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ट्रंप के गोल्ड वीज़ा का भारतीयों पर क्या होगा असर?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकता पाने की चाह रखने वाले प्रवासियों के लिए 'गोल्ड वीज़ा स्कीम' शुरू करने का एलान किया है.
इस योजना के ज़रिए 50 लाख डॉलर यानी करीब 44 करोड़ रुपये का भुगतान करके विदेशी नागरिकों के लिए अमेरिकी नागरिकता पाने का रास्ता साफ़ हो जाएगा. इस योजना के पहले चरण में करीब 10 लाख गोल्ड कार्ड जारी करने की योजना तैयारी की गई है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया है कि गोल्ड वीज़ा के लिए निवेशक जो भुगतान करेंगे, उससे अमेरिका के राष्ट्रीय कर्ज का भुगतान जल्दी किया जा सकेगा.
राष्ट्रपति ट्रंप की यह योजना भारतीय प्रवासियों के लिए महंगी पड़ सकती है. यूएस सिटिज़नशिप एंड इमीग्रेशन (यूएससीआईएस) के अनुसार करीब 10 लाख भारतीय ग्रीन कार्ड का इंतज़ार कर रहे हैं. यहां करीब 50 लाख भारतीय रहते हैं.
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वर्तमान में एच-1बी या ईबी-2/ईबी-3 वीज़ा पर रहने वाले भी गोल्ड कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं लेकिन उन्हें भी इसके लिए 50 लाख डॉलर ही चुकाने होंगे.
क्या है ईबी-5 वीजा?
अमेरिका वर्ष 1990 में पांच श्रेणियों में वीज़ा प्रोग्राम लेकर आया था. इसे ईबी-1, ईबी-2, ईबी-3, ईबी-4 और ईबी-5 के नाम से जाना जाता है.
इन पांच श्रेणियों में अभी तक ईबी-5 वीज़ा सबसे आसान रास्ता माना जाता था.
10 लाख डॉलर यानी करीब 8.75 करोड़ रुपए निवेश करके इसे कोई भी व्यक्ति ईबी-5 वीज़ा हासिल कर सकता था. शर्त यह थी कि निवेश से कम से कम 10 लोगों को रोज़गार पैदा हो.
गोल्ड कार्ड अप्रवासी निवेशक वीज़ा कार्यक्रम ईबी-5 की जगह लेगा.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि यह वीज़ा खरीदकर लोग अमेरिका आएंगे और यहां बहुत ज्यादा टैक्स भरेंगे. वे खूब खर्च करेंगे और खूब रोज़गार देंगे.
अब अमेरिका में निवेश से नागरिकता लोगों की लिए महंगी पड़ेगी. इसके साथ ही निवेश करने वालों का सत्यापन भी किया जाएगा.
वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड ल्यूटनिक ने इससे पहले ईबी-5 को लेकर कहा था कि यह भ्रष्टाचार का ज़रिया बन गया है. उन्होंने कहा, "हम यह सुनिश्चित करेंगे कि ये लोग अद्भुत विश्वस्तरीय शहरों से हों."
ग्रीन कार्ड क्या है?
ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने के लिए अनुमति प्रदान करने वाला दस्तावेज़ है. यह दस्तावेज़ किसी भी व्यक्ति को अमेरिकी नागरिकों की तरह ही लाभ और अधिकार देता है.
ग्रीन कार्ड धारक को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया है लेकिन देश में कहीं भी भ्रमण करने से लेकर काम करने तक का बराबर अवसर मिलता है.
इस कार्ड के मिलने के बाद अमेरिका की स्थायी नागरिकता का रास्ता खुल जाता है. यूएससीआईएस के अनुसार इसे परमानेंट रेज़िडेंट कार्ड (स्थायी निवासी कार्ड) के रूप में जाना जाता है.
यह कार्ड एक बार में 10 साल के लिए जारी किया जाता है. इसके बाद इसे निरंतर रिन्यू कराया जा सकता है. अमेरिका इसे कई आधार पर विदेशी नागरिकों के लिए जारी करता है.
रूस के नागरिकों को भी मिलेगा गोल्ड कार्ड
अमेरिका में नागरिकता की चाह रखने वाले धनी लोगों के लिए गोल्ड कार्ड एक बेहतर रास्ता हो गया है. इस श्रेणी में कोई बैकलॉग नहीं है तो कार्ड लेने के बाद नागरिकता का रास्ता तेज़ी से खुला है.
अब तक 35 सालों के निवेश के बाद ईबी-5 वीज़ा मिलता रहा है. जिसके बाद भी नागरिकता हासिल करने में पांच से सात साल लगते थे.
गोल्ड कार्ड में अभी कोई प्रतिबंध की जानकारी सामने नहीं आई है. ऐसे में यह माना जा रहा है कि कार्ड लेने के बाद अमेरिकी नागरिकता की प्रकिया शुरू हो जाएगी.
एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा है कि इसे रूसी नागरिकों के लिए भी जारी किया जा सकता है.
भारत के निवेश को लग सकता है झटका
भारतीय निवेशक और अमीर बड़ी संख्या में देश छोड़ रहे हैं. दुनिया के अलग-अलग देशों की नागरिकता ले रहे हैं. अमेरिका ने इनके लिए बड़ा दरवाज़ा खोल दिया है.
एपिकल इमीग्रेशन के निदेशक और वीज़ा मामलों जानकार मनीष श्रीवास्तव ने बीबीसी संवाददाता आनंदमणि त्रिपाठी को बताया, "भारत में व्यवसाय आसान नहीं है. ईज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस इंडेक्स में भी भारत काफी नीचे है. ऐसे में अमेरिका की नागरिकता चाहने वाले बड़े कारोबारियों के लिए यह बड़ा अवसर है."
वह कहते हैं कि ग्रीन कार्ड जैसी सुविधाएं मिलेंगी. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधांए फ्री होंगी. बच्चों का भविष्य बेहतर होगा. इसके कारण करोड़पतियों का पलायन और भी बढ़ सकता है.
भारत की नागरिकता छोड़ने वालों की संख्या बढ़ी है. इस तरह से नागरिकता दुनिया भर में कई देश दे रहे हैं.
पुर्तगाल, ग्रीस, और पोलैंड जैसे देशों में एक विला खरीदने पर ही नागरिकता मिल रही है. इसे सिटिजन बाई इन्वेस्टमेंट कहा जाता है.
मनीष श्रीवास्तव कहते हैं कि यह ग्रीन कार्ड का अपग्रेडेड वर्जन है.
बस शर्त यही है कि इसके लिए एक बड़ी राशि चुकानी होगी. निवेशक का बैकग्राउंड भी चेक किया जाएगा जिससे उसकी आर्थिक क्षमता का भी पता चले.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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