भारतीय महिला हॉकी की नई सनसनी हैं दीपिका, चीन के ख़िलाफ़ फ़ाइनल में किसका पलड़ा भारी?

    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत के लिए एशियन चैंपियंस ट्रॉफी महिला हॉकी में सबसे ज़्यादा गोल जमाने वाली दीपिका सेमीफ़ाइनल में जापान के ख़िलाफ़ कोई गोल नहीं कर पाईं.

लेकिन भारत की 2-0 से जीत की राह बनाने वाली वही रहीं.

पहले तीन क्वॉर्टर गोल रहित बीत जाने के बाद आख़िरी क्वार्टर में दीपिका के प्रयास से ही भारत को पेनल्टी स्ट्रोक मिला, जिसे नवनीत कौर ने गोल में बदलकर भारत को बढ़त दिलाई.

इस सफलता के बाद भारत के खेल में और निखार आया और वह लालरेमसेमी के गोल से 2-0 से जीत पाने में सफल हो गई.

दीपिका हैं भारतीय दल की जान

दीपिका जैसी खिलाड़ी कम ही देखने को मिलती हैं. वे टीम की फ़ॉरवर्ड खिलाड़ी होने के साथ ही ड्रैग फ़्लिकर भी हैं.

आमतौर पर ड्रैग फ़्लिकर डिफ़ेंडर होते हैं. इसकी वजह से डिफ़ेंडर मज़बूत क़द काठी के होते हैं और उनकी ताक़त उनके शॉट्स में दिखती है. लेकिन दीपिका इस मामले में अलग हैं.

असल में दीपिका में डिफेंडरों जैसी ताक़त है और इसकी वजह ये है कि वे पहलवानी वाले खानदान से आती हैं. दीपिका कहती भी हैं कि पहलवानी खानदान से आने की वजह से उन्हें विरासत में ताक़त मिली है.

दीपिका के हॉकी खिलाड़ी बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

वे हरियाणा के रोहतक के पास के गाँव की हैं. उनके भाई हिसार स्थित कुश्ती केंद्र में ट्रेनिंग करने जाते थे. पिता बेटे के साथ दीपिका को भी ले जाते थे. लेकिन दीपिका को लगता था कि उनके लिए पहलवान बनना संभव नहीं है.

इसलिए वह केंद्र में हॉकी की ट्रेनिंग देखने लगीं. हॉकी कोच आजाद सिंह मलिक ने उनकी हॉकी में दिलचस्पी देखकर उससे हॉकी खेलने को कहा और वह लगभग एक दशक में देश की स्टार बन गई हैं.

सफलता

जापान के ख़िलाफ़ सेमी फ़ाइनल मैच में भारत की जीत की कहानी आख़िरी क्वार्टर में लिखी गई.

पहले तीन क्वार्टर भारत के एक के बाद एक हमले बनने और मौक़े गंवाने के लिए याद किया जाएगा.

लेकिन आख़िरी क्वार्टर के दूसरे मिनट में दीपिका दाहिने फ्लैंक से गेंद लेकर सर्किल में पहुंची और जब वह लक्ष्य पर निशाना साधने जा रहीं थीं, तब ही एक जापानी डिफेंडर ने उन्हें गिरा दिया.

इस पर अंपायर ने पेनल्टी स्ट्रोक दिया. जापान ने इस पर रेफरल लिया, लेकिन पेनल्टी स्ट्रोक बरकरार रहा. नवनीत कौर ने स्ट्रोक को गोल में बदलकर भारत को मैच में बढ़त दिला दी.

एक गोल जमाते ही भारतीय हमलों में अच्छा तालमेल दिखने लगा और दाहिने फ्लैंक से ही बने हमले में गोल के सामने लालरेमीसेमा को पास मिला और उन्होंने कोई ग़लती किए बगैर गेंद को गोल में डालकर भारत की जीत तय कर दी.

पिछले ओलंपिक में नहीं खेल पाने की वजह से कोच हरेंद्र सिंह ने नई ओलंपिक साइकिल में यंग ब्रिगेड पर भरोसा किया है.

उन्होंने दीपिका के अलावा संगीता कुमारी, ब्युटी डुंग डुंग, शर्मिला जैसी युवाओं पर भरोसा करके टीम को एकदम से नया रूप दे दिया है.

इन युवाओं के मन में पिछली असफलता का बोझ मन पर नहीं होने से वह खुलकर खेल रहीं हैं.

ये बदलाव कारगर साबित हो रहा है. भारत अगर खिताब पा लेता है तो इस युवा टीम के मनोबल में ख़ासी बढ़ोत्तरी हो सकती है.

ख़िताब के लिए चीन से मुक़ाबला

भारतीय टीम अब फ़ाइनल में ख़िताब के लिए पेरिस ओलंपिक की रजत विजेता चीन से मुक़ाबला करेगी. चीन दूसरे सेमी फ़ाइनल में मलेशिया को 3-1 से हराकर फ़ाइनल में पहुंची है.

भारत को फ़ाइनल में मनोवैज्ञानिक लाभ मिल सकता है. इसकी वजह लीग मैच में भारत का उसको 3-0 से हराना है.

लेकिन फ़ाइनल एक अन्य मैच होता है तो भारत को सेमी फ़ाइनल में दिखाई ख़ामियों में सुधार करने की ज़रूरत होगी. बिना ख़ामियाँ सुधारे जीत पाना आसान नहीं होगा.

चीन की टीम तेज़ी से खेलने में विश्वास रखती है. भारत के लिए खेल की गति को नियंत्रित करना होगा ताकि खेल को अपने अनुरूप रखा जा सके.

भारतीय टीम जापान के ख़िलाफ़ मैच में ज़्यादातर समय गेंद को अपने क़ब्ज़े में रखने में सफल रही.

यही नहीं उन्होंने हमले भी ताबड़तोड़ किए, लेकिन इन हमलों को गोल में बदलने में असफल रही. इसकी वजह हमलों को सही फिनिश देने की कमज़ोरी रही.

हमलों में पैनापन लाने के लिए ज़रूरी है, सर्किल में पहुंचने के बाद अपनी योजना के अलावा डिफेंडरों की मानसिक स्थिति को समझना.

इसके लिए दिमाग़ी तेज़ी की ज़रूरत होती है, ताकि फ़ैसले ज़्यादा तेज़ी से लिए जा सकें. खिलाड़ियों में यह ख़ूबी अनुभव से आती है. टीम के युवा खिलाड़ी धीरे-धीरे इस कला में पारंगत हो सकते हैं.

पेनल्टी कॉर्नरों में सुधार ज़रूरी

भारतीय टीम इस चैंपियनशिप में अब तक अजेय ज़रूर रही है, लेकिन वह पेनल्टी कॉर्नरों को गोल में बदलने में प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं कर सकी है.

भारत ने सेमी फ़ाइनल मुक़ाबले में 13 पेनल्टी कॉर्नर बर्बाद किए. अगर फ़ाइनल में चीन के खिलाफ भी भारत ने इसी प्रदर्शन को दोहराया तो मुश्किल हो सकती है.

भारत ने पेनल्टी कॉर्नरों पर कई तरीक़े अपनाए, लेकिन हर तरीक़े में कोई ना कोई ग़लती होने की वजह से उन्हें गोल में नहीं बदला जा सका.

भारतीय ड्रैग फ्लिकर उदिता और दीपिका ने सीधे शॉट लगाए या फिर वेरिएशन किए.

वेरिएशन के समय सटीक पासिंग बेहद ज़रूरी होती है पर कई बार गेंद धीमी रही तो कभी पास ज़्यादा तेज़ फेंककर मौक़ा बर्बाद कर दिया गया.

भारतीय टीम इसी कमज़ोरी की वजह से पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने में असफल रही थी.

यह माना जा रहा था कि शॉपमैन की जगह हरेंद्र के मुख्य कोच बनने पर इसमें सुधार आएगा. लेकिन जापान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन ने एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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