आईएमएफ़ से मिला बड़ा क़र्ज़ पाकिस्तान में लोगों की ज़िंदगी आसान बना पाएगा?

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- Author, तनवीर मलिक
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी उर्दू
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड ने पाकिस्तान के लिए सात अरब डॉलर के क़र्ज़ प्रोग्राम की मंज़ूरी दे दी है.
इस क़र्ज़ प्रोग्राम के लिए पाकिस्तान और आईएमएफ़ के बीच इस साल जुलाई में स्टाफ़ लेवल समझौता हुआ था.
इस मंज़ूरी के बाद पाकिस्तान को जल्द ही 1.1 अरब डॉलर की पहली क़िस्त आईएमएफ़ से मिल जाएगी. बाक़ी लगभग 5.9 अरब डॉलर अगले तीन साल में पाकिस्तान को कई क़िस्तों में दिए जाएंगे.
पाकिस्तान ने आईएमएफ़ से ढाई करोड़ डॉलर का पहला क़र्ज़ दिसंबर 1958 में लिया था और उसके बाद से अब तक पाकिस्तान 20 बार से ज़्यादा आईएमएफ़ से क़र्ज़ ले चुका है.
पाकिस्तान आईएमएफ़ से क़र्ज़ लेने वाला पांचवां बड़ा देश है.

आईएमएफ़ ने क्या कहा
आईएमएफ़ की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालीना जॉर्जिया ने एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड के बैठक के बाद निजी टीवी चैनल ‘जियो’ से कहा, “हमारे पास एक ख़ुशख़बरी है. हमने पाकिस्तान के लिए अपना ‘रिव्यू’ पूरा कर लिया है. मैं पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तान की जनता को बधाई देती हूं. पाकिस्तान ने आर्थिक सुधार किए हैं जिससे अर्थव्यवस्था में बेहतरी आई है.''
आईएमएफ़ की प्रमुख का कहना था, ''पाकिस्तान में अब उत्पादन का ग्राफ़ ऊपर की ओर जा रहा है जबकि महंगाई नीचे आ रही है. अर्थव्यवस्था मज़बूती के रास्ते पर है.''
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने क़र्ज़ प्रोग्राम की मंज़ूरी पर ‘संतोष’ व्यक्त करते हुए कहा, “अल्लाह के फ़्ज़्ल से आर्थिक सुधार तेज़ी से जारी है.”
उन्होंने आईएमएफ़ पैकेज के लिए मदद देने वाले मित्र देशों विशेष तौर पर सऊदी अरब, चीन और संयुक्त अरब अमीरात का भी शुक्रिया अदा किया.
स्टाफ़ लेवल समझौते से पहले पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ओर से जारी की गई शर्तों को पूरा करने की कोशिश की थी.
इसके तहत इस वित्तीय वर्ष में टैक्स आमदनी बढ़ाने, कई क्षेत्रों में टैक्स की दर बढ़ाने और नए क्षेत्रों को टैक्स नेटवर्क में लाने जैसे उपाय शामिल थे.
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार- आईएमएफ़ प्रोग्राम की मंज़ूरी से पहले पाकिस्तान को जिन कड़ी शर्तों को मानना पड़ा उसकी वजह से एक आम आदमी की ज़िंदगी बिजली और गैस की क़ीमत बढ़ने और टैक्सों में इज़ाफ़े से मुश्किलों का शिकार हुई.
लेकिन अहम सवाल यह है कि सात अरब डॉलर का यह क़र्ज़ पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए क्या महत्व रखता है और इस क़र्ज़ से क्या एक आम पाकिस्तानी की ज़िंदगी आसान हो पाएगी?

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क़र्ज़ की मंज़ूरी का पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
वित्तीय विशेषज्ञ आईएमएफ़ की ओर से पाकिस्तान के लिए नए क़र्ज़ प्रोग्राम की मंज़ूरी से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को ‘सकारात्मक’ बताते हैं.
पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पिछले ढाई तीन सालों में नकारात्मक विकास दर का शिकार रही है जबकि देश के विदेशी मुद्रा कोष में कमी आई है.
डॉलर की कीमत में बेतहाशा इज़ाफ़े, महंगाई की दर में ऐतिहासिक वृद्धि और ब्याज की दर में इज़ाफ़े की वजह से भी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था समस्याओं का शिकार रही है.
इसी तरह आर्थिक गतिविधियों के सुस्ती का शिकार होने के साथ-साथ औद्योगिक इकाइयों के उत्पादन क्षमता में कमी आने से देश में बेरोज़गारी की दर बढ़ी है.
इस प्रोग्राम की मंज़ूरी के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अपने बयान में कहा, “पाकिस्तान की आर्थिक मज़बूती के बाद आर्थिक विकास के लक्ष्यों को पाने के लिए इसी तरह मेहनत जारी रखेंगे. पाकिस्तान में कारोबारी गतिविधियों और पूंजी निवेश में वृद्धि अच्छी बात है और वित्तीय टीम की मेहनत का जीता जागता उदाहरण है.”
उनका कहना था कि अगर इसी तरह मेहनत जारी रही तो “इंशाल्लाह यह पाकिस्तान का आख़िरी आईएमएफ़ प्रोग्राम होगा.”
वित्त मंत्रालय के पूर्व सलाहकार और विशेषज्ञ डॉक्टर ख़ाक़ान नजीब ने बीबीसी उर्दू से कहा, “इस प्रोग्राम की मंज़ूरी से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में मज़बूती आएगी. पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक स्थिति में 26 अरब डॉलर की जो विदेशी फ़ाइनेंसिंग की ज़रूरत है उसमें भी मदद मिलेगी.”
उन्होंने कहा कि इसके साथ-साथ “यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए गुंजाइश पैदा करेगा कि हम अपनी ढांचागत समस्याओं को हल कर सकें जो देश की अर्थव्यवस्था के सामने हैं.”
वित्तीय मामलों की विशेषज्ञ सना तौफ़ीक़ ने कहा, “इस प्रोग्राम की मंज़ूरी के तुरंत बाद सबसे पहले मार्केट में सकारात्मक रुझान जन्म लेंगे जो पिछले काफी समय से ग़ायब थे.”
उन्होंने कहा कि आईएमएफ़ की तरफ़ से पैसे मिलने के बाद पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा कोष में वृद्धि होगी और स्टेट बैंक के अनुसार मार्च 2025 तक 11 अरब डॉलर और जून 2025 तक तेरह अरब डॉलर तक विदेशी मुद्रा जमा हो जाएगी.
सना तौफ़ीक़ के अनुसार इस प्रोग्राम की मंज़ूरी के बाद पैसे आने से सबसे पहले पाकिस्तान के विदेशी भुगतान के क्षेत्र पर दबाव कम होगा और देश के पास पूंजी की वजह से आंतरिक तौर पर स्थानीय बैंकों से क़र्ज़ लेने में थोड़ी राहत मिलेगी.
उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम की बाक़ी क़िस्तों के लिए शर्तों में कुछ ज़्यादा सख़्ती की संभावना नहीं है क्योंकि कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल के दौरान बहुत सारी शर्तें पूरी की जा चुकी हैं और अब इसकी संभावना कम है कि अगली क़िस्तों के लिए बहुत सख़्त शर्त लगाई जाए.

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एक आम पाकिस्तान को इससे क्या फ़ायदा होगा?
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि एक आम पाकिस्तानी माइक्रोइकोनॉमिक मज़बूती और विदेशी मुद्रा कोष के बढ़ने पर ख़ुश होने से ज़्यादा महंगाई और रोज़गार के कम मौक़े होने की वजह से परेशान है.
पिछले साल मई में देश में महंगाई की दर 38 फ़ीसद की सबसे ऊपरी सतह पर पहुंच गई थी लेकिन इसके बाद महंगाई बढ़ने की रफ़्तार में लगातार कमी आई है. इस साल अगस्त के महीने के सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब देश में महंगाई 9 फ़ीसद की दर से बढ़ रही है.
आईएमएफ़ प्रोग्राम की मंजूरी के बाद एक आम आदमी को मिलने वाली राहत के बारे में सना तौफ़ीक़ ने कहा, “इस प्रोग्राम की मंज़ूरी से एक आम आदमी को सीधे तो कोई फ़ायदा नहीं होगा और न ही तुरंत कुछ ऐसा होगा कि खाने-पीने के सामान की क़ीमत कम हो जाएगी."
"अगर सरकार की आर्थिक नीतियां ऐसी ही चलती रहीं और अर्थव्यवस्था सुस्ती से ही सही मगर आगे की तरफ़ बढ़े तो भविष्य में निश्चित रूप से इसका फ़ायदा आम आदमी को भी हो सकता है.”
उन्होंने कहा कि देश में पहले ही डॉलर और रुपए के मूल्य में स्थिरता है और आईएमएफ़ प्रोग्राम की मंज़ूरी के बाद इस बात की संभावना नहीं है कि डॉलर की क़ीमत में बहुत ज़्यादा कमी आएगी.
उन्होंने कहा, “विदेशों से मंगवाए जाने वाले सामान जैसे कि तेल, खाद्य तेल और दूसरी ज़रूरत की चीज़ों की क़ीमत में कमी की संभावना भी नहीं.”
सना तौफ़ीक़ का कहना है कि बेरोज़गारी से निपटने के लिए पाकिस्तान को आयात की अनुमति देनी पड़ेगी ताकि उद्योग का पहिया चल सके और आम लोगों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा हो सकें.
उन्होंने कहा कि रुपए का मूल्य मज़बूत होने से केंद्रीय बैंक और मुद्रा के मोर्चे पर मदद मिलेगी. इससे ब्याज की दर में कमी आ सकती है जो कारोबार को चलाने के लिए लाभकारी होगी और लोगों के लिए रोज़गार मुहैया करा सकती है.
लेकिन डॉक्टर ख़ाक़ान नजीब कहते हैं कि किसी भी देश में आने वाली आर्थिक मज़बूती का असर सीधे एक आम आदमी पर भी पड़ता है.
उन्होंने कहा, “यह आर्थिक मज़बूती ही है कि जो मुद्रास्फीति की दर 38 फ़ीसद तक चली गई थी वह अब 9.6 फ़ीसद तक आ गई है.”
उनके अनुसार- अब उम्मीद है कि इस साल आम आदमी की क्रय शक्ति बेहतर होगी और क़ीमतों के बढ़ने की दर में काफ़ी कमी आएगी.
उनके अनुसार रुपए के मूल्य में सुधार से आयाती मुद्रास्फीति में कमी आएगी. इसकी झलक पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स की क़ीमतों में स्पष्ट कमी से मिलती है.
उन्होंने कहा कि इसके अलावा ब्याज की दर में कमी की गुंजाइश पैदा हुई है जिसके कारण केंद्रीय बैंक ने इसे 17.5 फ़ीसद तक कर दिया है.
डॉक्टर नजीब कहते हैं, “अब भी इसमें कमी की गुंजाइश है जिससे औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और पूंजी निवेश और आम आदमी के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.”

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पाकिस्तान कब-कब आईएमएफ़ के पास गया?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की वेबसाइट पर मिलने वाली जानकारी के अनुसार- आईएमएफ़ के साथ पाकिस्तान के अभी तक 23 प्रोग्राम हुए हैं और पहला प्रोग्राम दिसंबर 1958 में तय हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान को ढाई करोड़ डॉलर देने का समझौता हुआ था.
इसके बाद आईएमएफ़ के प्रोग्राम का सिलसिला बढ़ता चला गया. सात अरब डॉलर के मौजूदा क़र्ज़ से पहले आख़िरी बार आईएमएफ़ बोर्ड ने अगस्त 2022 में एक्सटेंडेड फ़ंड फ़ैसिलिटी के सातवें और आठवें रिव्यू के तहत पाकिस्तान को 1.1 अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया था.
एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड ने जुलाई 2019 में पाकिस्तान के लिए छह अरब डॉलर क़र्ज़ की मंज़ूरी दी थी.
आईएमएफ़ प्रोग्राम के इतिहास के अनुसार-
अय्यूब ख़ान के दौर में पाकिस्तान के आईएमएफ़ से तीन प्रोग्राम हुए.
ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के नेतृत्व में बनी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की पहली सरकार के दौर में पाकिस्तान के आईएमएफ़ से चार प्रोग्राम हुए.
जनरल ज़ियाउल हक़ के दौर में पाकिस्तान आईएमएफ़ के दो प्रोग्रामों में शामिल हुआ.
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की दूसरी सरकार में बेनज़ीर भुट्टो के प्रधानमंत्री रहने के दौर में पाकिस्तान आईएमएफ़ के दो प्रोग्रामों में रहा था.
पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पहली सरकार में एक आईएमएफ़ प्रोग्राम में पाकिस्तान शामिल हुआ.
बेनज़ीर भुट्टो जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं तो पाकिस्तान आईएमएफ़ के तीन प्रोग्रामों में शामिल हुआ.
इसी तरह जब नवाज़ शरीफ़ दोबारा प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान दो आईएमएफ़ प्रोग्रामों में शामिल हुआ.
परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में दो आईएमएफ़ प्रोग्राम हुए. साल 2008 से 2013 के बीच पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार में एक प्रोग्राम हुआ.
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की 2013 से 2018 की सरकार के दौरान भी आईएमएफ़ के साथ पाकिस्तान का एक प्रोग्राम हुआ.
इसी तरह पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के दौर में एक आईएमएफ़ प्रोग्राम में पाकिस्तान शामिल हुआ. इस प्रोग्राम को पीटीआई की सरकार जाने के बाद नवाज़ लीग के नेतृत्व वाली मिली जुली सरकार ने जारी रखा.
मुस्लिम लीग नवाज़ के मौजूदा शासन काल में यह पहला क़र्ज़ प्रोग्राम है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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