बिहार: गलवान में जान गंवाने वाले सैनिक के परिजन का अंतहीन इंतज़ार- ग्राउंड रिपोर्ट
चंदन जजवाड़े
बीबीसी संवाददाता

भारत और चीन की सेना के बीच तीन साल पहले गलवान घाटी में जो हिंसक झड़प हुई थी उसमें भारत के बीस सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी.
इस झड़प में चीन को कितना नुक़सान हुआ इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं.
उस घटना के तीन साल पूरे होने पर हमने जानने की कोशिश की कि भारत के एक सैनिक परिवार की ज़िंदगी इस झड़प ने कैसे बदल दी?
बिहार की राजधानी पटना में गलवान संघर्ष में जान गंवाने वाले हवलदार सुनील कुमार के घर में पूजा की तैयारी चल रही है. मंगलवार 16 जून को उनकी तीसरी बरसी है. अगर वो आज जीवित होते तो महज़ 40 साल के होते.
ठीक तीन साल पहले 15 जून 2020 को गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई हिंसक झड़प में उनकी भी मौत हो गई थी.
उनके परिजन को आज तक ये पता नहीं कि उनकी मौत कैसे हुई थी. उनकी पत्नी को नौकरी और मुआवजा मिल चुका है लेकिन तब उनसे किए गए कुछ वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं.
इनमें से एक स्मारक बनाने का वादा है.
सुनील कुमार ‘16 बिहार रेजीमेंट’ में हवलदार के पद पर तैनात थे. सुनील कुमार साल 2002 में सेना में भर्ती हुए थे. गलवान में हुई झड़प के क़रीब एक साल पहले उनकी तैनाती पूर्वी लद्दाख के दुर्गम इलाक़े में हुई थी.
मोबाइल नेटवर्क की समस्या की वजह से वहां से घर पर बात करना आसान नहीं था.
तीन साल पहले उनके बच्चे इंतज़ार करते थे कि पिताजी कब नेटवर्क एरिया में आएंगे और फ़ोन करेंगे. पिछली बार क़रीब एक महीने पहले उन्होंने अपने पिताजी से बात की थी.

"गर्व होता है कि पिताजी को लोग याद करते हैं"
इस बार घर पर जब फ़ोन आया तब लाइन पर दूसरी तरफ उनके पिताजी नहीं थे.
15 जून को सुनील कुमार की पत्नी रीति देवी के पास ख़बर आई कि बिहार रेजीमेंट के एक सैनिक सुनील कुमार की चीनी सैनिकों के साथ झड़प में मौत हो गई है.
रीति देवी याद करती हैं, “हमने फ़ोन लगाया तो बताया गया कि उन्हीं की रेजिमेंट में एक और सुनील कुमार हैं. मेरे पति ठीक हैं. लेकिन सुबह हमारे पति के बड़े भाई ने फ़ोन किया तो उन्हें मेरे पति के शहीद होने की सूचना दी गई.”
चीन की सीमा पर जाने से पहले सुनील कुमार बिहार की राजधानी पटना की दानापुर छावनी में तैनात थे.
छावनी के पास ही उन्होंने अपना एक छोटा सा घर भी बनाया था ताकि बच्चों को शहर में रखकर उन्हें बेहतर शिक्षा दे सकें.
सुनील कुमार की बेटी सोनाली ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. सोनाली अपने 'पिता पर गर्व' करती हैं लेकिन हमेशा उनकी कमी को महसूस करती हैं.

वे कहती हैं, “अभी गर्मी की छुट्टियों में सारे बच्चे घूमने गए थे. हम कहीं नहीं गए. हमारे पापा नहीं रहे तो हमें कौन ले जाता? लेकिन गर्व होता है कि हमारे पिताजी ने जो कुछ किया है उससे सबलोग उनको याद करते हैं.”
सुनील कुमार के बड़े बेटे आयुष क़रीब 14 साल के हैं. मां को घर और बाहर दोनों जगह काम करते हुए देखते हैं तो उन्हें थोड़ी तकलीफ़ होती है.
आयुष कहते हैं, “घर में हमेशा एक कमी महसूस होती है. पिताजी जब भी आते थे तो एक महीने की छुट्टी लेकर आते थे. हमलोग मूवी देखने जाते थे. सैर-सपाटे के लिए भी जाते थे. अब वो सब नहीं हो पाता है.”
आयुष के छोटे भाई विराट अपनी मां का फ़ोन लेकर खेल रहे हैं. विराट अभी तीसरी क्लास में पढ़ते हैं. वो जब और कम उम्र के थे तो पिताजी से डरते थे.
विराट कहते हैं, “मां घर पर है तो उनका फ़ोन मिल गया है. दीदी और भैया अपना फ़ोन नहीं देते हैं. अगले हफ़्ते से स्कूल खुल जाएगा. फिर सुबह पांच बजे जगना होगा और फिर सारा समय पढ़ाई-लिखाई में निकलेगा.”

पत्नी को बिहार में सरकारी नौकरी मिली
सुनील कुमार की मौत के बाद उनके पुश्तैनी गांव तारापुर में नेताओं से लेकर आम लोगों की भीड़ जुटी हुई थी. तारापुर गांव पटना ज़िले के ही बिहटा इलाक़े में है.
सुनील कुमार का परिवार अब पटना शहर के अपने घर में बस गया है. गांव के उनके घर में बस उनकी एक तस्वीर रखी है और गांव की गलियों में उनकी यादें बिखरी पड़ी हैं.
रीति देवी को पटना में क्लर्क की सरकारी नौकरी मिल चुकी है. उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई की है. फ़िलहाल वो पटना में तैनात हैं.
रीति देवी को बिहार सरकार की तरफ से क़रीब 20 लाख़ रुपये की आर्थिक मदद भी मिली थी. अब वेतन और पति की पेंशन से बच्चों की ज़रूरतें पूरी कर लेती हैं.
सेना की तरफ से भी नियमों के तहत उन्हें सबकुछ मिल चुका है.
रीति देवी कहती हैं, “मैं हाउस वाइफ़ थी. कभी सोचा नहीं था कि नौकरी करूंगी. लेकिन समय ऐसा आ गया कि करना पड़ा. पति की पेंशन और अपनी नौकरी से बच्चों की परवरिश हो जाती है.”

स्मारक बनाने का वादा आज भी अधूरा
रीति देवी बताती हैं कि उनके पति (सुनील कुमार) की मौत के तुरंत बाद नेताओं की भीड़ उनके घर पर आती थी और वो कई वादे करके जाते थे, जो आजतक पूरे नहीं हुए.
रीति देवी कहती हैं, “उस समय कई लोग आते थे. गांव में पति का स्मारक बनाने का वादा कई नेताओं ने किया था. हम आज भी कोशिश करते हैं, लेकिन यह काम नहीं हुआ है.”
रीति देवी के मदद के लिए उनके भाई चंदन अक्सर उनके साथ होते हैं. अपनी नौकरी से समय निकालकर वो अपनी बड़ी बहन की मदद करते हैं. गांव में जीजाजी के नाम से स्मारक बनवाने के लिए वो आज भी नेताओं और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगा रहे हैं.
चंदन कुमार कहते हैं, “उस समय कई नेताओं ने वादा किया था कि स्मारक बनवा देंगे. बच्चों का दाख़िला अच्छे स्कूल में करा देंगे, लेकिन कुछ नहीं किया. सब भूल गए.”
चंदन किसी ख़ास व्यक्ति का नाम नहीं लेते हैं लेकिन उनका कहना है कि जब उनके जीजाजी की जान गई थी तो कई सामाजिक संगठनों के लोग और नेताओं ने बड़े-बड़े वादे किए थे लेकिन कोई दोबारा हाल जानने नहीं आया.

"डेथ सर्टिफ़िकेट पर कारण नहीं लिखा है"
भारत में पाकिस्तान से होने वाले हर तनाव पर बड़े-बड़े बयान आते हैं और उन्हीं से जुड़ी ख़बरें भी मीडिया की सुर्खियों में होती हैं. लेकिन चीन से जुड़े मामले में अमूमन ऐसा नहीं देखा जाता है.
सुनील कुमार के साले चंदन कहते हैं, “हमें आज तक नहीं पता चला कि हुआ क्या था. जीजाजी के डेथ सर्टिफ़िकेट पर तारीख़ 16 जून की लिखी हुई है, लेकिन इसका कोई कारण नहीं लिखा है.”
सुनील कुमार के घर में उनकी कई तस्वीरें हैं जो सेना में उनके सफ़र की निशानी हैं. लेकिन रिटायरमेंट की योजना बना रहे सुनील के साथ आख़िर क्या हुआ, इसके बारे में कुछ नहीं पता है.
सुनील कुमार के बचपन के दोस्त राजकुमार बताते हैं, “पाकिस्तान को लेकर तो बहुत कुछ सुनने को मिलता है. लेकिन यहां सुनील की पत्नी तक को शुरुआती जानकारी टीवी से मिली कि चीन सीमा पर गलवान में कुछ हुआ है.”
सुनील कुमार छुट्टियों में अपना लंबा वक़्त अपने गांव में भी बिताते थे. उनके मित्र अमर गुप्ता के मुताबिक़ सुनील हमेशा पूछता था कि रिटारमेंट के बाद क्या करूंगा.
सुनील के मित्र उन्हें सलाह देते थे कि जब रिटायर हो जाओगे, तब देखा जाएगा. लेकिन सुनील कुमार को इसका मौक़ा नहीं मिला.
अब उनके मित्र चाहते हैं कि चीन के साथ लड़कर जिस दोस्त ने जान दी है, उसका एक स्मारक गांव में ज़रूर बने.
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