चीन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, किन तीन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा

एंटनी ज़र्चर

अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ चीन गई टीम का हिस्सा

चीन और अमेरिका में लंबे वक्त से जारी तनाव के बीच रविवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन चीन पहुंचे हैं.

बीते पांच सालों में अमेरिका के किसी वरिष्ठ नेता का ये पहला चीन दौरा है. वहीं ब्लिंकन 2021 में जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी कैबिनेट के पहले मंत्री हैं जो चीन पहुंचे हैं.

ब्लिंकन इस साल फरवरी में चीन का दौरा करने वाले थे लेकिन उनके दौरे से पहले अमेरिका के वायुक्षेत्र में चीनी ग़ुब्बारा देखे जाने के बाद दोनों मुल्कों के बीच तनाव बढ़ गया.

अमेरिका ने इसे चीन का जासूसी ग़ुब्बारा कहा और सैन्य जेट से हमला कर इसे गिरा दिया.

हालांकि, चीन ने इससे इनकार किया और कहा कि मौसम की जानकारी लेने वाला ये ग़ुब्बारा रास्ता भटक कर अमेरिकी वायुक्षेत्र में घुस गया था. मामला बढ़ा और ब्लिंकन ने अपना चीन दौरा रद्द कर दिया.

इस घटना के पांच महीनों बाद अब ब्लिकंन चीन-अमेरिका रिश्तों पर चर्चा के लिए बीजिंग पहुंचे हैं.

एंटनी ब्लिंकन के एजेंडे में क्या-क्या है?

दो दिन के अपने चीन दौरे में ब्लिंकन विदेश नीति मामलों से जुड़े चीन के वरिष्ठ अधिकारियों से बात करेंगे. हालांकि वो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़त करेंगे या नहीं इस बारें में अभी कोई जानकारी नहीं है.

इसी सप्ताह शुक्रवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के साथ नज़र आए थे.

चीन और अमेरिका के बीच तनाव की ख़बर अब की नहीं है, बीते कुछ सालों से कई मुद्दों पर दोनों सुपरपावर के बीच असहमति रही है, हालांकि दोनों के बीच सहयोग की भी संभावना रही है.

ब्लिंकन के एजेंडे में चर्चा के लिए कौन-सी तीन बातें अहम रह सकती हैं, जानते हैं.

आपसी रिश्तों में सुधार

ब्लिंकन के दौरे में उनकी पहली प्राथमिकता दोनों मुल्कों के रिश्तों को बेहतर करने और दोनों के बीच फिर से कूटनीतिक रिश्ते बहाल करने की रहेगी.

हालांकि दोनों मुल्कों के वरिष्ठ अधिकारियों की बीते महीने ऑस्ट्रिया के विएना में मुलाक़ात हुई थी.

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी जेक सुलिवन और चीन के वरिष्ठ राजनयिक वांग यी के बीच हुई दो दिन की मुलाक़ात में दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों पर जमी बर्फ कुछ पिघली थी और दोनों में इस बात को लेकर सहमति बनी थी कि दोनों आगे बातचीत करेंगे.

हालांकि बाइडन प्रशासन में एंटनी ब्लिंकन सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं जो बातचीत आगे बढ़ाने के लिए चीन पहुंचे हैं. अक्तूबर 2018 के बाद से किसी अमेरिकी विदेश मंत्री का ये पहला आधिकारिक चीन दौरा है.

दौरे से पहले राष्ट्रपति के डिप्टी सहायक और इंडो-पेसिफ़िक मामलों के संयोजक कर्ट कैंपबैल ने कहा कि इस बारे में बात करने का ये सही मौक़ा है क्योंकि इससे संघर्ष का जोखिम कम होता है.

उन्होंने कहा, "वैश्विक प्राथमिकताओं पर हम सभी को मिलकर काम करने की ज़रूरत है, इस मामले में आगे बढ़ने के दौरान हम आपसी मतभेदों को बीच में नहीं आने दे सकते."

हालांकि ब्लिंकन के दौरे को लेकर चीनी खेमे में शांति छाई हुई है.

चीनी विदेश मंत्री चिन गैंग और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के बीच बुधवार रात फ़ोन पर हुई बातचीत के बारे में चीन के आधिकारिक अकाउंट पर जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार चिन गैंग ने ब्लिंकन से कहा कि हाल के वक्त में आपसी रिश्तों में आए तनाव के लिए "कौन ज़िम्मेदार है ये स्पष्ट है."

इस जानकारी के अनुसार बातचीत के दौरान कथित तौर पर ब्लिंकन ने कहा, "अमेरिका को चीन की चिंताओं का सम्मान करना चाहिए, चीन के आंतरिक मामलों में दखल देना बंद करना चाहिए और कॉम्पटिशन के नाम पर चीन की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास को कम कर नहीं देखना चाहिए."

अमेरिका इस दौरे से जुड़ी घोषणाओं और इससे उम्मीदों पर कम ही ख़बर देता दिख रहा है. ऐसा लगता है कि इस दौरे से जुड़ी जानकारी कूटनीतिक तौर पर दी जाएगी और वो ये होगी कि "बैठक हो गई है."

विदेश मंत्रालय में पूर्व-एशिया मामलों के वरिष्ठ राजनयिक डेनियल जे क्रिटेनब्रिंक कहते हैं कि दोनों के बीच की बातचीत से किसी अभूतपूर्व नतीजे या किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.

हां, अगर इस बैठक में दोनों मुल्कों के बीच आगे फिर बातचीत करने को लेकर सहमति बन जाती है तो ये दोनों के लिए अहम होगा, जिस पर दोनों आगे बढ़ सकते हैं.

व्यापार से जुड़ी मुश्किलों को आसान बनाना

जो बाइडन ने जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली तब तक अमेरिका और चीन के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव आ चुके थे. उनके पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के ख़िलाफ़ कई पाबंदियां लगाई थीं, जिन्हें हटाने की बाइडन की इच्छा नहीं थी. ऐसे में उनके पद संभालने के वक्त से ही दोनों मुल्कों के रिश्ते तनावपूर्ण हो चुके थे.

ट्रंप ने चीन में बने सामान पर लगने वाला आयात कर बढ़ा दिया था.

कुछ मामलों में बाइडन ट्रंप से एक कदम आगे बढ़ते भी नज़र आए. उन्होंने अत्याधुनिक इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक की रेस में अमेरिका की बढ़त बनाए रखने के लिए चीन को होने वाले अमेरिकी कंप्यूटर चिप्स के निर्यात पर पाबंदियां लगाईं.

चीन ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उसने चीन में अमेरिका के सबसे बड़े कंप्यूटर मेमोरी चिप उत्पादक मइक्रॉन की बिक्री पर रोक लगा दी. उसका कहना था कि इससे चीन के क्रिटिकल इंफ़ॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को ख़तरा हो सकता है.

कर्ट कैंपबैल ने चीन की चिंताओं की बात स्वीकार की, हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अब तक जो कदम उठाए हैं वो उनका बचाव कर सकता है, उनके बारे में बात कर सकता है और आगे क्या हो सकता है उस बारे में भी जानकारी दे सकता है.

लेकिन अगर कंप्यूटर तकनीक ऐसा सेक्टर है जिसे लेकर दोनों सुपरपावर के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा हो सकती है, तो अवैध ड्रग्स का व्यापार ऐसा क्षेत्र है जहां दोनों के बीच सहयोग संभव है.

अमेरिका चीन में बन रहे केमिकल्स के आयात को कम करना चाहता है. इस केमिकल का इस्तेमाल फैटानिल नाम का नशीला पदार्थ बनाने में किया जाता है. ये एक कृत्रिम नशीला पदार्थ है जो हेरोइन से भी कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है.

बीते सात सालों में अमेरिका में ड्रग के ओवरडोज़ से होने वाली मौतों के आंकड़ों में बड़ा उछाल आया है. इनमें फैटानिल से होने वाली मौतों में तीन गुना से अधिक उछाल दर्ज किया गया है.

डेनियल क्रिटेनब्रिंक कहते हैं, "अमेरिका के लिए ये बेहद अहम और बेहद अर्जेंट मुद्दा है." हालांकि वो मानते हैं कि इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं.

2021 के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि चीन 216 अरब डॉलर मूल्य के केमिकल्स का निर्यात करता है और इस मामले में दुनिया का तीसरा बड़ा उत्पादक है. अमेरिका इसका सबसे बड़ा खरीदार है, जिसके बाद दूसरे नंबर पर भारत, फिर दक्षिण कोरिया, जापान और ब्राज़ील हैं.

किसी तरह के टकराव की स्थिति से बचना

फरवरी में अमेरिकी वायुक्षेत्र में चीन के कथित जासूसी ग़ुब्बारा दिखने वाले मामले के बाद इस तरह की ख़बरें देखने को मिलीं कि चीन रूस को हथियार देने पर विचार कर रहा है. कहा गया कि इन हथियारों का इस्तेमाल रूस यूक्रेन के ख़िलाफ़ चल रहे युद्ध में करेगा.

बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने इस दावे से अपने कदम वापस ले लिए. अमेरिका ने ऐसा न किया होता तो दो मुल्कों (रूस और यूक्रेन) के बीच जारी युद्ध के अमेरिका और चीन के बीच के प्रॉक्सी वॉर बनने का ख़तरा हो सकता था.

लेकिन ये उम्मीद की जा सकती है कि विएना में अमेरिका ने चीन को चेतावनी दी है कि वो ब्लिंकन के इस दौरे में भी सुनाई दे सकती है. विएना में अमेरिका ने कहा था कि अगर चीन रूस को सैन्य मदद या फिर आर्थिक मदद देता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

एक अलग मुद्दा ताइवान की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर का भी है. दोनों ही मुल्कों के युद्धपोत ताइवान की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर में आते-जाते दिखते हैं और इसे लेकर दोनों के बीच तीखी बयानबाज़ी भी होती है. चीन इन इलाक़ों पर अपना दावा करता है, जबकि अमेरिका का कहना है कि ये अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ते हैं.

ब्लिंकन पहले ही कह चुके हैं कि इस दौरे में उनकी राजनयिकों की टीम का और उनका उद्देश्य तनाव के "जोखिम को कम करना" और एक बार फिर बातचीत जारी रखने की प्रक्रिया को शुरू करना है.

लेकिन ब्लिंकन के इस दौरे से काफी कुछ उम्मीद करना सही नहीं होगा. साथ ही दोनों मुल्कों के बीच अधिक सहयोग या साझेदारी खुद बाइडन के लिए गले की फांस बन सकती हैं.

अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं और हो सकता है कि इस दौरान अमेरिका में चीन-विरोधी भावनाएं तेज़ होने लगें. बाइडन ये जोखिम नहीं लेना चाहेंगे.

उनके इस दौरे से एक संतोषजनक नतीजा शायद ये निकल सके कि दोनों पक्ष आगे के लिए भी बातचीत के रास्ता खोल दें ताकि भविष्य में सैन्य संघर्ष की आशंका न रहे.

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