थर्ड वर्ल्ड क्या है, क्या भारत भी इसमें शामिल है? जानिए अहम सवालों के जवाब

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वॉशिंगटन डीसी में बुधवार को व्हाइट हाउस के नज़दीक हुए हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह थर्ड वर्ल्ड यानी तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों को अमेरिका आने पर स्थायी रूप से रोक लगा देंगे.
हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ये नही बताया है कि “थर्ड वर्ल्ड” में कौन से देश शामिल हैं या उनकी ये घोषणा किन देशों पर लागू होगी.
ऐसे में सवाल उठता है कि थर्ड वर्ल्ड क्या है और इसमें कौन से देश शामिल हैं? क्या भारत में भी इसमें शामिल है?
थर्ड वर्ल्ड क्या है?

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‘थर्ड वर्ल्ड’ की कोई स्पष्ट भौगोलिक या शाब्दिक परिभाषा नहीं है. यह टर्म आमतौर पर ग़रीब और पिछड़े देशों के लिए इस्तेमाल किया जाता था.
बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से में ये शब्द ख़ासतौर पर प्रचलित हुआ, जब दुनिया के कई देश यूरोप के उपनिवेश से आज़ाद हो रहे थे.
तीसरी दुनिया टर्म उन राष्ट्रों के लिए इस्तेमाल हुआ जो वैश्विक औद्योगीकृत देशों को जोड़ने वाले आर्थिक और राजनीतिक संबंधों से बाहर थे. इनमें से कई यूरोप के पूर्व उपनिवेश थे.
हालांकि मूल रूप से ‘थर्ड वर्ल्ड’ या ‘तीसरी दुनिया’ टर्म ऐसे देशों के लिए इस्तेमाल हुआ था जो शीत युद्ध के दौरान ना तो पश्चिमी पूंजीवादी धड़े का हिस्सा थे और ना ही सोवियत कम्युनिस्ट धड़े का.
एक तरफ़ अमेरिका के नेतृत्व वाली पहली दुनिया थी, दूसरी तरफ़ सोवियत संघ के नेतृत्व वाली दूसरी दुनिया और एक तीसरी दुनिया उभर रही थी जो इन दोनों के दायरे से बाहर थी.
हालांकि, आगे चलकर थर्ड वर्ल्ड ऐसे देशों के लिए इस्तेमाल किया गया जो ग़रीब, विकास में पिछड़े या फिर विकासशील हो.
कहाँ से आया यह टर्म?

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सबसे पहले फ़्रांसीसी डेमोग्राफ़र अल्फ़्रेड सॉवी ने 1952 में ‘थर्ड वर्ल्ड’ टर्म इस्तेमाल किया था.
एक लेख में उन्होंने लिखा था, “ये थर्ड वर्ल्ड, नज़रअंदाज़ की हुई, तिरस्कृत, शोषित, तीसरे एस्टेट की भांति- भी कुछ बनना चाहती है.”
डेमोग्राफ़र और अर्थशास्त्री अल्फ़्रेड सॉवी ने पहली बार ‘थर्ड वर्ल्ड’ टर्म का इस्तेमाल करते हुए तीसरे एस्टेट (किसान, मज़दूर, सामान्य जनता) का संदर्भ दिया जो पहले एस्टेट- पादरियों और दूसरे एस्टेट कुलीनों द्वारा शोषित और वंचित थी.
एक तरह से उन्होंने शोषित और वंचित देशों के लिए ‘थर्ड वर्ल्ड’ टर्म का इस्तेमाल किया था.
ऐसे देश जो शोषित और वंचित तो थे लेकिन आगे बढ़ना चाहते थे.
हालांकि आज के दौर में ‘थर्ड वर्ल्ड’ देशों को लेकर परिभाषा और समझ बदली है. वर्तमान में राजनीतिक और आर्थिक संदर्भों में थर्ड वर्ल्ड शब्द का कम ही इस्तेमाल किया जाता है.
अब ऐसे देशों के संदर्भ के लिए ‘ग्लोबल साउथ’ या ‘विकाशील देश’ या ‘निम्न एवं मध्यम आय वाले देश ’ जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल किया जाता है.
अपमानजनक संबोधन?

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वर्तमान में किसी देश के लिए थर्ड वर्ल्ड शब्द के इस्तेमाल को अपमानजनक माना जाता है.
साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था, “थर्ड वर्ल्ड टर्म पुराना पड़ चुका है और अपमानजनक है. अब हम विकासशील देशों या ग्लोबल साउथ की बात करते हैं.”
आमतौर पर इसमें उन देशों को शामिल किया जाता है, जिनका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कम है, ग़रीबी की दर अधिक है, औद्योगिक ढांचा कमज़ोर है और जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है या जिनकी अर्थव्यवस्था प्राथमिक उत्पादों जैसे- कच्चा माल, कृषि उत्पाद, खनिजों के निर्यात पर केंद्रित हो.
हालांकि विशेषज्ञ थर्ड वर्ल्ड को आर्थिक के बजाय राजनीतिक अवधारणा भी मानते रहे हैं.
अमेरिकी समाजशास्त्री, लेखक और प्रोफ़ेसर इर्विन लुई हॉरोविट्ज़ ने अपनी किताब थ्री वर्ड्स ऑफ़ डेवलपमेंटः द थियरी एंड प्रैक्टिस ऑफ़ इंटरनेशनल स्ट्रेटिफ़िकेशन में लिखा था, “थर्ड वर्ल्ड एक राजनीतिक अवधारणा है ना कि आर्थिक…ये उन देशों को संदर्भित करती है जो शीत युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष रहे.”
वहीं 1970 के दशक में वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री हॉलिस चेनेरी ने लिखा था, “‘तीसरी दुनिया’ टर्म अपनी उपयोगिता खो चुका है… यह दक्षिण कोरिया जैसे उन्नत देशों को सोमालिया जैसे विफल राज्यों को एक साथ ला देता है.”
वर्तमान में तीसरी दुनिया टर्म

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आज के दौर में किसी देश के लिए थर्ड वर्ल्ड टर्म का इस्तेमाल करना अपमानजनक माना जाता है.
अब किसी देश को या तो ‘विकासशील’ कहा जाता है या फिर ‘फ़्रंटियर’.
विकासशील ऐसे राष्ट्र हैं जो लोगों का जीवनस्तर सुधारने के लिए बुनियादी ढांचे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार को मज़बूत करने के लिए तत्पर रहते हैं. वहीं फ्रंटियर ऐसे राष्ट्र हैं जो अभी इस प्रक्रिया की शुरुआत ही कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र कुछ राष्ट्रों को सबसे कम विकसित (पूर्व में चौथी दुनिया) भी कहता है.
ये ऐसे देश हैं जो वैश्विक आर्थिक प्रणालियों, टेक्नोलॉजी और राजनीति से अलग-थलग हैं.
दुनिया को आर्थिक-राजनीतिक आधार पर वर्गीकृत या विभाजित करने के लिए कई तरह के टर्म इस्तेमाल किए जाते रहे हैं.
जैसे फ़र्स्ट वर्ल्ड उन देशों के लिए इस्तेमाल होता रहा है जो आर्थिक रूप से मज़बूत हैं.
फ़र्स्ट वर्ल्ड में आमतौर पर उन पूंजीवादी देशों को शामिल किया जाता है जो अत्याधिक औद्योगिक हैं. हालांकि अब ये शब्द भी पुराना पड़ गया है लेकिन अगर आज फ़र्स्ट वर्ल्ड देशों की सूचि बनाई जाए तो उसमें जापान, उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देश आ सकते हैं.
इसमें कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों और एशियाई देशों को भी शामिल किया जा सकता है.
ऐसे में, वर्तमान संदर्भ में थर्ड वर्ल्ड देश कौन हो सकते हैं?
तीसरी दुनिया अब अप्रचलित और अपमानजनक अवधारणा है. लेकिन मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में देखा जाए तो इसमें निम्न आय वर्ग या सबसे कम विकसित देशों को शामिल किया जा सकता है.
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र की सबसे कम विकसित देशों की सूची में 44 देश शामिल हैं. इनमें से 32 देश अफ़्रीका के हैं.
अफ्रीका देश (32)
अंगोला, बेनिन, बुर्किना फासो, बुरुंडी, केंद्रीय अफ्रीकी गणराज्य, चाड, कोमोरोस, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, जिबूती, इरिट्रिया, इथियोपिया, गाम्बिया, गिनी, गिनी-बिसाऊ, लेसोथो, लाइबेरिया, मेडागास्कर, मलावी, माली, मॉरीतानिया, मोजाम्बिक, नाइजर, रवांडा, सेनेगल, सिएरा लियोन, सोमालिया, दक्षिण सूडान, सूडान, टोगो, युगांडा, तंज़ानिया, ज़ाम्बिया।
एशिया (8):
अफगानिस्तान, बांग्लादेश, कंबोडिया, लाओ पीडीआर, म्यांमार, नेपाल, तिमोर-लेस्ते, यमन.
कैरिबियन(1)
हैती
प्रशांत (3)
किरिबाती, सोलोमन द्वीप, तुवालू
क्या भारत थर्ड वर्ल्ड में है?
भारत उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और दुनिया के निम्न आय देशों में शामिल नहीं है. हालांकि अगर थर्ड वर्ल्ड के ऐतिहासिक संदर्भ को देखा जाए तो भारत गुट-निरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा था और उस लिहाज से थर्ड वर्ल्ड में शामिल था.
लेकिन मौजूदा आर्थिक संदर्भ में भारत इस सूची में नहीं हैं और भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं. भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ़ बढ़ रहा है. हालांकि भारत में आर्थिक विषमता भयावह है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












