.

उल्यानोव ने कहा कि नई वार्ता शुरू करने के लिए पहले ही काफ़ी समय बर्बाद हो चुका है, "तीन साल पहले हम जेसीपीओए को पुनर्जीवित कर सकते थे, लेकिन हम ये अवसर चूक गए."

उन्होंने यह भी कहा कि नई वार्ता में ईरान के मिसाइल और क्षेत्रीय मुद्दों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वार्ता प्रक्रिया जटिल और बेनतीजा हो जाएगी.

ईरान और छह परमाणु शक्तियों के बीच जेसीपीओए समझौता 2015 में संपन्न हुआ था.

जो बाइडन के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच यूरोपीय मध्यस्थता के साथ कई दौर की अप्रत्यक्ष वार्ता हुई, लेकिन अंततः विफल रही और उसके बाद, तेहरान ने जेसीपीओए में निर्धारित सीमा से अधिक यूरेनियम का संवर्धन करना शुरू कर दिया.

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