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वाजिद अली शाह: अवध के नवाब से लेकर कलकत्ता में आख़िरी 30 साल बिताने तक - विवेचना
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
ये उस शख़्स की कहानी है जिसके बारे में लोगों की राय पूरी तरह से बँटी हुई है.
क्या वो एक अय्याश शासक थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शासन करने के बजाए विलासिता में बिता दी जैसा कि अंग्रेज़ बताते थे या फिर जैसा कि अधिकतर भारतीय मानते हैं कि वो एक बड़े शायर, संगीतज्ञ और कलाप्रेमी थे, अंग्रेज़ों ने ज़्यादती करके उनकी गद्दी छीन ली और कलकत्ता जाने पर मजबूर कर दिया.
सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है, वाजिद अली शाह कलाकार और कला के कद्रदान ज़रूर थे लेकिन उनका व्यक्तित्व काफ़ी जटिल था.
30 जुलाई, 1822 को जन्मे वाजिद अली शाह 13 फ़रवरी, 1847 को अवध की गद्दी पर बैठे. उनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई जहाँ उन्होंने दरबार में बोली जाने वाली फ़ारसी और क़ुरान पढ़ने लायक अरबी सीखी.
उनको बचपन से ही ज़मीन पर पैरों से ताल देने की आदत थी. मिर्ज़ा अली अज़हर अपनी किताब 'किंग वाजिद अली शाह ऑफ़ अवध' में लिखते हैं, "उनकी इस आदत से उनके एक उस्ताद इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उनके सिर पर इतने ज़ोर से मारा कि उनके एक कान की सुनने की ताक़त हमेशा के लिए चली गई."
"लखनऊ में मौजूद ब्रिटिश रेज़िडेंट को पता था कि उन्हें सुनने में दिक़्क़त होती है इसलिए ज़रूरत पड़ने पर वो वाजिद अली शाह के सामने अपने वाक्य को दोहरा देते थे."
वाजिद अली शाह का बड़ा डील-डौल शरीर था
1840 के दशक में अवध राजनीतिक रूप से तो महत्वपूर्ण रियासत थी लेकिन उसका क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं था. पूरा अवध क़रीब 24 हज़ार वर्ग मील में फैला हुआ था जो स्कॉटलैंड से भी छोटा था.
1850 के आसपास पूरे राज्य की जनसंख्या क़रीब एक करोड़ थी जिसमें क़रीब सात लाख लोग लखनऊ और उसके आसपास रहते थे.
इसके बावजूद उसकी आबादी उस समय की दिल्ली की लगभग दोगुनी थी.
वाजिद अली शाह ने 26 वर्ष की आयु में अपनी आत्मकथा लिखी थी 'परीख़ाना', जिसमें उन्होंने अपने प्रेम प्रसंगों और संगीत-नृत्य से अपने बहुआयामी सरोकारों की दास्तान लिखी थी. सवाल उठता है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम 'परीख़ाना' क्यों रखा?
इसका जवाब देते हुए शकील सिद्दीक़ी ने उनकी जीवनी की भूमिका में लिखा था, "नवाब साहब ने अपना दिल बहलाने के लिए संगीत-नृत्य सिखाने का इंतज़ाम किया था. इस स्कूल का नाम 'परीख़ाना' रखा गया था जिसमें उस समय की संगीत और नृत्य में निपुण लड़कियों को भर्ती किया जाता था."
"इसमें दाख़िल होने वाली लड़कियों को 'परी' कहा जाता था. उसमें अपने समय के कुछ माहिर उस्ताद संगीतज्ञ भी मुलाज़िम थे, जिनसे लड़कियाँ तालीम लेती थीं. ख़ुद वाजिद अली शाह भी सीखते थे."
परीख़ाना उसी जगह स्थापित हुआ था जहाँ 1878 में कैनिंग कॉलेज क़ायम हुआ और जहाँ आज संगीत का मशहूर भातखंडे महाविद्यालय है.
संगीत में रुचि के कारण पिता ने किया नज़रबंद
नवाब वाजिद अली शाह ख़ुद संगीत और नृत्य के बड़े ज्ञाता थे. उन्होंने अपने इस शौक़ पर बड़ी रक़म ख़र्च की.
आख़िरकार, अवध के रेज़िडेंट कर्नल स्लेमन ने इस पर रोक लगा दी. साथ ही, उसने कई संगीतकारों को शहर-बदर करा दिया.
वाजिद अली शाह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मेरे पिता अमजद अली शाह ने मेरी गतिविधियों के प्रति गहरी अरुचि और नाराज़गी ज़ाहिर की थी. यहाँ तक कि मुझे एक बार नज़रबंद कर दिया था. ये सामंती परंपरा के निर्वाह में कुछ ज़रूरी मूल्यों को बचाने की उनकी चिंता थी."
शायर और नाटककार
वाजिद अली शाह एक रचनात्मक, मुश्किल और दिलचस्प इंसान थे. उनके बाल छल्लेदार होते थे और वो अपनी पोशाक इस अंदाज़ में पहनते थे कि उनका सीना लोगों को दिखाई देता था. सन् 1847 में अवध की गद्दी संभालने से पहले ही 'बहार-ए-इश्क़' जैसी रचनाएँ लिख चुके थे.
उनके नाटक कई महीने की तैयारी के बाद मंचित किए जाते थे. सन 1853 में उन्होंने एक योगी मेला करवाया था जिसमें उन्होंने अपने महल का बाग़ीचा आम लोगों के लिए खोल दिया था.
मनु एस पिल्लई अपनी किताब 'द कोर्टिज़ान, महात्मा एंड द इटालियन ब्राह्मण' में लिखते हैं, "इस आयोजन में सभी लोगों को केसरिया वस्त्र पहनकर आने के लिए कहा गया था. सन 1843 में उन्होंने कृष्ण के जीवन पर आधारित एक नाटक का मंचन किया था जिसमें उनकी चार पत्नियों ने गोपियों की भूमिका निभाई थी."
वाजिद अली शाह की पत्नियों की तादाद सैकड़ों में बताई जाती है.
रोज़ी जोंस अपनी किताब 'द लास्ट किंग ऑफ़ इंडिया' में लिखती हैं, "कलकत्ता में रहने वाले उनके एक वंशज के अनुसार, नवाब इतने पाक-साफ़ आदमी थे कि वो किसी महिला से तब तक कोई संबंध नहीं रखते थे जब तक उन्होंने उससे अस्थायी विवाह न किया हो. इसमें कोई शक नहीं कि उन्हें महिलाओं से घिरे रहना पसंद था."
शकील सिद्दीक़ी लिखते हैं, "रंगीले पिया और जान-ए-आलम जैसे विशेषणों से मशहूर हो जाने वाले इस बादशाह ने यौन संबंधों में महिलाओं की रज़ामंदी का सम्मान किया और धार्मिक नियमों का कड़ाई से पालन किया."
"विधिवत विवाह किए बिना उन्होंने किसी स्त्री से संबंध नहीं बनाया. साथ ही, उन्होंने सभी बेग़मों को संबंध-विच्छेद की छूट भी दी. ख़र्च के लिए सबको हैसियत के हिसाब से निश्चित मासिक राशि के भुगतान की व्यवस्था भी की."
अवध में अंग्रेज़ों का हस्तक्षेप बढ़ा
16 नवंबर, 1847 को नवाब वाजिद अली शाह अंग्रेज़ गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग से मिलने कानपुर गए. गवर्नर जनरल ने अवध की स्थिति पर असंतोष प्रकट किया.
शासन व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करने के लिए उन्होंने वाजिद अली को एक पत्र के ज़रिए दो साल का समय दिया.
जनवरी 1849 में कर्नल स्लेमन को अवध का रेज़िडेंट बनाकर लखनऊ भेजा गया. उस पूरे साल वाजिद अली गंभीर रूप से बीमार रहे.
हालात का फ़ायदा उठाते हुए स्लेमन ने पूरे अवध का भ्रमण कर डाला और राज-काज के काम में अपना हस्तक्षेप बढ़ाना चाहा.
उसने वाजिद अली शाह के एक ख़ास सलाहकार को बर्ख़ास्त करने की सलाह दी जिसे नवाब ने नहीं माना.
स्लेमन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "वाजिद अली के चरित्र से बहुत उम्मीदें नहीं हैं. वो मनमौजी किस्म के शख़्स हैं. उनके रात और दिन ज़नानख़ाने में बीतते हैं. अय्याशी और फ़िज़ूलख़र्ची उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है."
वाजिद अली शाह को अवध की गद्दी छोड़नी पड़ी
हालांकि वाजिद अली शाह ने उसके बाद कई प्रशासनिक सुधार किए और 'दस्तूर-ए-वाजिदी नाम का एक नियम दस्तावेज़ भी लिखा लेकिन 21 नवंबर, 1851 को लॉर्ड डलहौज़ी की सिफ़ारिश पर ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल ने अवध को अंग्रेज़ी राज में मिलाने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की.
17 फ़रवरी, 1856 को अवध को ईस्ट इंडिया कंपनी में विलीन करने की विधिवत घोषणा हुई और नवाब वाजिद अली शाह को अवध की गद्दी छोड़नी पड़ी.
नवाब ने शिकायत की कि उनके साथ ऐसा सलूक क्यों किया जा रहा है?
मनु पिल्लई लिखते हैं, "इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं था लेकिन कुछ हल्कों में ये ज़रूर कहा जाता था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब से काफ़ी कर्ज़ ले रखा था. कर्ज़ लौटाने से बेहतर विकल्प था कर्ज़ देने वाले को बर्बाद कर देना."
कलकत्ता के लिए रवाना हुए
एक ज़माने में वाजिद अली शाह के पास 60 हज़ार से अधिक सैनिक होते थे, लेकिन उन्होंने उनका इस्तेमाल अंग्रेज़ों के विरोध में नहीं किया.
13 मार्च को इंग्लैंड की महारानी को अर्ज़ी देने के मक़सद से वो कलकत्ता रवाना हुए जहाँ से वो लंदन जाना चाहते थे. वाजिद अली शाह के प्रति अंग्रेज़ों के व्यवहार ने लखनऊ और अवध के ग्रामीण इलाके़ के लोगों में उथल-पुथल पैदा कर दी.
रुद्रांशु मुखर्जी अपनी किताब 'अ बेगम एंड द रानी' में लिखते हैं, "वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाने का लोगों ने विरोध किया. उस ज़माने में उस इलाके़ में एक लोकगीत प्रचलित हुआ, 'अंग्रेज़ बहादुर आइन, मुल्क लै लीन्हो'."
"जब वाजिद अली शाह कलकत्ता के लिए रवाना हुए तो उनकी प्रजा के बहुत से लोग कानपुर तक उनके साथ गए."
विलियम क्रुक ने अपनी किताब 'सॉन्ग्स अबाउट द किंग ऑफ़ अवध' में लिखा, "जान-ए-आलम के रवाना होने के बाद लखनऊ की हालत बिना किसी अतिश्योक्ति के ऐसी हो गई जैसे शहर की आत्मा निकल गई हो. शहर की कोई सड़क, बाज़ार और घर ऐसा नहीं था जो जान-ए-आलम के विरह में दुखी न हुआ हो."
लखनऊ से विदा होते समय उन्होंने एक शेर कहा था-
दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं/ख़ुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं...
विद्रोह में मिलीभगत के शक में हुए नज़रबंद
वाजिद अली शाह पानी के रास्ते 13 मई, 1856 को कलकत्ता पहुंचे.
वहाँ पहुंचते ही वो बीमार पड़ गए इसलिए वो लंदन नहीं जा सके. 18 जून को नवाब की माँ मलिका किश्वर, भाई सिकंदर हश्मत और उनका बेटा लंदन के लिए रवाना हुए.
इस बीच लखनऊ और मेरठ जैसी जगहों पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह भड़क उठा.
वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने अपने पुत्र को बादशाह घोषित करके अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह का नेतृत्व किया.
विद्रोहियों से मिलीभगत के संदेह में 15 जून, 1857 को अंग्रेज़ों ने वाजिद अली शाह को हिरासत में लेकर फ़ोर्ट विलियम में नज़रबंद कर दिया. 9 जुलाई, 1858 को उन्हें ब्रिटिश क़ैद से रिहा किया गया.
जीवन के आख़िरी 30 साल कलकत्ता में बिताए
सन 1874 में 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने भारत के इस बहुत अमीर आदमी के जीवन की कहानी लिखने के लिए अपने एक संवाददाता को भारत भेजा.
मनु एस पिल्लई लिखते हैं, "जब तक वो संवाददाता भारत पहुंचता तब तक वाजिद अली शाह विपरीत परस्थितियों में कई दशक बिता चुके थे. उनका राजकाज छिन चुका था और उनकी दौलत भी पहले से कहीं कम रह गई थी. अब वो कलकत्ता के एक इलाके़ में रह रहे थे. उनके भवन और उसके चारों तरफ़ उनके क़रीब सात हज़ार लोग रह रहे थे."
अपने जीवन के आख़िरी 30 साल उन्होंने कलकत्ता में बिताए.
65 वर्ष की आयु में हुआ निधन
21 सितंबर, 1887 को सुबह दो बजे कलकत्ता के मटियाबुर्ज में उनका निधन हुआ.
रोज़ी जोंस लिखती हैं, "अपने आख़िरी दिनों में उन्होंने ख़ुद से चलना छोड़ दिया था. उन्हें कुर्सी पर बिठाकर इधर-उधर ले जाया जाता था. अंतिम समय में पान और हुक्का ही उनके साथी थे."
"बीमारी की वजह से उन्हें कई घंटे शौचालय में बिताने पड़ते थे. उनकी मौत होते ही पुलिस ने उनके निवास स्थान को घेर लिया था. इसकी मुख्य वजह ये थी कि नवाब के रिश्तेदार और नौकर उनकी क़ीमती चीज़ों को लूट न सकें."
स्टेट्समैन अख़बार ने अपने 23 सितंबर,1887 के अंक में वाजिद अली शाह की अंतिम यात्रा का वर्णन करते हुए लिखा था, "नवाब के पार्थिव शरीर को पूरे ब्रिटिश शान के साथ दफ़नाने के लिए ले जाया गया. उनके पार्थिव शरीर को नहलाकर सफ़ेद रंग के कफ़न से लपेटा गया जिस पर लाल रंग से क़ुरान की आयतें लिखी हुई थीं."
"सुरक्षाकर्मियों ने शोक में अपने हथियार उल्टे कर रखे थे और सेना का बैंड 'डेड मार्च' बजा रहा था. साथ चलने वाले लोग ज़ोर-ज़ोर से रो रहे थे. एक घंटे बाद उनका पार्थिव शरीर सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा पहुंचा था."
उनके निधन के समय उन्हें सरकार की तरफ़ से 12 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन मिलती थी जिसमें से पाँच हज़ार रुपए उन्हें टैक्स के रूप में देने पड़ते थे.
वाजिद अली शाह उस समय भारत में सबसे अधिक पेंशन पाने वाले शख़्स थे.
एलन्स इंडियन मेल एंड ओरियंटल गज़ेट के अनुसार, "उनकी पेंशन उस समय रानी विक्टोरिया को मिलने वाले प्रिवी पर्स से भी अधिक थी."
'अख़्तर' उपनाम से करते थे शायरी
वाजिद अली शाह में ग़ज़ब की सृजनात्मक क्षमता और अद्भुत कल्पना शक्ति थी.
वो शायरी के लिए 'अख़्तर' उपनाम का इस्तेमाल करते थे. मशहूर शायर जोश मलीहाबादी ने उन्हें अपने एक शेर में याद करते हुए कहा था
तुमने क़ैसर बाग़ को देखा तो होगा बारहा/आज भी आती है जिसमें हाय 'अख़्तर' की सदा
'लखनवी भैरवी', 'ठुमरी' और कथक नृत्य को बढ़ावा देने में उनका बहुत बड़ा योगदान था, वे ख़ुद भी गाते थे.
मशहूर ठुमरी 'बाबुल मोरा नैहर छूटोहि जाए' उनकी एक अमर रचना है.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम का प्रकाशन)