यूपी में नाबालिग़ों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर के बाद उनके मां-बाप को गिरफ़्तार करने के तीन मामले क्या हैं?

उत्तर प्रदेश

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इमेज कैप्शन, बदायूं के एसएसपी बृजेश सिंह (बीच में) ने इस मामले में थाना प्रभारी को लाइन हाज़िर कर दिया है
    • Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

बदायूं पुलिस ने 17 दिसंबर को चार महिलाओं को गिरफ़्तार किया था. इन महिलाओं को बाद में एसडीएम कोर्ट से ज़मानत मिल गई, लेकिन यह मामला चर्चा का विषय बन गया है.

यह मामला उसैहत थाने का था. इसमें तत्कालीन एसएचओ अजय पाल सिंह का तर्क था कि इन महिलाओं के ख़िलाफ़ इसलिए कार्रवाई की गई, क्योंकि उनके नाबालिग़ बच्चों पर एक नाबालिग़ लड़की से छेड़छाड़ का आरोप था.

एसएचओ ने उस समय मीडिया से कहा था कि माता-पिता ने बच्चों को "अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं, इसलिए यह कार्रवाई की गई है."

बदायूं के एसएसपी बृजेश सिंह के पीआरओ अश्विनी कुमार के मुताबिक़, थाना प्रभारी को जांच और शिकायतों में लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाज़िर कर दिया गया है.

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हालांकि यह कार्रवाई मुरादाबाद के डीआईजी अजय साहनी की समीक्षा बैठक के बाद की गई थी.

वहीं बच्चों की जगह उनके माता-पिता को गिरफ़्तार करने से जुड़े सवाल पर पुलिस की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है.

क्या है मामला?

उसैहत थाना क्षेत्र में बीते एक माह के दौरान नाबालिग़ों से जुड़े तीन बड़े मामले सामने आए, जिनमें आरोप बच्चों पर लगे, लेकिन पुलिस ने उनके माता-पिता या परिजनों को जेल भेज दिया.

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इन मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या पुलिस क़ानून के अनुसार कार्रवाई कर रही थी, या फिर अपने स्तर पर "संदेश देने" के नाम पर दंडात्मक रवैया अपना रही थी.

यह मामला 17 दिसंबर का है. थाना क्षेत्र में कक्षा आठ की एक छात्रा के पिता ने शिकायत दर्ज कराई कि गांव के चार नाबालिग़ लड़कों ने उसकी बेटी पर अश्लील टिप्पणियां कीं और छेड़छाड़ की.

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज किया. हालांकि, आरोपी बच्चे 13 वर्ष से कम उम्र के थे, इसलिए उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया.

इसके बजाय पुलिस ने उनके परिवारों को नोटिस जारी किए और बाद में चारों लड़कों की माताओं को गिरफ़्तार कर लिया.

पुलिस ने इन महिलाओं को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 (गंभीर संज्ञेय अपराध को पहले से रोकना) के तहत निवारक कार्रवाई में गिरफ़्तार किया. उन्हें उपज़िलाधिकारी की अदालत में पेश किया गया, जहां से निजी मुचलके पर उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया गया.

इस मामले में विवाद उस समय खड़ा हुआ, जब तत्कालीन एसएचओ अजय पाल सिंह ने मीडिया से कहा कि नाबालिग़ बच्चे "बदतमीज़ और शरारती" हैं और उनके माता-पिता ने उन्हें "अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं."

उन्होंने यह भी कहा कि माता-पिता पर कार्रवाई इसलिए की गई, ताकि समाज में एक संदेश जाए.

एसएचओ के इस बयान को क़ानूनी जानकारों और सामाजिक संगठनों ने क़ानून की भावना के ख़िलाफ़ बताया.

पुलिस से सवाल पूछे जा रहे हैं कि "अच्छे संस्कार" तय करने का अधिकार पुलिस को किसने दिया है? क्या माता-पिता को बच्चों की कथित हरकतों के लिए जेल भेजा जा सकता है?

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पहले भी हुए ऐसे मामले

यह पहला मामला नहीं था. इससे पहले 22 नवंबर को क़स्बे के स्कूल में कक्षा सात-आठ की छात्राओं की पानी की बोतलों में कथित तौर पर पेशाब भरने और स्कूल की दीवारों पर अश्लील शब्द लिखने की घटना सामने आई थी.

आरोप चार नाबालिग़ लड़कों पर लगे और मुक़दमा भी उन्हीं के ख़िलाफ़ दर्ज हुआ था, लेकिन पुलिस ने उन नाबालिग़ों के पिताओं को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया था.

इसी तरह 12 दिसंबर को प्रधानमंत्री की तस्वीर से छेड़छाड़ और उस पर अभद्र टिप्पणी लिखने के मामले में आरोप एक नाबालिग़ छात्रा पर लगा, लेकिन पुलिस ने छात्रा के भाई को जेल भेज दिया.

हालांकि, इन तीनों मामलों में गिरफ़्तार किए गए लोगों से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है.

इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं. मामले ने उस समय राजनीतिक तूल पकड़ लिया, जब समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार पर निशाना साधा.

विपक्ष का आरोप है कि नाबालिग़ों से जुड़े संवेदनशील मामलों में पुलिस क़ानून की समझ और मानवीय दृष्टिकोण, दोनों में विफल रही है.

समाजवादी पार्टी के बदायूं ज़िलाध्यक्ष आशीष यादव ने आरोप लगाया, "बीजेपी सरकार में गुंडाराज चरम पर है. पुलिस कंफ्यूज़ है कि किस पर कार्रवाई करनी है और किस पर नहीं. बेगुनाहों पर कार्रवाई हो रही है. महिलाओं और बच्चों तक को बेवजह जेल भेजा जा रहा है."

उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एसएचओ को हटाने से काम नहीं चलेगा, जब आला अधिकारियों को जानकारी थी, तो जवाबदेही उनकी भी बनती है.

विवाद बढ़ने के बाद पुलिस मुख्यालय स्तर से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की गई है.

बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष राजीव गुप्ता का कहना है कि प्रकरण संज्ञान में आया है और जानकारी ली जा रही है.

उन्होंने कहा, "जहां तक क़ानून व्यवस्था की बात है, यूपी में क़ानून-व्यवस्था बेहतर है. अपराधी और माफ़िया भूमिगत हो गए हैं. बहन-बेटियों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला कोई भी हो, बच नहीं सकता. विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वे अनर्गल आरोप लगाते रहते हैं."

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क्या कहता है क़ानून

नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर कई पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच में यह सामने आया कि नाबालिग़ों से जुड़े मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और पॉक्सो क़ानून के प्रावधानों का सही तरीके़ से पालन नहीं किया गया.

माता-पिता पर की गई कार्रवाई को भी क़ानून के दायरे से बाहर माना गया है.

क़ानून के मुताबिक़, वर्तमान एफ़आईआर में धारा 7/8 पॉक्सो अधिनियम 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 296 और 78 अंकित की गई हैं.

पॉक्सो की धारा 7 के अंतर्गत किसी बच्चे को यौन आशय से स्पर्श करना या ऐसा करने के लिए प्रेरित करना लैंगिक हमला है, जिसके लिए धारा 8 में न्यूनतम 3 वर्ष से अधिकतम 5 वर्ष तक के कठोर कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.

इसी प्रकार बीएनएस की धारा 296 किसी महिला या बालिका की मर्यादा भंग करने हेतु अश्लील शब्द, संकेत या कृत्य करने को दंडनीय बनाती है.

बीएनएस की धारा 78 स्त्री की लज्जा भंग करने या यौन आशय से की गई अशोभनीय हरकतों को अपराध मानती है. ये सभी धाराएं कृत्य आधारित हैं.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की वकील सायमा ख़ान कहती हैं कि भारतीय दंड क़ानून में माता-पिता पर किसी और का अपराध थोपे जाने की ज़िम्मेदारी की कोई सामान्य अवधारणा नहीं है.

उनका कहना है कि पॉक्सो और बीएनएस में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो नाबालिग़ द्वारा किए गए कथित अपराध के लिए उसकी मां को अभियुक्त या हिरासत में लेने की अनुमति देता हो.

जब अभियुक्त स्वयं नाबालिग़ हो, तब किशोर न्याय बालकों की देखरेख एवं संरक्षण अधिनियम 2015 के तहत पूरी प्रक्रिया केवल बालक के ख़िलाफ़ संचालित की जानी होती है.

सायमा ख़ान के अनुसार अभिभावकों की गिरफ्तारी तभी संभव है, जब उनके ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष सहभागिता, उकसावे या षड्यंत्र का आरोप हो, जो वर्तमान एफ़आईआर में नहीं है.

"इसलिए सबक सिखाने या नैतिक संदेश देने के उद्देश्य से की गई हिरासत निवारक शक्तियों का दुरुपयोग, अनुच्छेद 21 के तहत मिली व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन और असंवैधानिक पुलिस कार्रवाई है."

जानकारों का मानना है कि नाबालिग़ों से जुड़े मामलों में पुलिस के पास केवल दंडात्मक कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प नहीं होता. ऐसे मामलों में परामर्श और सुधारात्मक उपाय जैसे अन्य क़ानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.