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एच-1बी वीज़ा पर अब आई व्हाइट हाउस की सफ़ाई, भारत पर कैसे होगा असर
- Author, अभय कुमार सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीज़ा धारकों के लिए नया कार्यकारी आदेश जारी किया है. इस आदेश के तहत हर नए एच-1बी वीज़ा आवेदक को अमेरिकी सरकार को सालाना एक लाख डॉलर (क़रीब 88 लाख रुपये) फ़ीस देनी होगी. यह नियम 21 सितंबर 2025 से लागू होगा.
व्हाइट हाउस की तरफ़ से साफ़ किया गया है कि यह कोई सालाना फ़ीस नहीं है. यह सिर्फ़ एक बार ली जाने वाली फ़ीस है. साथ ही यह फ़ीस पहली बार अगले एच-1बी वीज़ा लॉटरी साइकिल में लागू होगी.
अब तक यह फ़ीस कुल मिलाकर लगभग 1,500 डॉलर (करीब 1.32 लाख रुपये) थी. अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने कहा कि यह नियम केवल नए आवेदनों पर लागू होगा.
यह भी बताया गया है कि जिनके पास पहले से एच-1बी वीज़ा है और जो इस समय अमेरिका से बाहर हैं, उनसे देश में दोबारा आने पर एक लाख डॉलर नहीं लिया जाएगा.
यह फ़ैसला उन लाखों भारतीय पेशेवरों को सीधे प्रभावित करेगा जो अमेरिका में काम करने का सपना देखते हैं.
यूएस सिटीज़नशिप एंड इमीग्रेशन सर्विसेज़ (यूएससीआईसी) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024 में मंज़ूर किए गए कुल एच-1बी वीज़ा में 71 प्रतिशत लाभार्थी भारत से थे, जबकि चीन 11.7 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था. यानी इस नए नियम का सबसे ज़्यादा असर भारतीयों पर पड़ सकता है.
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार ने एच1बी वीज़ा प्रोग्राम के लिए प्रस्तावित पाबंदियों से जुड़ी ख़बरें देखी हैं. इस कदम के पूरे असर को अभी समझने की कोशिश की जा रही है.
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस फ़ैसले के मानवीय पहलू पर भी असर देखने को मिलेंगे क्योंकि इससे कई परिवारों की मुश्किलें बढ़ेंगी. बयान में कहा गया है कि सरकार को उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन इन परेशानियों का उचित समाधान निकालेगा.
भारत के लिए क्यों है बड़ा मुद्दा
भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, डेटा साइंटिस्ट और तकनीकी विशेषज्ञ दुनिया भर में अपनी काबिलियत के लिए पहचाने जाते हैं. एच-1बी वीज़ा लंबे समय से उनके लिए अमेरिका में काम करने का सबसे अहम ज़रिया रहा है. आंकड़े बताते हैं कि भारत से गए पेशेवर अमेरिका की इनोवेशन और स्टार्टअप इकोसिस्टम की रीढ़ रहे हैं.
ट्रंप ने इस आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए कहा, "मुझे लगता है कि अमेरिकी तकनीकी कंपनियां इससे बेहद खुश होंगी."
वहीं, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने कहा, "अब कंपनियों को तय करना होगा कि क्या किसी विदेशी इंजीनियर को लाने के लिए एक लाख डॉलर देना व्यावसायिक रूप से सही है, नहीं तो उन्हें वापस भेज दो और एक अमेरिकी नागरिक को काम पर रख लो."
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख अजय श्रीवास्तव इस फ़ैसले को मनमाना मानते हैं.
उनका कहना है, "इसका असर लगभग पाबंदी जैसा होगा. हमारे लोग वहां सिर्फ मौज-मस्ती करने नहीं जाते, बल्कि वहां की तकनीक और प्रणाली को आगे बढ़ाते हैं. नुकसान भारत को भी होगा, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका को होगा. और थोड़े समय बाद अमेरिका को यह समझ आ जाएगा."
अजय श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि भारतीय आईटी कंपनियां पहले से ही अमेरिका में 50 से 80 प्रतिशत स्थानीय लोगों को नौकरी देती हैं. ऐसे में इस फ़ैसले से नई नौकरियां ज़्यादा नहीं बढ़ेंगी.
वह कहते हैं, "यह कदम दिखावे के लिए है, असल फ़ायदा किसी को नहीं होगा. उल्टा भारतीयों को ऑनसाइट नौकरी पर रखना अमेरिकी नागरिकों की तुलना में कहीं ज़्यादा महंगा साबित होगा."
भारतीय कंपनियों पर असर
भारतीय आईटी-बीपीएम इंडस्ट्री के व्यापार संगठन नैसकॉम ने इस आदेश पर गहरी चिंता जताई है.
संगठन का कहना है, "इस तरह के बदलाव अमेरिका के इनोवेशन और एंप्लॉयमेंट ढांचे पर असर डाल सकते हैं. इसका सीधा प्रभाव उन भारतीय नागरिकों पर पड़ेगा जो एच-1बी वीज़ा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं."
नैसकॉम का कहना है कि भारतीय तकनीकी कंपनियों के लिए यह बड़ी चुनौती है क्योंकि अमेरिका में चल रहे ऑनसाइट प्रोजेक्ट प्रभावित होंगे और क्लाइंट्स के साथ नई व्यवस्था करनी होगी. संगठन ने फ़ैसला लागू करने की समयसीमा पर सवाल उठाते हुए कहा, "आधी रात से लागू होने वाली एक दिन की डेडलाइन व्यवसायों, पेशेवरों और छात्रों के लिए बड़ी अनिश्चितता पैदा करती है."
भारत की बड़ी आईटी कंपनियां जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS), इन्फ़ोसिस और विप्रो लंबे समय से एच-1बी वीज़ा पर निर्भर रही हैं.
मल्टीनेशनल कंपनियां जैसे एमज़ॉन, माइक्रोसॉफ़्ट, एपल और गूगल भी भारतीय एक्सपर्ट्स पर भरोसा करती हैं. यूएससीआईसी के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक इन कंपनियों ने सबसे ज्यादा एच-1बी वीज़ा हासिल किए थे.
अजय श्रीवास्तव का कहना है, "इतनी बड़ी फ़ीस लागू होने से भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका में प्रोजेक्ट चलाना मुश्किल हो जाएगा. अमेरिका में पाँच साल अनुभव वाले आईटी मैनेजर को 1.20-1.50 लाख डॉलर मिलते हैं, जबकि एच-1बी पर 40% कम और भारत में 80% कम वेतन मिलता है. इतनी भारी फ़ीस के चलते कंपनियां काम को भारत से ही रिमोट तरीके से करवाने पर ज़ोर देंगी. इसका मतलब है कम एच-1बी आवेदन, स्थानीय स्तर पर कम भर्ती, अमेरिकी क्लाइंट्स के लिए महंगे प्रोजेक्ट और इनोवेशन का धीमा पड़ जाना."
चंडीगढ़ स्थित वीज़ा नाऊ सर्विसेज़ के मैनेजिंग डायरेक्टर रुपिंदर सिंह कहते हैं, "अगर यह आदेश कानून बन गया और कोर्ट में भी टिक गया, तो भारतीय पेशेवरों का सबसे ज्यादा नुकसान होगा. अमेरिका जाने का रास्ता लगभग बंद हो जाएगा. न सिर्फ भारत बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भी इससे झटका लगेगा."
वहीं नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत अलग राय रखते हैं.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "डोनाल्ड ट्रंप की 1,00,000 डॉलर एच-1बी वीज़ा फ़ीस अमेरिका के इनोवेशन को रोक देगी और भारत को तेज़ी से आगे बढ़ाएगी. ग्लोबल टैलेंट के लिए दरवाज़े बंद करके अमेरिका लैब्स, पेटेंट, इनोवेशन और स्टार्टअप्स की अगली लहर को बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और गुरुग्राम की तरफ़ धकेल रहा है. भारत के बेहतरीन डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और इनोवेटर अब भारत की प्रगति और विकसित भारत की दिशा में योगदान देने का मौका पाएंगे. अमेरिका का नुकसान भारत का फ़ायदा बनेगा."
अमेरिका के एक्सपर्ट्स क्या कह रहे हैं?
एच-1बी वीज़ा पर ट्रंप प्रशासन के इस बड़े फ़ैसले ने अमेरिकी विशेषज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी भारी-भरकम फ़ीस से न केवल विदेशी पेशेवर प्रभावित होंगे, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा.
केटो इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर ऑफ़ इमिग्रेशन स्टडीज़ डेविड जे. बियर ने एक्स पर लिखा , "अमेरिका के इतिहास का सबसे एंटी-लीगल इमिग्रेशन प्रशासन लगातार देश की समृद्धि और स्वतंत्रता को खतरे में डाल रहा है. यह कार्रवाई एच-1बी वीज़ा को खत्म कर देगी और अमेरिका के सबसे क़ीमती कर्मचारियों पर रोक लगा देगी. यह बिल्कुल अकल्पनीय है."
उन्होंने आगे कहा कि यह कदम अमेरिकी कर्मचारियों को ही नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि इससे "उनकी तनख़्वाहें कम होंगी और कीमतें बढ़ेंगी."
कोलंबिया यूनिवर्सिटी पीएचडी और मैनहटन इंस्टीट्यूट से जुड़े विशेषज्ञ डेनियल डी. मार्टिनो ने कहा, "21 सितंबर रविवार से कोई भी एच-1बी वीज़ा धारक संयुक्त राज्य अमेरिका में दाख़िल नहीं हो पाएगा, यहां तक कि मौजूदा वीज़ा धारक भी नहीं, जब तक कि वे प्रवेश के लिए 1,00,000 डॉलर न चुका दें."
उन्होंने चेतावनी दी कि यह बदलाव "पूरे एच-1बी प्रोग्राम को खत्म कर देगा" और अगर इसे अदालत में नहीं रोका गया तो "हेल्थकेयर, उच्च शिक्षा और टेक्नोलॉजी सेक्टर पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे."
न्यूयॉर्क स्थित इमिग्रेशन अटॉर्नी साइरस मेहता ने एक्स पर लिखा है, "एच-1बी वीज़ा धारक जो अमेरिका से बाहर बिज़नेस या छुट्टी पर गए हैं, वे फंस जाएंगे अगर 21 सितंबर की आधी रात से पहले अमेरिका नहीं पहुंच पाए. भारत में रह रहे कई लोग पहले ही डेडलाइन चूक चुके होंगे क्योंकि सीधी उड़ान भरकर भी समय पर पहुंचना संभव नहीं है."
उन्होंने यह भी कहा कि "शायद अब भी कुछ एच-1बी वीज़ा धारक भारत से उड़ान भरकर 21 सितंबर 2025 की आधी रात से पहले कैलिफ़ोर्निया पहुंच सकते हैं."
हालांकि, इस कार्यकारी आदेश के आने के बाद इस तरह की आशका जताई जा रही थी लेकिन शनिवार की देर रात को व्हाइट हाउस की तरफ़ से इस आदेश की बारीकियों को और विस्तार से साझा किया गया.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने अपने एक एक्स पोस्ट में बताया:
- यह कोई सालाना फ़ीस नहीं है. यह सिर्फ़ एक बार ली जाने वाली फ़ीस है, जो आवेदन पर लागू होगी.
- जिनके पास पहले से एच-1बी वीज़ा है और जो इस समय अमेरिका से बाहर हैं, उनसे देश में दोबारा आने पर एक लाख डॉलर नहीं लिया जाएगा. एच-1बी वीज़ा धारक पहले की तरह देश से बाहर जाकर वापस आ सकते हैं. इस पर राष्ट्रपति के कल के आदेश का कोई असर नहीं पड़ेगा.
- यह नियम सिर्फ़ नए वीज़ा पर लागू होगा. पुराने वीज़ा के नवीनीकरण या मौजूदा वीज़ा धारकों पर इसका असर नहीं होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित