भारत में माता-पिता बनने के बाद पढ़ाई करना कितना आसान हुआ?

    • Author, विष्णुकांत तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"पढ़ने की बहुत इच्छा होती है, लेकिन 8 साल पहले घर वालों ने शादी कर दी थी. शादी के दो साल बाद मां बन गई, तो पढ़ाई-लिखाई छोड़नी पड़ी."

यह कहना है मध्य प्रदेश के रीवा की गीता (बदला हुआ नाम) का, जिन्हें मां बनने के बाद पढ़ाई पूरी तरह से छोड़नी पड़ी.

30 साल की गीता कहती हैं, "वह शिक्षक बनना चाहती थीं, लेकिन गांव में केवल प्राथमिक स्कूल होने के कारण उनकी शिक्षा वहीं रुक गई. शादी के बाद छठी कक्षा में दाखिला लिया था, लेकिन उसके एक साल बाद मां बन गई. अब बच्चों की देखभाल में ही सारा समय निकल जाता है."

गीता की कहानी भारत में लाखों माताओं की स्थिति को बयां करती है. लेकिन 'प्रथम' नामक गैर सरकारी संस्था की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) के आँकड़े एक उम्मीद भी जगाते हैं.

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माताओं की शिक्षा में सुधार के संकेत पर क्या कहती है रिपोर्ट?

इस रिपोर्ट के अनुसार देशभर में साल 2016 तक 49% माताओं ने कभी भी स्कूली शिक्षा नहीं ली थी जो 2024 में घटकर 29.4% तक आ गई है.

माताओं की शिक्षा के मामले में केरल सबसे बेहतर स्थिति में है जहां क़रीब 70% माताओं ने दसवीं कक्षा से ज्यादा तक पढ़ाई की है. केरल में केवल 0.5% माताएं ऐसी हैं जिन्होंने कभी स्कूली शिक्षा नहीं ली है.

इसी रिपोर्ट के अनुसार राज्यों में मध्यप्रदेश में सबसे कम मात्र 9.7% माताएं ही दसवीं से आगे की पढ़ाई कर पाती हैं. मध्यप्रदेश में साल 2016 में यह आंकड़ा मात्र 3.6% था.

असर की साल 2016 की ऐसी ही वार्षिक रिपोर्ट को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि माताओं की शिक्षा में बदलाव साल 2016 के बाद ज़्यादा पुख़्ता हुई है.

प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि माताओं के बीच बढ़ते शिक्षा स्तर का सीधा संबंध पिछले कुछ साल में स्कूलों में हुए समग्र नामांकन दरों में बढ़ोतरी से है.

उन्होंने बताया, "ये ऐसी माताएं हैं जिनके बच्चे 5-16 वर्ष की आयु वर्ग में हैं. जो माताएं अधिक शिक्षित हैं, वे अधिकतर छोटे बच्चों की माताएं हैं. अगर कोई बच्चा 5 साल का है और उसकी मां 20 साल की है, तो संभावना है कि वह मां उस समय स्कूल गई होगी जब प्रारंभिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के प्रयास चल रहे थे और स्कूलों में दाखिला लेने की संख्या बढ़ी हुई थी."

इंडियन एक्सप्रेस की इसी रिपोर्ट में शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा गया कि माताओं के शिक्षित होने के आंकड़ों में आया सुधार सर्व शिक्षा अभियान (जो अब समग्र शिक्षा के नाम से जाना जाता है) को जाता है.

यह अभियान सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के मक़सद से साल 2001-02 में शुरू किया गया था.

इससे पिताओं के शिक्षा स्तर में भी सुधार देखने को मिला है. साल 2010 में जहां 27% पिताओं ने स्कूली शिक्षा नहीं ली थी, साल 2024 तक यह घटकर 18% रह गया, यानी पिताओं की शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ.

हालांकि, पिताओं की शिक्षा के मामले में भी क्षेत्रीय असमानताएं देखने को मिलती हैं.

साल 2024 में केरल में सबसे कम 0.6% पिता अशिक्षित हैं वहीं मेघालय में सबसे ज्यादा 31% पिता स्कूली शिक्षा से दूर हैं.

रिपोर्ट से पता चलता है कि माताओं की उच्च शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है. साल 2010 में केवल 6% माताओं ने दसवीं से ऊपर की पढ़ाई की थी, जो साल 2024 में बढ़कर 19.5% हो गया.

लेकिन इन आँकड़ों को बारीकी से देखने पर माताओं की शिक्षा के स्तर में राज्यों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है.

माताओं की शिक्षा में असमानता की तस्वीर

रिपोर्ट बताती है कि साल 2024 तक भी 10 राज्यों में 25% से अधिक माताएं कभी स्कूल नहीं गईं. राजस्थान में 44.8%, बिहार में 44.4%, उत्तर प्रदेश में 39.5% और मध्य प्रदेश में 32.8% माताएं स्कूली शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं.

बिहार के पटना जिले की आरती देवी कहती हैं, "मेरी शादी 14 साल की उम्र में हो गई. आज मेरे पांच बच्चे हैं. तीसरी तक ही पढ़ाई कर पाई थी, क्योंकि स्कूल दूर था और घर में पैसे नहीं थे."

आरती अब अपनी बेटियों को पढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही हैं. लेकिन उनकी कहानी ग्रामीण इलाकों में शिक्षा पाने के प्रयासों के जड़ में बसी चुनौतियों को उजागर करती है.

बिहार स्थिति बिहार महिला समाज के साथ महिलाओं और बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालीं इबराना नाज़ कहती हैं, "यह अच्छी बात है कि देश में महिलाओं के शिक्षित होने के आंकड़े बेहतर हो रहे हैं, लेकिन यह भी देखना पड़ेगा कि हम किस स्तर की शिक्षा को शिक्षित होना मान रहे हैं."

"क्या सिर्फ साक्षर होने को या नाम लिख पाने को इसके पैरामीटर के तौर पर देखा जा रहा है या हायर एजुकेशन ले पाने को. क्योंकि जब हम दसवीं या उससे ऊपर की शिक्षा की बात करते हैं तो स्थिति बहुत खराब है."

दसवीं से अधिक पढ़ पाने वाली माताओं की बात करें तो मध्य प्रदेश इसमें सबसे पीछे खड़ा है.

मध्य प्रदेश में आज भी लगभग 33% माताएं स्कूली शिक्षा से वंचित हैं और मात्र 9.7% माताएं दसवीं से आगे की पढ़ाई कर पाती हैं.

मध्य प्रदेश के छतरपुर की रहने वाली खुशबू, जिन्हें मां बनने के बाद अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी,

वह कहती हैं, "मैं किस्मत वाली हूं. मेरी ज्यादातर सहेलियों ने स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. आज उनके भी बच्चे हैं लेकिन उनका आगे पढ़ने का सपना अब शायद ही पूरा हो पाए."

खुशबू बताती हैं कि उनके परिजनों और ससुराल के तरफ से उन्हें पूरा सहयोग मिला है लेकिन मां बनने के बाद बच्चे और परिवार की जिम्मेदारी के साथ ही शारीरिक बदलाव भी आगे की पढ़ाई जारी रखने में अड़चन पैदा करते हैं.

छतरपुर में ही इंदू लाइब्रेरी के नाम से एक पुस्तकालय चला रहीं सदफ़ ख़ान कहती हैं कि महिलाओं और आगे चलकर माँ बनने वाली लड़कियों की शिक्षा में एक बड़ा कांटा सामाजिक दबाव और ज़िम्मेदारियों का बोझ है.

सदफ़ कहतीं हैं, "ख़ुशबू का अगर मामला लेते हैं तो उसमें परिवार वाले उनकी पढ़ाई में सहयोग करना चाहते हैं लेकिन ख़ुशबू पर अब एक बच्चे की ज़िम्मेदारी है, साथ ही घर की भी. वह आगे चलकर शिक्षक बनना चाहती थीं, वह चाहती थीं कि आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र बन सके लेकिन अक्सर ज़िम्मेदारियों के बीच पढ़ाई पीछे छूट जाती है."

भोपाल स्थित गैर सरकारी संस्था सरोकार की फाउंडिंग मेंबर कुमुद सिंह कहती हैं कि, "आज हम जिन माताओं की बात कर रहे हैं वो 20-25 साल पहले स्कूल जाने की उम्र में रही होंगी और उनकी शिक्षा का स्तर तो किसी से छुपा नहीं है."

केरल और बिहार के आंकड़े इस असमानता को उजागर करते हैं.

केरल में 10वीं से अधिक शिक्षित माताओं का प्रतिशत लगातार बढ़ा है, जबकि बिहार में यह वृद्धि तुलनात्मक रूप से कम है.

इबराना नाज़ कहती हैं, "बिहार में अशिक्षित माताओं की संख्या में 14% की गिरावट आई है, लेकिन दसवीं से ऊपर शिक्षित माताओं की संख्या में केवल 7% की वृद्धि है. यह दिखाता है कि केवल नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. उच्च शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है."

सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि असर की रिपोर्ट में बताये गये आँकड़े बदलाव की और इशारा करते हैं लेकिन राज्यों के बीच असमानता और उच्च शिक्षा तक सीमित पहुंच अब भी चिंता का विषय है.

आने वाले वर्षों में, यह देखना अहम होगा कि क्या सुधार केवल साक्षरता तक सीमित रहता है, या माताओं की उच्च शिक्षा को भी बढ़ावा मिलता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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