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भारत और चीन के बीच मुलाक़ातों का दौर लेकिन बॉर्डर पर क्या चल रहा है?
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत और चीन की सरकारों के बीच हाल-फ़िलहाल में कई उच्च स्तरीय मुलाक़ातें हुई हैं.
इसके ज़रिए दोनों देशों के रिश्ते में साल 2020 से आए तनाव को कम करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं.
हालाँकि, जहाँ से इस तनाव की शुरुआत हुई थी, यानी दोनों देशों के बीच की वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल- एलएसी), वहाँ अभी क्या हो रहा है?
ख़ासतौर पर लद्दाख़ में क्या हो रहा है? क्या सभी मसले सुलझ गये हैं? इन मुलाक़ातों और समझौतों के बावजूद ऐसे कौन से सवाल हैं जिनके जवाब अब भी साफ़ नहीं हैं?
डोभाल की चीन के विदेश मंत्री से मुलाक़ात
18 दिसंबर को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीन की राजधानी बीजिंग में वहाँ के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाक़ात की थी.
इस मुलाक़ात का महत्व समझने के लिए जानना ज़रूरी है कि ये दोनों भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधि के रूप में मिले थे.
इस स्तर की बातचीत का केंद्र सिर्फ़ सीमा से जुड़े मुद्दे होते हैं. एक और बात, साल 2020 में जब से लद्दाख़ में भारत और चीन के बीच रिश्ते बिगड़े, तब से अब जाकर इस स्तर पर पहली बार बातचीत हुई है.
इस मुलाक़ात के पहले कई और अहम मुलाक़ातें भी हुई हैं.
जैसे, इस साल 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच रूस के कज़ान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाक़ात हुई थी. यह पाँच साल में दोनों के बीच की पहली द्विपक्षीय मुलाक़ात थी.
इसके अलावा दोनों देशों के विदेश मंत्रियों और रक्षा मंत्रियों के बीच कई बैठकें हुई हैं. आँकड़े यह भी बताते हैं कि जून 2020 के बाद से दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के बीच अब तक 38 बैठकें हुई हैं.
तो इन मुलाक़ातों के बाद क्या बदला?
भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने पाँच दिसंबर के बयान में बताया है कि साल 2020 में सीमा पर आई सभी अड़चनें अब समाप्त हो चुकी हैं. चीन के विदेश मंत्रालय ने भी बॉर्डर के इलाक़ों से जुड़े 'समाधान' की बात को माना है.
दरअसल विवाद पूर्वी लद्दाख़ के कई सीमावर्ती इलाक़ों से जुड़ा था. जहाँ डेपसांग और डेमचोक पर सहमति इस साल अक्तूबर में बनी, वहीं सितंबर 2022 में हॉट स्प्रिंग्स से दोनों सेनाएँ पीछे हट गई थीं.
उसके पहले साल 2021 में गोगरा और पैंगोंग झील पर सहमति बनी थी. साल 2020 के जुलाई महीने में सबसे पहले गलवान घाटी में दोनों देशों ने अपनी सेनाओं को पीछे हटाया था. हालाँकि, उसके पहले यानी 15 जून 2020 को दोनों देशों के बीच वहीं गलवान में हिंसक झड़प हुई थी. इसमें भारत के 20 सैनिकों की जान गई थी. वहीं चीन ने अपने चार सैनिकों की मौत की भी पुष्टि की थी.
अगर डेपसांग और डेमचोक को छोड़ दें तो इस सहमति के तहत बाक़ी कई इलाक़ों में 'बफ़र ज़ोन' का निर्माण किया गया. 'बफ़र ज़ोन' यानी जहाँ दोनों सेनाएँ पहले आमने-सामने थीं और फिर पीछे हटीं. उसी जगह पर ऐसे इलाक़े तय हुए, जहाँ दोनों सेनाओं को घुसने का अधिकार नहीं है.
सरकार ने बताया है कि अब डेपसांग और डेमचोक में सेना द्वारा पहले की तरह पेट्रोलिंग और चरवाहों के लिए आने-जाने की अनुमति पर चीन के साथ सहमति बनी है.
लेकिन बीबीसी हिंदी से बात करते हुए सेना के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि 'बफ़र ज़ोन' के इलाक़ों में अब भी स्थिति पहले जैसी यानी साल 2020 के पहले जैसी नहीं बन पायी है.
इस बात की तरफ़ इशारा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चार दिसंबर को राज्यसभा में दिए गए बयान में भी किया था.
उन्होंने बताया था, ''कुछ स्थानों पर साल 2020 में सेनाएँ आमने-सामने आ गई थीं. आगे ऐसा न हो, इस बात की संभावना ख़त्म करने के लिए, स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अस्थायी और सीमित क़िस्म के क़दम उठाए गए थे. मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि ये क़दम दोनों पक्षों पर लागू होते हैं. हालात के मुताबिक़ इस पर दोबारा विचार किया जा सकता है.''
क्या भारत को अपने इलाक़े से पीछे हटना पड़ रहा है?
इस मामले पर कांग्रेस के नेता और लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने हाल ही में सरकार से पूछा है कि क्या 'बफ़र ज़ोन' के ज़रिए भारत को अपने ही इलाक़े से पीछे करने का काम हो रहा है?
चीन में भारत के राजदूत रहे अशोक कंठ ने भी हाल ही में लिखे लेख में कई सवाल उठाए हैं और सरकार से सफ़ाई माँगी है. 'बफर ज़ोन' के अलावा उनकी चिंता यह है कि चीन लड़ाई नहीं बल्कि अतिक्रमण के सहारे भारत के इलाक़े पर धीरे-धीरे अपना क़ब्ज़ा बढ़ा रहा है.
सेना के उत्तरी कमान के पूर्व अध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुडा मानते हैं कि ज़मीनी स्तर पर हालात इतनी जल्दी बदलने वाले नहीं हैं.
वे कहते हैं, ''मैं इस बात से ज़रूर हैरान हूँ कि भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ दिनों में बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं. हालाँकि, एलएसी पर ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. जहाँ हम आमने-सामने थे, वहाँ से हम थोड़े पीछे हटे हैं.''
''क्या डी-एस्केलेशन हुआ है यानी जितना सैन्य बल वहाँ था, उसमें कमी हुई है? नहीं. उसके बाद डी-इंडक्शन यानी जितना सैन्य बल लद्दाख़ में साल 2020 में लाया गया था, क्या वह वापस चला गया है? नहीं. इन मुद्दों की तो बात भी नहीं हो रही है. इन सब का मतलब है कि दोनों तरफ़ सेनाएँ रहेंगी क्योंकि भरोसा टूट चुका है.''
हुडा का कहना है, ''मैं यह भी मानता हूँ कि भारत वहाँ सड़कों और पुलों के निर्माण कार्य जारी रखेगा ताकि सीमा के इलाक़ों में अपनी पकड़ को और मज़बूत कर सके.''
अमेरिका के रक्षा मंत्रालय की हाल ही में एक रिपोर्ट आई है. इसमें बताया गया है कि साल 2020 के बाद लद्दाख़ के इलाके़ में चीन ने न तो अपने मोर्चे ही कम किए हैं और न ही सैनिकों की तादाद को कम किया है. और तो और चीन ने अपने सैनिकों के लिए इस इलाक़े में मूलभूत सुविधाओं को मज़बूत किया है.
'बफ़र ज़ोन' के बारे में जो विवाद है, उसे कैसे समझा जाए?
जनरल हुडा बताते हैं, ''पहले तो यह कोई नई बात नहीं है. साल 2014 में चूमर में जब चीन के सैनिकों ने सीमा का उल्लंघन किया था तब भी कुछ समय के लिए वहाँ ऐसा 'बफ़र ज़ोन' बनाया गया था. हमें नहीं पता कि इस बार कितने 'बफ़र ज़ोन' बने हैं, किस पैमाने पर बने हैं और कहाँ बने हैं? इसलिए यह कहना मुश्किल है कि इनके बनने से ज़्यादा नुक़सान भारत को हो रहा है या चीन को.''
अपर्णा पांडे हडसन इंस्टिट्यूट में रिसर्च फ़ैलो हैं और वॉशिंगटन डीसी में रहती हैं. यह पूछने पर कि क्या सीमा पर शांति बनी रहेगी, वो कहती हैं कि इसका फ़ैसला चीन पर निर्भर करता है.
उनका कहना है, ''हमने ऐसा पहले भी देखा है. चीन पहले अपने सैनिक भेजता है. फिर सेना और राजनयिकों के बीच कई बैठकों के बाद और शीर्ष स्तर पर बैठक से पहले, वापस हट जाता है. इसलिए मैं मानती हूँ कि अभी जो हो रहा है, उसे एक अस्थाई राहत के तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है.''
उनके मुताबिक, ''चीन जब इस हालत को बदलना चाहेगा, तब बदल देगा. हमें जो सवाल पूछना चाहिए, वह यह है कि क्या चीन में रणनीतिक स्तर पर हृदय परिवर्तन हुआ है? नहीं हुआ है. वे अब भी इस क्षेत्र को अपना मानते हैं. भारत वास्तव में चैन की साँस नहीं ले सकता.''
अपर्णा पांडे कहती हैं, ''मुझे लगता है कि चीन जो कर रहा है, वह व्यापक वैश्विक परिस्थितियों से जुड़ा है. उसे ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से चिंता है. ट्रंप ने अपनी टीम में ऐसे लोगों को जगह दी है जो चीन के विरोधी माने जाते हैं. उसे लगता है कि वे चीन के विकास को बाधित करने या धीमा करने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे. इस स्थिति में उसने लद्दाख में भारत के साथ होने वाले संघर्ष को अस्थाई रूप से रोकने का विकल्प चुना है.''
शांति बनाए रखने के लिए दोनों सेनाओं को भी कई कदम उठाने पड़ेंगे, ऐसा जनरल हुडा मानते हैं. उन्होंने बताया कि दोनों सेनाओं के बीच विश्वास अब ख़त्म हो गया है. यह सिलसिला साल 2017 के बाद तेज़ हुआ है.
साल 2017 में भारत और चीन की सेनाओं के बीच डोकलाम में तनाव तब बढ़ा था. तब दोनों आमने-सामने आ गए थे. दरअसल डोकलाम, भारत, चीन और भूटान की सीमाओं को जोड़ता है और तक़रीबन तीन महीने तक वहाँ सेनाओं के बीच तनाव की स्थिति बनी रही थी.
हुडा बताते हैं, "अनजाने में या स्थानीय स्तर पर हुई ग़लती के कारण शांति भंग नहीं होनी चाहिए. साल 2020 में गलवान में जो हुआ, उसके बाद यही सबक है. गलवान में स्थानीय स्तर पर स्थिति बिगड़ गई और लोगों की जान चली गई. मैं मानता हूँ कि दोनों सेनाओं को आपसी भरोसे को क़ायम करना होगा. लेकिन क्या शांति हमेशा बनी रहेगी, यह कहना मुश्किल है. दोनों देश बॉर्डर पर सहमत नहीं हैं, इसलिए हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं."
रिश्ते अब किस दिशा में जाएँगे?
एक बात साफ़ है, चीन भारत के साथ अपने रिश्ते को सीमा के मुद्दे से आगे ले जाना चाहता है. भारत भी आगे बढ़ना चाहता है.
यह बात इसलिए साफ़ है क्योंकि 18 दिसंबर की मीटिंग के बाद एलएसी के अलावा दोनों के बीच और मामलों में भी सहमति बनी. जैसे- मानसरोवर यात्रा को फिर शुरू करने, दोनों देशों के बीच बहती नदियों के बहाव के डेटा साझा करने और बॉर्डर इलाके में व्यापार शुरू करने पर भी सहमति बनी है.
हालाँकि, पहले भारत ने एलएसी पर किसी भी तरह के उल्लंघन को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था. बाक़ी मुद्दों को एक तरफ़ रखा था.
तो क्या भारत का रुख़ नरम पड़ रहा है?
मीरा शंकर अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों में भारत की राजदूत रही हैं.
उनका मानना है कि भारत को सतर्क रहने की ज़रूरत है.
उनकी राय है, "दरअसल एलएसी पर बनी सहमति का हमें स्वागत करना चाहिए. हालाँकि, उसके महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जाना चाहिए. मुझे लगता है कि बहुत कुछ अभी भी चीन के व्यवहार पर निर्भर करेगा क्योंकि उन्होंने ही पिछले समझौतों को तोड़ा था. एक और बात है, ट्रंप के दौर में व्यापार पर अमेरिका का नज़रिया क्या होगा, अभी चीन इस सवाल से चिंतित है."
मीरा शंकर का कहना है, "चीन, अमेरिका के अलावा दूसरे बाजारों की तलाश भी कर रहा है. उसके पास उत्पादन की क्षमता है. चीन चाहेगा कि वह अन्य देशों में अपना सामान निर्यात करे. भारत का चीन के साथ पहले से ही बहुत बड़ा व्यापार घाटा है. सस्ते चीनी आयात हमारे उद्योग को नुकसान पहुँचाते हैं. इसलिए, इस दृष्टिकोण से हमें सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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