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राहुल गांधी क्या अविश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में मौजूद होंगे?
- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 'मोदी सरनेम' केस में शुक्रवार को राहुल गांधी की सज़ा पर रोक लगा दी है.
2019 में राहुल गांधी ने 'मोदी सरनेम' को लेकर दिए एक बयान दिया था. जिसे लेकर बीजेपी विधायक पूर्णेश मोदी सूरत की निचली अदालत पहुंचे थे.
निचली अदालत ने राहुल गांधी को दो साल की सज़ा सुनाई थी. अदालत के इस फ़ैसले के 24 घंटे के बाद ही लोकसभा की उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई.
लोकसभा सचिवालय ने प्रतिनिधित्व अधिनियम का इस्तेमाल करते हुए नोटिस जारी कर राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द कर दी.
हालांकि फ़ैसले के ख़िलाफ़ राहुल गांधी गुजरात हाई कोर्ट गए लेकिन वहां भी उनकी सज़ा को बरकरार रखा गया.
हाईकोर्ट के बाद राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और शुक्रवार को सर्वोच्च अदालत ने इस पर अपना फ़ैसला सुनाया.
साथ ही कोर्ट ने राहुल गांधी को टिप्पणी करते समय सावधान रहने को भी कहा है.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर राहुल गांधी क्या बोले?
कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद राहुल गांधी ने साल 2019 में कर्नाटक के कोलार में एक राजनीतिक रैली के दौरान कथित तौर पर ये कहा था कि "सभी चोरों का सरनेम मोदी कैसे होता है?" पूरा विवाद यहीं से शुरू हुआ.
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद राहुल गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों सच्चाई की जीत होती है, मगर जो भी हो मेरा रास्ता तो साफ़ है. मुझे क्या करना है, मेरा क्या काम है? उसके बारे में मेरे दिमाग़ में बिल्कुल स्पष्टता है. जिन लोगों ने हमारी मदद की और जनता ने जो अपना प्यार और समर्थन दिया उसके लिए मैं बहुत बहुत धन्यवाद करता हूं."
वे बोले, "चाहे जो कुछ भी हो, मेरा फ़र्ज़ वही रहेगा... आइडिया ऑफ़ इंडिया की हिफ़ाज़त."
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत इस अपराध के लिए अधिकतम दो साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं."
"मानहानि के इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने अधिकतम सज़ा सुनाने के लिए वादी की दलीलों के अलावा और कोई वजह नहीं बताई."
"ये ध्यान देने वाली बात है इस दो साल की सज़ा के कारण ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(3) के प्रावधान लागू हुए और याचिकाकर्ता की सदस्यता रद्द हुई. अगर एक दिन भी ये सज़ा कम होती ये नियम लागू नहीं होता."
"ख़ासकर ऐसे मामलों में जब अपराध नॉन कम्पाउंडेबल हो, ज़मानती हो और संज्ञेय हो तो अधिकतम सज़ा देने के लिए ट्रायल जज से कारण बताने की उम्मीद की जाती है."
"हालांकि हाई कोर्ट ने अपील ख़ारिज करने की वजह बताने में काफ़ी पन्ने खर्च किए लेकिन इन पहलुओं पर ग़ौर किया गया हो, ऐसा लगता नहीं है."
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को लेकर ये भी कहा कि सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति को अपने सार्वजनिक भाषणों के वक़्त एहतियात बरतने की उम्मीद की जाती है.
सर्वोच्च न्यायालय ने ये भी कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(3) के लागू होने से न केवल याचिकाकर्ता के अधिकार प्रभावित होते हैं बल्कि उसके निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के अधिकार भी प्रभावित होते हैं. इसलिए इस बात को ध्यान में रखते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने अधिकतम सज़ा की कोई वजह नहीं बताई है, राहुल गांधी की सज़ा पर रोक लगाई जा रही है.
'... तो बीजेपी की इतनी किरकिरी नहीं होती'
वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, "महात्मा गांधी का कहना था कि कभी कभी हम अपने विरोधियों के कारण आगे बढ़ते हैं. 'मोदी सरनेम' को लेकर राहुल गांधी पर सुप्रीम कोर्ट के आए फ़ैसले में भी कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है."
वे कहते हैं, "राहुल गांधी के बारे में मुझे लगता है कि महात्मा गांधी का उक्त कथन सच साबित हो रहा है क्योंकि जिस तरह से बीजेपी उन पर आरोप लगाती है. हर चीज़ में उनकी नुक्ताचीनी होती है, उससे धीरे धीरे राहुल गांधी का कद आगे बढ़ रहा है और मजबूत हो रहा है."
वे कहते हैं, "इस मामले में कह सकते हैं कि बीजेपी ने राजनीतिक रूप से जल्दबाज़ी दिखाई. पृष्ठभूमि भले ही बीजेपी की थी लेकिन वो इस मामले में कोई दावेदार नहीं थी. साथ ही यह मामला अदालत में चल रहा था. जहां सेशन कोर्ट ने राहुल गांधी को अधिकतम दो साल क़ैद की सज़ा सुनाई और हाई कोर्ट ने उसके फ़ैसले को बरकरार रखा."
राशिद किदवई बताते हैं, "अदालत ने जो फ़ैसला किया था उसके बारे में भी कहा जा रहा था कि वो कुछ ज़्यादा सख़्त है."
वे कहते हैं, "बीजेपी ने उस फ़ैसले को लेकर लगातार राहुल गांधी पर वार किए, तीखे प्रहार किए. अगर वो क़ानून के मामले को उसकी प्रक्रिया के लिए छोड़ देते तो उनकी इतनी किरकिरी नहीं होती."
क्या राहुल गांधी की सदन में वापसी होगी?
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद यह कयास लगाया जा रहा है कि मानसून सत्र के दौरान ही राहुल गांधी की सदन में वापसी होगी साथ ही अविश्वास प्रस्ताव के दौरान उनके संवाद का सभी को इंतज़ार होगा.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि अब वो आठ से दस तारीख़ को मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष के लाए गए अविश्वास प्रस्ताव की बहस में शामिल हो सकते हैं.
लेकिन क़ानून के जानकार और बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में ऐसा कुछ बोला नहीं गया कि उनकी लोकसभा सदस्यता का क्या होगा. पर जब सज़ा पर रोक लग जाती है तब वह व्यक्ति जिसे सज़ा सुनाई गई थी वह स्वतः ही दोबारा सदस्य बनने के योग्य हो जाता है. लेकिन वह तब तक सदस्य नहीं बनता जब तक कि लोकसभा सचिवालय इसकी अधिसूचना नहीं निकालता कि अब जबकि आपकी सज़ा पर रोक लग गई है तो आप वापस सदस्य बन कर आ जाएं."
वे कहते हैं, "कांग्रेस इस बाबत लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंची है. लेकिन इसकी कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है, लिहाजा यह तुरंत भी हो सकता है या फिर इसमें समय भी लग सकता है."
वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई भी यही दोहराते हैं.
वे कहते हैं, "सदन में राहुल गांधी की वापसी की तस्वीर अभी साफ़ नहीं है. राहुल गांधी को जिस तरह सदन से हटाया गया और उन्हें सरकारी घर से भी बाहर होना पड़ा उसे देखते हुए यह बिल्कुल साफ़ नहीं है कि उनकी तुरंत सदन में वापसी होगी. मुझे इसे लेकर संदेह है. यह मामला भी खिंचेगा और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है."
"बीजेपी 2024 की चुनावी राजनीति और नेतृत्व को लेकर आश्वस्त है. वो पब्लिक ओपिनियन, मीडिया, क़ानूनी विदों की बात मानने का काम नहीं करती है. राजनीति को देखने और समझने का नरेंद्र मोदी और अमित शाह का टेंपलेट बहुत अलग है. उन्होंने बड़े पदों पर जिस तरह के लोगों को बैठाया है वो भी यह दर्शाता है कि बीजेपी की राजनीतिक सोच बिल्कुल अलग है."
वे कहते हैं, "हो सकता है कि राहुल गांधी को अविश्वास प्रस्ताव में शामिल होने का मौक़ा न मिले. नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, विपक्ष के बारे में बहुत तीखी टिप्पणियां करते हैं. अविश्वास प्रस्ताव में वो विपक्ष को धराशाई करने की कोशिश करेंगे. इसमें राहुल गांधी अगर आ जाते हैं तो वो बीजेपी को थोड़ा नुकसान पहुंचाएगा. तो बीजेपी उनकी सदन में वापसी को लेकर टालमटोल कर सकती है."
'कांग्रेस के लिए दुधारी तलवार बन सकता है फ़ैसला'
क्या यह राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए बड़ी जीत है. इसके तात्कालिक और दूरगामी फ़ायदे क्या मिलेंगे?
इस पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, "निश्चित तौर पर यह कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए नैतिक और राजनैतिक जीत मिली है. लेकिन यह कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए दुधारी तलवार की तरह काम भी कर सकता है. कांग्रेस को यह गुमान हो सकता है कि 2024 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ राहुल गांधी एक बड़ा चेहरा बन सकते हैं. इससे 'इंडिया' के नाम से बनी विपक्ष की एकता खटाई में पड़ सकती है."
वे कहते हैं कि इसकी वजह यह है कि जब देश में कोई गठबंधन बनता है तो उसमें एक बड़ा दल प्रभावी सहयोगी होता है. इंडिया में अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार या एमके स्टालिन जैसे लोग भागीदारी चाहते हैं.
"उनका मानना है कि वो सब एकजुट होकर 2024 के चुनाव में बीजेपी को परास्त करने की कोशिश करें. अगर ऐसा माहौल बनता है कि कांग्रेस या कांग्रेस का चेहरा राहुल गांधी ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं या प्रधानमंत्री पद के प्रमुख उम्मीदवार होते हैं या एक ऐसा रुख़ देते हैं जिससे यह लगे कि 2024 का चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी है तो उससे विपक्ष की एकता बिखर जाएगी. इससे कांग्रेस को 2024 के चुनाव में और भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा."
क्या लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा होंगे?
2014 और 2019 के चुनावों में कांग्रेस क़रीब 208 सीटों पर बीजेपी के साथ सीधे मुक़ाबले में थी.
राशिद किदवई कहते हैं, "जिन 208 सीटों पर दोनों दलों के बीच सीधा मुक़ाबला था उसमें से 90 फ़ीसद के क़रीब पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा तब ही बन सकेंगे जब उन 208 सीटों में से 50 फ़ीसद पर कांग्रेस की जीत होगी. ऐसा होने पर कांग्रेस या राहुल गांधी का दावा मजबूत होगा."
"ऐसी स्थिति में वे 2024 में प्रधानमंत्री के पद के दावेदार के रूप में सामने आ सकते हैं. लेकिन इसका आकलन करना अभी संभव नहीं है. लिहाज़ा अभी से उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने से कांग्रेस को नुक़सान होगा. इतना ही नहीं इससे विपक्षी एकता भी बिखर जाएगी."
क्या आगामी चुनावों में जीत से दावेदारी मज़बूत होगी?
भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी के पीछे जनसैलाब दिखा था. उसके बाद से कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीते हैं.
इस साल चार राज्यों तेलंगाना, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं.
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस सत्ता में है और मध्य प्रदेश के वर्तमान विधानसभा में भी पहले उसी की सरकार थी. ऐसे में अगर इन राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के अनुकूल आए तब उस स्थिति में राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कितनी मज़बूत होगी?
इस पर राशिद किदवई कहते हैं, "आगामी विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन न केवल राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश बल्कि तेलंगाना में भी अच्छा हुआ तब ऐसा माना जाएगा कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का राजनीतिक ग्राफ़ बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है."
"वैसी स्थिति में यह संदेश जाएगा कि वो ऐसे राज्य भी जीत रही है जहां वो सत्ता में है और वहां भी जहां वो सत्ता में नहीं थी. लेकिन नतीजा अगर कुछ राज्य में अनुकूल और कुछ में प्रतिकूल यानी मिश्रित रहा तो कांग्रेस और राहुल गांधी का उत्साह उस तरह नहीं होगा इसलिए कांग्रेस को फूंक फूंक कर क़दम रखने हैं."
वहीं लोकसभा चुनाव और प्रधानमंत्री पद पर कांग्रेस की दावेदारी को लेकर राशिद किदवई कहते हैं, "देश में ऐसी क़रीब पचास लोकसभा सीटें हैं जहां बीजेपी तीन लाख या उससे अधिक वोटों के बड़े अंतर से जीती है. ये अमूमन वैसी सीटें थीं जहां बीजेपी और कांग्रेस आमने सामने थीं, तो कांग्रेस को इसका संज्ञान लेना होगा."
"अभी ये लड़ाई कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल है. उसे बग़ैर प्रधानमंत्री पद का दावा किए, अभी इकट्ठा होकर चुनाव लड़ना होगा. जब 2024 में चुनाव के नतीजे आ जाएं और पता चले कि अगर वो सवा सौ या डेढ़ सौ सीटें ले आई तब प्रधानमंत्री पद के लिए उसकी दावेदारी बहुत मज़बूत होगी."
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "अगर इंडिया गठबंधन चार सौ सीटों पर बीजेपी के साथ सीधा मुक़ाबला बनाने में कामयाब हुई तो यह बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं."
वे कहते हैं, "पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब जैसे राज्यों में इंडिया गठबंधन के दलों के बीच ही सीधी टक्कर होती रही है. तो अगर 400 सीटों पर यह बीजेपी के साथ सीधी टक्कर बनाने में कामयाब हुए तो भारतीय जनता पार्टी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव की लड़ाई बहुत मुश्किल हो जाएगी."
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