ईरान में विरोध प्रदर्शनों के बीच चर्चा में आए रज़ा पहलवी कौन हैं?

    • Author, बीबीसी न्यूज़ फ़ारसी

ईरान की राजधानी तेहरान सहित वहां के कई बड़े शहरों में सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं. अमेरिकी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि उग्र प्रदर्शनों में 34 प्रदर्शनकारी और चार सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं.

इन प्रदर्शनों के पीछे ईरान के दिवंगत शाह के निर्वासित बेटे रज़ा पहलवी हैं. रज़ा ने ही ईरान के लोगों से प्रदर्शन करने की अपील की थी.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "मैं आप सभी पर गर्व करता हूं, जिन्होंने गुरुवार रात को पूरे ईरान में सड़कों पर क़ब्ज़ा कर लिया. आपने खुद देखा कि कैसे बड़ी भीड़ दमनकारी ताक़तों को पीछे हटने पर मजबूर कर देती है. जो लोग अभी तक हिचकिचा रहे थे, वे शुक्रवार रात अपने साथी देशवासियों के साथ शामिल हो जाएं और प्रदर्शन को और भी बड़ा बना दें, ताकि सरकार की दमनकारी ताक़त और कमजोर हो जाए."

रज़ा पहलवी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर लिखा, "हाल के प्रदर्शनों में लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी, जो पहले कभी नहीं देखी गई. ख़बर मिली है कि हुकूमत बहुत डरी हुई है और फिर से इंटरनेट बंद करने की कोशिश कर रही है ताकि प्रदर्शन रुक जाएं."

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कौन हैं रज़ा पहलवी?

रज़ा पहलवी ईरान के आख़िरी राजा (शाह) के सबसे बड़े बेटे हैं. रज़ा का जन्म अक्तूबर 1960 में तेहरान में हुआ. उनके पिता मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी ने तीन शादियां की, पहली दो शादियों से बेटा नहीं हुआ था, इसलिए जब रज़ा पैदा हुए तो उन्हें अधिक लाड़-प्यार मिला.

उनका शुरुआती जीवन बहुत ऐशो-आराम में गुजरा. घर पर टीचर पढ़ाते थे और छोटी उम्र से ही राजशाही बचाने की ट्रेनिंग दी जाने लगी थी. ऐसा कहा जाता है कि रज़ा पहलवी का जन्म ही 'राजा' बनने के लिए हुआ था.

लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. जब 1979 में रज़ा अमेरिका में लड़ाकू पायलट की ट्रेनिंग ले रहे थे, तब ईरान में हुई क्रांति ने उनके पिता की राजशाही ख़त्म कर दी.

रज़ा दूर से ही देखते रहे कि उनके पिता की ताक़त ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. पहले वह पश्चिम के देशों के अच्छे साथी हुआ करते थे, लेकिन सत्ता पलटते ही दुनिया का रुख़ बदल गया.

रज़ा के पिता दूसरे देशों में शरण ढूंढते रहे और आख़िर में मिस्र में कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझते हुए उनकी मौत हो गई.

रज़ा का परिवार अपने ही देश नहीं जा सकता था, उन्हें निर्वासन में रहने वाले कुछ पुराने वफ़ादारों की मदद पर निर्भर रहना पड़ा.

अब कहां हैं, कैसे रहते हैं?

बाद के सालों में भी पहलवी परिवार का रास्ता मुश्किल ही रहा, उन्हें कई दुख झेलने पड़े. रज़ा की छोटी बहन और भाई ने अपनी जान ले ली.

इस तरह रज़ा और उनके परिवार को लोग इतिहास मान चुके थे. जिस राज परिवार की ईरान में तूती बोलती थी, उसका सूर्यास्त होता जा रहा था.

लेकिन हालिया विरोध प्रदर्शन और रज़ा पहलवी की सक्रियता को देखकर लगता है कि वे अब भी अपने लिए ज़मीन टटोल रहे हैं. 65 साल की उम्र में रज़ा पहलवी फिर से अपने देश की सियासत में हिस्सेदारी चाहते हैं.

अब रज़ा पहलवी अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी के पास एक शांत इलाक़े में रहते हैं. उन्होंने ईरानी-अमेरिकी मूल की यास्मिन से शादी की, जो पेशे से वकील हैं.

दोनों की तीन बेटियां हैं- नूर, इमान और फ़राह. रज़ा के समर्थक कहते हैं कि वह साधारण जीवन जीते हैं. आगंतुकों से आसानी से मिलते हैं. अक्सर बिना किसी विशेष सुरक्षा के अपनी पत्नी यास्मिन के साथ आसपास के लोकल कैफ़े चले जाते हैं.

2022 में जब एक राहगीर ने पूछा कि क्या वे ख़ुद को ईरान में हो रहे प्रदर्शनों के नेता मानते हैं? इस पर रज़ा और उनकी पत्नी यास्मिन ने एक साथ कहा, "बदलाव देश के अंदर से आना चाहिए."

राजशाही से लोकतंत्र के पैरोकार तक

हाल के सालों में रज़ा अपनी बातों को मजबूत तरीके से पेश कर रहे हैं. 2025 में इसराइल के हवाई हमलों में कई बड़े ईरानी जनरलों के मारे जाने के बाद रज़ा ने पेरिस में प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. उन्होंने कहा कि अगर ईरान की वर्तमान सरकार गिर जाए तो वह अंतरिम हुकूमत चलाने में मदद करने के लिए तैयार हैं.

रज़ा ने 100 दिन का प्लान भी बताया कि वह सत्ता में आए तो कैसे काम करेंगे. रज़ा कहते हैं कि उनमें एक नई हिम्मत आई, जो निर्वासन के सबक़ और उनके पिता के अधूरे काम से आई है.

रज़ा लोकतांत्रिक व्यवस्था के पैरोकार हो गए हैं. पेरिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा, "अब पुरानी राजशाही वापस लाने की बात नहीं है. सभी ईरानियों के लिए लोकतांत्रिक भविष्य बनाने की बात है."

रज़ा पहलवी भले अब लोकतंत्र की बात कर रहे हों, लेकिन विरोधी बार-बार उनके इतिहास का हवाला देते हुए उनकी मंशा पर शक जाहिर करते हैं. 1980 में रज़ा ने काहिरा में ख़ुद को 'शाह' घोषित किया था, इसका कोई असर तो नहीं हुआ लेकिन रज़ा की छवि को झटका लगा.

कुछ विरोधी कहते हैं कि यदि रज़ा खुद को लोकतंत्र का समर्थक बताते हैं तो उन्होंने ऐसा क्यों किया. लोग अब भी रज़ा के पिता के शासन के दौरान की सेंसरशिप और सीक्रेट पुलिस सावक को याद करते हैं, जो विरोध करने वालों की आवाज़ को दबाती थी, मानवाधिकारों का उल्लंघन करती थी.

हालांकि, निर्वासन में रहते हुए रज़ा राजशाही समर्थकों के लिए बड़ा प्रतीक बने हुए हैं. कुछ लोग उनके पिता के समय को अब से बेहतर मानते हैं. उनका मानना है कि तब ईरान में तेजी से विकास हुआ और पश्चिमी देशों से भी अच्छे संबंध रहे.

सियासी ज़मीन वापस पाने की जद्दोजहद

रज़ा ने कई बार विरोधी गुटों को एकजुट करने के प्रयास भी किए, लेकिन वह असफल रहे. उन्होंने 2013 में नेशनल काउंसिल ऑफ़ ईरान बनाया. लेकिन अंदरूनी झगड़ों और ईरान के अंदर तक कम पहुंच होने के कारण वह नाकाम रहे. रज़ा ने अपनी छवि को बेदाग रखने के लिए हिंसक संगठनों से दूरी बनाई. मोजाहेदीन-ए-ख़ल्क़ जैसे सशस्त्र समूहों को साथ लाने में यकीन नहीं किया. वह हमेशा शांतिपूर्ण बदलाव और पूरे देश के मत से भविष्य तय करने की बात करते हैं.

हाल के सालों में रज़ा फिर से लाइमलाइट में आए. 2017 के प्रदर्शनों में लोग उनके दादा रज़ा शाह की आत्मा की शांति की दुआ मांगते नज़र आए थे. 2022 में महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद ईरान में बड़े प्रदर्शन हुए, जिससे रज़ा फिर चर्चा में आए.

बता दें कि महसा अमीनी ईरानी महिला थीं, जिन्हें हिजाब नियमों के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में लिया गया था. सितंबर 2022 में हिरासत में ही उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद पूरे ईरान में विरोध प्रदर्शन हुए और रज़ा ने इनका पुरज़ोर तरीके से समर्थन किया.

ख़ुद को मजबूत करने के लिए एक और कदम उठाते हुए रज़ा ने 2023 में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से मुलाक़ात की. कुछ ईरानियों ने इसे समझदारी माना तो कुछ ने कहा कि इससे ईरान के अरब और मुस्लिम साथी नाराज़ होंगे.

हाल ही में ईरान-इसराइल तनाव के दौरान बीबीसी की लॉरा कुन्सबर्ग के इंटरव्यू में रज़ा से पूछा गया कि क्या वे उन इसराइली हमलों का समर्थन करते हैं, जिनमें आम लोगों की जान जा सकती है?

इस पर रज़ा ने कहा, "आम ईरानी निशाना नहीं हैं और जो कोई वर्तमान हुकूमत को कमज़ोर करे, उसका देश के अंदर कई लोग स्वागत करेंगे."

रज़ा की भविष्य को लेकर क्या योजना?

रज़ा पहलवी खुद को एक उदारवादी नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं. वह कहते हैं कि वह ईरान को चुनाव, क़ानून का राज और महिलाओं के बराबर के हक़ की ओर ले जाना चाहते हैं. राजशाही वापस लाएं या गणराज्य बनाएं, यह फ़ैसला पूरे देश के वोट से होगा.

समर्थक उन्हें इकलौता ऐसा शख्स मानते हैं जो ईरान में शांतिपूर्ण व्यवस्था स्थापित कर सकता है. जबकि आलोचक कहते हैं कि वह विदेशी मदद पर ज़्यादा निर्भर हैं और देश के अंदर के लोग इतने सालों के झगड़े के बाद किसी निर्वासित नेता पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं.

ईरान में रज़ा की लोकप्रियता कितनी है, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि ऐसा कोई सही सर्वे नहीं हो सका है. रज़ा के पिता की क़ब्र अभी भी काहिरा में है. राजशाही समर्थक उम्मीद करते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब कब्र ईरान लाई जाएगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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