भारतीय टैलेंट को अमेरिका से वापस बुलाना इतना मुश्किल क्यों?

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- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक एच-1बी वीज़ा की फ़ीस कई गुना बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दी.
कहा जा रहा है कि भारत के पॉलिसी मेकर अब काबिल भारतीयों को वापस अपने देश बुलाने की कोशिश में लग गए हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी एक अफसर ने हाल ही में कहा है कि सरकार विदेशों में काम कर रहे भारतीयों को वापस आने और देश के विकास में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.
वहीं, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य ने एक मीडिया कार्यक्रम में कहा कि एच-1बी वीज़ा हमेशा से मेजबान देश के हितों को ही पूरा करता आया है. इसलिए, वीज़ा फ़ीस में यह बढ़ोतरी भारत के लिए अच्छी साबित होगी, क्योंकि इससे भारत की वैश्विक प्रतिभा को अपनी ओर खींचने की क्षमता बढ़ेगी.
इन सब बातों का सार यह है कि अब भारत के पास "रिवर्स ब्रेन ड्रेन" यानी विदेशों में बसे प्रतिभाशाली भारतीयों को वापस लाकर अपने देश में काम करने का माहौल बनाने का अच्छा अवसर है.
ख़ासकर टेक्नोलॉजी, चिकित्सा और इनोवेशन से जुड़ी इंडस्ट्रीज़ में.
हालांकि कुछ उदाहरण बताते हैं कि अमेरिका में सख़्त होती इमिग्रेशन नीतियों के कारण कुछ भारतीय अब वाकई वापस आने पर विचार कर रहे हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हज़ारों लोगों को अमेरिका छोड़कर बेंगलुरु (भारत) लौटने के लिए मनाना आसान नहीं होगा.
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10 लाख डॉलर की नौकरी छोड़ी

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नितिन हसन उन कुछ भारतीयों में से एक हैं जो पिछले 20 साल से अमेरिका में बसे हुए थे, लेकिन उन्होंने बड़ा क़दम उठाते हुए पिछले साल भारत लौटने का फै़सला किया.
उनके लिए यह फै़सला लेना आसान नहीं था. उन्होंने मेटा में अपनी करोड़ों की नौकरी छोड़ दी ताकि स्टार्टअप की अनिश्चित दुनिया में क़दम रख सकें.
हसन ने बीबीसी से कहा, "मैं हमेशा से कुछ अपना शुरू करना चाहता था, लेकिन अमेरिका में मेरी इमिग्रेशन स्थिति ने उस आज़ादी को सीमित कर दिया था."
भारत लौटने के बाद, हसन ने दो स्टार्टअप शुरू किए हैं, जिनमें से एक है बी2आई (बैक टू इंडिया). यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो अमेरिका में बसे भारतीयों को वापस लौटने की भावनात्मक, आर्थिक और पेशेवर चुनौतियों से निपटने में मदद करता है.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि हाल के महीनों में अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियों में आए बदलावों के चलते भारत लौटने की इच्छा रखने वालों की पूछताछ में तेज़ी आई है, और एच-1बी वीज़ा विवाद ने इसे और बढ़ा दिया है.
हसन ने कहा, "अब कई पेशेवर मान चुके हैं कि उन्हें ग्रीन कार्ड शायद कभी नहीं मिलेगा, और ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से बी2आई पर आने वाली पूछताछ लगभग तीन गुना बढ़ गई है. सिर्फ़ पिछले छह महीनों में ही दो सौ से ज़्यादा एनआरआई (नॉन-रेजिडेंट इंडियन) भारत वापसी के विकल्पों पर चर्चा के लिए हमसे जुड़ चुके हैं."

अमेरिकी विश्वविद्यालयों से भारतीय प्रतिभा की तलाश करने वाली अन्य कंपनियां भी इस बदलते रुझान की पुष्टि करती हैं.
बीडीओ एक्जीक्यूटिव सर्च की सीईओ शिवानी देसाई ने बीबीसी को बताया, "इस सीज़न में आइवी लीग विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 30 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है."
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे माहौल के कारण अमेरिका में काम कर रहे वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों को अब अपने लंबे करियर को लेकर "गंभीरता से सोचने" पर मजबूर होना पड़ रहा है.
देसाई ने कहा, "हालांकि उनमें से कई अब भी वहीं टिके हुए हैं, लेकिन हम देख रहे हैं कि शीर्ष पदों पर बैठे ऐसे अधिकारियों और सीनियर टेक लीडर्स की संख्या बढ़ रही है जो भारत को एक गंभीर विकल्प के रूप में देख रहे हैं."
उनके रवैये में यह बदलाव भारत में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़े ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) यानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में रिमोट ऑफ़िस के कारण भी हो सकता है. ये कंपनियां लौटने वाले भारतीयों के लिए बेहतर काम के मौके दे रही हैं.
एसेट मैनेजमेंट कंपनी फ्रैंकलिन टेम्पलटन के मुताबिक़, अगर अमेरिका टेक प्रोफेशनल्स के लिए अपने दरवाज़े बंद करता है, तो ये लोग ऑफशोर ऑपरेशन्स की ओर रुख़ कर सकते हैं. ऐसे में जीसीसी प्रतिभाओं के लिए और भी आकर्षक बनते जा रहे हैं, खास तौर पर तब जब ऑनसाइट अवसर लगातार घट रहे हैं.
सरकार को क्या करने की ज़रूरत?

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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार और पुस्तक 'सेसेशन ऑफ़ द सक्सेसफुल: द फ़्लाइट आउट ऑफ़ न्यू इंडिया' के लेखक संजय बारू ने भी इस मुद्दे पर बात की है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन यानी प्रतिभाशाली भारतीयों को वापस लाने के लिए सरकार की ओर से संगठित और गंभीर प्रयास की ज़रूरत होगी, और वर्तमान में यह कमी है."
बारू ने कहा, "सरकार जिन्हें वापस लाना चाहती है इसके लिए सरकार को सक्रिय रूप से उन व्यक्तियों की पहचान करनी होगी, जिनमें टॉप लेवल के वैज्ञानिक, पेशेवर और उद्यमी शामिल हैं. इसके लिए गंभीर प्रयास की ज़रूरत है और यह पहल सीधे टॉप लेवल से आनी चाहिए."

उन्होंने कहा कि यही काम भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था, ताकि अंतरिक्ष और न्यूक्लियर तकनीक जैसे क्षेत्रों में टॉप माइंड्स को वापस लाकर भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थान बनाए जा सकें.
बारू ने कहा, "उनमें उद्देश्य और राष्ट्रभक्ति की गहरी भावना थी. अब वापस आने के लिए प्रोत्साहन कहां है?."
उन्होंने कहा कि इसके उलट, देश में हमेशा से कुछ ऐसे कारण रहे हैं जो हुनरमंद पेशेवरों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं और भारत ने इस चलन को रोकने के बजाय हमेशा जश्न 'मनाया' है.
पुल फैक्टर्स में उन देशों की बढ़ती संख्या शामिल है, जो गोल्डन वीज़ा, नागरिकता या इमिग्रेशन प्रोग्राम के माध्यम से रेज़िडेंसी ऑफर कर रहे हैं.
असल में, जब अमेरिका ने अपने एच1बी वीज़ा नियमों को कड़ा किया, तभी जर्मनी जैसे देशों ने तुरंत कुशल भारतीय प्रवासियों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए.
भारतीय देश छोड़कर क्यों जा रहे हैं?

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पुश फैक्टर पुरानी और बड़ी समस्या रही है, जैसे कि ख़राब सरकारी नियम-क़ानून, थकाने वाली नौकरशाही, और ख़राब व्यापारिक माहौल. ऐसे ही कुछ कारणों से पिछले कई सालों से अमीर और ज़्यादा कमाने वाले भारतीय देश छोड़कर जा रहे हैं.
सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि 2020 के बाद से पांच लाख से ज़्यादा भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी है. इसके अलावा, भारत उन शीर्ष पांच देशों में शामिल है जहां करोड़पतियों का पलायन हो रहा है और वह अन्य देशों की नागरिकता या रेज़िडेंसी ले रहे हैं.
हसन कहते हैं कि अगर सरकार सच में विदेशों में बसे भारतीयों को वापस लाने के लिए गंभीर है, तो उन्हें "कई बाधाओं को एक साथ दूर करने" की दिशा में काम करना होगा.
इसमें टैक्स को लेकर आसान क़ानून, स्पेशल स्टार्टअप वीज़ा जैसी योजनाएं और अन्य मौलिक समस्याओं का समाधान शामिल है, जैसे बुनियादी सुविधाओं की कमी और शहरी भीड़भाड़.
बारू कहते हैं कि इसके लिए हमें रिसर्च और अच्छी शिक्षा जैसी चीज़ों को अपने देश में बहुत बेहतर बनाना होगा. क्योंकि यही कारण है कि पिछले पचास सालों में अमेरिका भारतीय प्रतिभाओं के लिए इतना आकर्षक रहा है.
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