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हॉलीवुड की हड़ताल से क्या बॉलीवुड पर होगा कोई असर?
- Author, अर्नब बनर्जी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अमेरिकी अभिनेताओं की यूनियन एसएजी-एएफ़टीआरए की हड़ताल से पूरी दुनिया के फ़िल्म उद्योगों पर असर पड़ने की संभावना है.
अलायंस ऑफ़ मोशन पिक्चर और टेलीविज़न प्रोड्यूसर्स के साथ श्रम विवाद में कोई हल न निकलने के बाद ये हड़ताल हुई है.
इसके साथ ही श्रम विवादों को ही लेकर स्क्रीन राइटर्स का संगठन राइटर्स गिल्ड ऑफ़ अमेरिका भी हड़ताल पर चला गया है जिससे हॉलीवुड का प्रोडक्शन लगभग ठप पड़ गया है.
साल 1960 के बाद से ऐसा पहली बार है कि जब अभिनेताओं और लेखकों ने एक साथ, एक ही समय हड़ताल की है.
लेकिन उनकी हड़ताल के पीछे क्या कारण है? ये कब तक चलेगी? कौन-सी फ़िल्मों और शो पर इसका असर पड़ेगा?
क्या हैं मांगें?
राइटर्स गिल्ड ऑफ़ अमेरिका और एसएजी-एएफ़टीआरए की मांग है कि मुनाफ़े का ठीक से बंटवारा हो जिससे सभी पक्षों के साथ इंसाफ़ हो सके. साथ ही स्टूडियो में काम के बेहतर हालात और सुरक्षित माहौल देने की भी उनकी मांग है.
स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ार्म की लोकप्रियता की वजह से उनकी आमदनी पर खासा असर पड़ा है.
गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार अभिनेताओं का कहना है कि जबसे स्क्रिप्ट का काम बंद हुआ है, कई देशों में अग्रणी अमेरिकी कलाकारों वाले प्रोडक्शन के काम लगभग रुक गए हैं. उनका कहना है कि वे एक लंबी लड़ाई के लिए कमर कस चुके हैं.
फ़िल्म निर्माताओं और अभिनेताओं को जो एक और चिंता सता रही है वो है आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की चुनौती, जो हो सकता है इंटेलेक्चुअल कामों की जगह ले ले. उनना कहना है कि ये स्वीकार्य नहीं है.
जब भारत में हुई हड़ताल
भारत में भी अभिनेताओं, निर्माताओं, निर्देशकों और सपोर्ट स्टाफ़ जैसे स्टंटमैन, टेक्नीशियन, लाइट मैन, डिज़ाइनर्स, असिस्टेंट, कैमरामैन, एडिटर आदि के हड़ताल का भी इतिहास रहा है, जिन्हें जब तब क़ानून न होने के कारण खराब हालात का सामना करना पड़ा है.
सिनेमा का इतिहास रहा है कि आईएमपी एक्टिंग अकेडमी (आईएमपीएए) और सिनेमा एडवर्टाइज़िंग एसोसिएशन (सीएए) शिक़ायतों, आलोचनाओं औ नाइंसाफियों पर सक्रियता दिखाता रहा है लेकिन ठोस योजना और निर्णायक कदम उठाने की बात हमेशा ही नदारद रही हैं.
2018 से पहले 46 साल तक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में केवल एक दीक्षांत समारोह हुआ था. और इसका उद्घाटन भाषण किसी और ने नहीं बल्कि जाने माने एक्टर और प्रसिद्ध शख़्सियत बलराज साहनी ने दिया था.
सरकार की ओर टिकट पर भारी टैक्स लगाने के विरोध में अक्टूबर 1986 में फ़िल्म इंडस्ट्री एक साथ आ गई. 10 अक्टूबर को हड़ताल हुई. मांग रखी गई कि महाराष्ट्र के सिनेमाघरों के टिकट पर राज्य सरकार की ओर से लगाए गए 177% सरचार्ज को कम किया जाए.
फ़िल्म प्रोडक्शन पर राज्य सरकार द्वारा लगाए गए 4% सेल्स टैक्स को भी ख़त्म करने की मांग की गई. इस हड़ताल के बाद फ़िल्म निर्माताओं ने सैकड़ों फ़िल्मों पर काम रोक दिया और पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री लगभग ठप हो गई.
तीन दशक पहले बॉलीवुड एकजुट हुआ और 21 अक्टूबर को कई मुद्दों को पर बात की. बॉम्बे की सड़कों पर फ़िल्म इंडस्ट्री के जाने माने चेहरे उतरे. दिलीप कुमार और राज कपूर जैसे जाने माने अभिनेताओं के साथ उस समय के चमकते सितारे विनोद खन्ना, सुनील दत्त, संजय दत्त, धर्मेंद्र, अनिल कपूर, राकेश रोशन, स्मिता पाटिल, हेमा मालिनी और अन्य कलाकार इस प्रदर्शन में एक साथ आए.
इन सभी ने मीडिया में खुलकर बोला कि क्यों नए नियमों को तुरंत ख़त्म कर देना चाहिए.
राज कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, राज बब्बर और सुनील दत्त जैसे कुछ लोगों ने मंच से अपने अधिकारों और संस्कृति के महत्व पर जबरदस्त भाषण दिए.
जब डेढ़ लाख सिने वर्कर हड़ताल पर गए
लेकिन बॉलीवुड अभिनेताओं की एक अनोखी समस्या है. सिने आर्टिस्ट का सिर्फ एक संगठन है जबकि निर्माताओं के चार एसोसिएशन हैं.
साल 2008 जब में बॉलीवुड के एक लाख से ज़्यादा वर्करों ने कम वेतन, देर से भुगतान और फ़िल्म इंडस्ट्री में कैजुअल वर्करों के बढ़ते चलन के ख़िलाफ़ हड़ताल की तो, अभिनेताओं का ये पता ही नहीं था कि वो कहां और किसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करें, जबकि वो खुद इन समस्यों से बुरी तरह प्रभावित थे.
भारतीय फ़िल्म उद्योग में अभिनेताओं और अन्य वर्करों के हित में काम करने वाले अग्रणी एसोसिएशन में से एक एआईसीडब्ल्यूए ने जो मानक तय किए उसमें अमूमन काम के बेहतर हालात और सिने वर्कर्स और आर्टिस्ट के लिए सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करना प्रमुख है.
इसी तरह सीआईएनटीएए (सिने एंड टेलीविज़न आर्टिस्ट एसोसिएशन) 1958 में और इसके बाद से ही इसने ज़िम्मेदारी के साथ काम किया.
हालांकि अतीत में मुंबई में डांसर, राइटर और टेक्नीशियन के असहयोग आंदोलन में शाहरुख ख़ान और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े नाम शामिल हुए लेकिन उनकी भागीदारी को उनकी खुद की आवाज़ से ज्यादा एक समर्थन के रूप में देखा गया.
कम वेतन को लेकर उस समय 1,47,000 लोग घर बैठ गए. पारिश्रमिक में बराबरी की उनकी मांग तार्किक थी क्योंकि उस समय फ़िल्म में काम करने वाले वर्करों को प्रति दिन 600 रुपये और टेलीविज़न वर्करों को 500 रुपये मिलते थे.
और ये भी उन्हें कभी समय पर नहीं मिलता था.
हड़ताल पर जाने का यूनियन का फैसला बुरे वक्त में आया. सालाना 3.6 अरब की टिकट बिक्री के साथ भारतीय सिनेमा को आलोचनात्मक और व्यावसायिक लिहाज से सफल माना जाता है.
जब हड़ताल ख़त्म करने के लिए अमिताभ बच्चन को लगाया गया
साल 2015 में फ़ेडरेशन ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया सिनेमा एम्प्लाई की ओर से एक अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा हुई.
मुंबई में सिनेमा और टेलीविज़न इंडस्ट्री की शीर्ष ट्रेड यूनियन बॉडी के पास भी प्रदर्शन के अलावा कोई चारा नहीं बचा.
उस समय क़रीब दो लाख सिने वर्कर्स हड़ताल पर चले गए और टेलीविज़न और फ़िल्मों की शूटिंग प्रभावित हुई.
हालांकि अभी तक ये साफ़ नहीं है कि हॉलीवुड के मौजूदा संकट से भारतीय कमाई पर कोई असर पड़ा है या नहीं. लेकिन ये तो स्पष्ट है कि इसका यहां भी असर हो सकता है और देर सबेर आर्टिस्ट, टेक्नीशियन और अन्य क्रू मेंबर भी संभवतया इसी तरह की हड़ताल के लिए प्रेरित होंगे.
कई साल पहले, बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री में एक महीने लंबी हड़ताल हुई. तब कांग्रेस सांसद अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त को फ़िल्म इंडस्ट्री की एक्शन कमेटी पर दबाव डालकर हड़ताल ख़त्म कराने के लिए लगाया गया.
इसके बदले महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसबी चाह्वाण से कुछ मामूली रियायतें दिलाने का वादा था.
एक्शन कमेटी तीन मांगों पर अड़ी हुई थी- किराए के कैमरा और साउंड रिकॉर्डिंग मशीनों को छोड़ अन्य चीजों पर नए सेल्स टैक्स को ख़त्म करना, बांग्लादेश युद्ध के दौरान सिनेमा हाल के टिकट पर लगाए गए विशेष सरचार्ज को रद्द करना और टिकट पर एंटरटेनमेंट टैक्स में काफी हद तक कमी, जिससे राज्य सरकार को करीब 77 करोड़ रुपये की आमदनी होती थी.
लेकिन दोनों अभिनेताओं ने सिनेमा टिकट पर सरचार्ज को प्रति वर्ष 15 करोड़ से पांच करोड़ किए जाने के बदले हड़ताल ख़त्म करने और वित्त सचिव के अपनी रिपोर्ट पेश करने तक नए सेल्स टैक्स की लेवी न लगाने का दबाव बनाया.
हालांकि ओटीटी प्लेटफ़ार्मों की चुनौतियों समेत, अभिनेताओं और क्रू के लिए उचित सुविधाओं की कमी, सुरक्षा बंदोबस्त की कमी जैसी कई समस्याएं आई हैं, लेकिन पिछले एक दशक या उससे कुछ पहले तक फ़िल्म उद्योग को कोई बड़ी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा है.
इसकी वजह बहुत साधारण है. बहुत सारी इकाईयां संगठित हुई हैं और हर चीज के लिए एक पेशेवर नज़रिया रहा हैः ट्रांसपोर्ट, खाना, मेक अप, भुगतान, जूनियर सदस्यों की सुरक्षा आदि सबकुछ कमोबेश दुरुस्त और ट्रैक पर है.
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