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वेनेज़ुएला को निशाना बना रहे ट्रंप, पर ख़ामोश क्यों हैं रूस और चीन
- Author, नोबर्तो पेरेडेस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
वेनज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के लिए यह सोचना स्वाभाविक हो सकता है कि उनके असली दोस्त आख़िर हैं कौन.
कभी चीन और रूस पर उनकी बेहद मजबूत निर्भरता अब लगातार अनिश्चित होती दिखाई देती है.
कई सालों तक इन दोनों देशों ने वेनज़ुएला की समाजवादी सरकार को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य समर्थन दिया. इस रिश्ते की शुरुआत पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ के दौर में हुई थी, जो मादुरो के मार्गदर्शक और पूर्व राष्ट्रपति भी थे.
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अब यह समर्थन काफ़ी हद तक प्रतीकात्मक रह गया है. मदद के तौर पर ठोस सैन्य या आर्थिक सहयोग के बजाय सिर्फ़ ज़ुबानी समर्थन दिए जा रहे हैं.
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यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका ने कैरिबियन इलाक़े में अपनी एयरफ़ोर्स और नेवी तैनात कर दी है. इसमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी, जासूसी विमान और 15,000 सैनिक शामिल हैं.
अमेरिका ने इस इलाक़े में ड्रग्स तस्करी में शामिल होने के आरोप लगाकर कई नावों पर हमले किए हैं. इन हमलों में अबतक 80 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है. हाल के दिनों में अमेरिका ने वेनज़ुएला के तट के पास एक तेल टैंकर भी ज़ब्त किया है.
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि सैन्य तैनाती और ये हमले ड्रग तस्करी के ख़िलाफ़ कार्रवाई का हिस्सा हैं और ज़ब्त किए गए टैंकर पर पहले से प्रतिबंध लगा हुआ था.
लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का असली मक़सद सत्ता परिवर्तन है. खुद मादुरो भी यही दावा करते हैं.
तो ऐसे वक्त में, जब वेनज़ुएला के राष्ट्रपति को सबसे ज़्यादा समर्थन की जरूरत है, आख़िर क्या बदल गया है?
अभी तक ज़बानी समर्थन
चिली की आंद्रेस बेलो यूनिवर्सिटी में सेंटर फ़ॉर चाइना स्टडीज के निदेशक प्रोफ़ेसर फ़र्नांडो रेयेस मत्ता का कहना है कि वेनज़ुएला अब चीन और रूस दोनों के लिए काफ़ी कम प्राथमिकता वाला मुद्दा बन चुका है, ख़ासकर तब से जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी हुई है.
रेयेस मत्ता कहते हैं, "आज रूस या चीन, किसी के पास भी वेनज़ुएला की पूरी तरह से रक्षा करने के लिए उतरने की कोई ठोस वजह नहीं है. रूस, यूक्रेन युद्ध में उलझा है और चीन, राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सह-अस्तित्व बनाने की कोशिश कर रहा है."
साल 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से मॉस्को ने इस संघर्ष में भारी भरकम संसाधन झोंक दिए हैं. इससे उसकी आर्थिक स्थिति और सैन्य क्षमता दोनों पर दबाव बढ़ा है. इसके साथ ही रूस को व्यापक पश्चिमी प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ा है.
कोलंबिया की इसेसी यूनिवर्सिटी में पॉलिटिक्स एंड इंटरनेशनल रिलेशंस लैबोरेटरी के निदेशक प्रोफ़ेसर व्लादिमीर रुविंस्की के अनुसार, इससे उन सहयोगी देशों के लिए संसाधन कम बचते हैं, जिन्हें पहले रूस के समर्थन का फ़ायदा मिलता था.
मध्य पूर्व में रूस के पुराने सहयोगी सीरिया और ईरान भी हाल के समय में कुछ इसी स्थिति का सामना कर चुके हैं.
प्रोफ़ेसर रुविंस्की कहते हैं, "रूस पहले से ज़्यादा प्रतिबंध झेलने का जोख़िम नहीं लेगा और चीन मादुरो की रक्षा के लिए अपने ऊपर और टैरिफ़ लगवाने का ख़तरा नहीं उठाएगा."
मादुरो ने चीन और रूस से मांगी थी सैन्य मदद
'द वॉशिंगटन पोस्ट' के मुताबिक़, मादुरो ने अक्तूबर के अंत में चीन और रूस से सैन्य मदद मांगी थी.
रूसी मीडिया के अनुसार, क्रेमलिन के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने कहा है, "हम वेनज़ुएला का समर्थन करते हैं, जैसे वह हमारा समर्थन करता है."
साथ ही उन्होंने ट्रंप प्रशासन से संकट को और न बढ़ाने की अपील की.
अमेरिका के तेल टैंकर ज़ब्त करने के बाद क्रेमलिन ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मादुरो से फ़ोन पर बात कर अपना समर्थन जताया है.
लेकिन अब तक मॉस्को ने कोई ठोस मदद नहीं दी है.
रूस की तरह चीन ने भी वेनज़ुएला की सैन्य रक्षा का कोई संकेत नहीं दिया है. चीन ने सिर्फ़ उस पर (अमेरिका के कदम पर) आपत्ति जताई है, जिसे वह "बाहरी हस्तक्षेप" कहता है और संयम बरतने की अपील की है.
विशेषज्ञों का कहना है कि मादुरो का खुलकर समर्थन करना चीन के लिए बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच हाल में बनी कूटनीतिक प्रगति को ख़तरे में डाल सकता है, जबकि इसके बदले उसे वैचारिक मेल के सिवाय ज़्यादा कुछ हासिल नहीं होगा.
ट्रंप के कई देशों पर टैरिफ़ लगाने के बाद से अमेरिकी-चीन रिश्ते ख़ासे तनावपूर्ण रहे हैं. हालांकि, अक्तूबर के अंत में दक्षिण कोरिया में ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाक़ात ने नए समझौतों और कुछ उत्पादों पर कम टैरिफ़ की संभावना के दरवाज़े खोले. इस मुलाक़ात को दोनों पक्षों ने सकारात्मक बताया था.
चीन और रूस क्यों नहीं आए
विशेषज्ञों के मुताबिक, वेनज़ुएला की आर्थिक तबाही और उसके तेल उद्योग की बदहाली ने भी चीन को पीछे हटने पर मजबूर किया है.
बीजिंग ने हाल के सालों में नए कर्ज़ काफ़ी कम कर दिए हैं और अब उसका ध्यान मुख्य रूप से पुराने कर्ज़ की वसूली पर है.
प्रोफ़ेसर रुविंस्की कहते हैं, "मुझे लगता है कि चीन उस किसी भी सरकार से बातचीत के लिए तैयार रहेगा, जो आगे चलकर मादुरो की जगह लेती है. उसे यह भी लगता है कि इस वक़्त मादुरो का बहुत मजबूत समर्थन करना, सत्ता बदलने की स्थिति में नकारात्मक नतीजे ला सकता है."
प्रोफ़ेसर रेयेस मत्ता का मानना है, "इन दोनों में से कोई भी देश ऐसी सरकार का समर्थन करने को तैयार नहीं है, जिसके पास देश के भीतर इतना कम जनसमर्थन हो."
वह कहते हैं, "इसके अलावा, रूस और चीन दोनों जानते हैं कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव में धोखाधड़ी के साफ़ संकेत थे."
जुलाई 2024 में पिछला आम चुनाव हुआ था और उसमें धांधली के गंभीर आरोप लगे थे. सरकार के करीबी लोगों के दबदबे वाली नेशनल इलेक्टोरल काउंसिल ने मादुरो को विजेता घोषित किया, लेकिन पिछले चुनावों के उलट इस बार कोई विस्तृत नतीजे सार्वजनिक नहीं किए गए.
इस साल नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली मरिया कोरीना मचादो के नेतृत्व वाले विपक्ष ने ऐसे चुनावी रिकॉर्ड जारी किए, जिनके मुताबिक़ विपक्षी उम्मीदवार एडमंडो गोंजालेज की जीत हुई थी.
प्रोफ़ेसर रुविंस्की कहते हैं, "इस बार मादुरो पूरी तरह अकेले हैं." उनका मानना है कि मादुरो का समय अब "ख़त्म होता जा रहा है."
वह कहते हैं, "रूस और चीन अमेरिका के हस्तक्षेप की आलोचना करते रह सकते हैं, लेकिन इससे आगे जाने को तैयार नहीं हैं. जो समर्थन उन्हें पहले मिलता था, वह अब सिर्फ़ कुछ बयानबाज़ी तक सिमट गया है. ज़मीनी हक़ीकत में वह समर्थन अब मौजूद नहीं है."
(बीबीसी ग्लोबल जर्नलिज़्म की अतिरिक्त रिपोर्टिंग)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.