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यूपी उपचुनाव की तारीख़ बदलने से किसको कितना फ़ायदा मिल सकता है?
- Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
केंद्रीय चुनाव आयोग ने यूपी, केरल और पंजाब में उपचुनाव की तारीख़ को आगे बढ़ा दिया है. आयोग के इस क़दम के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गरमी आ गई है.
मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया है कि इससे बीजेपी को फ़ायदा मिलेगा, हालांकि चुनाव आयोग की दलील है कि ऐसा त्योहारों के मद्देनज़र किया गया है.
उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर अब 20 नवंबर को उपचुनाव होंगे. नई तारीख़ के ऐलान के बाद विपक्षी समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया है कि बीजेपी को हार का डर है.
प्रदेश की नौ सीट मैनपुरी की करहल, अंबेडकर नगर की कटेहरी, मुज़फ्फरनगर की मीरापुर, अलीगढ़ की खैर, इलाहाबाद की फूलपुर, कानपुर की सीसामऊ, मिर्ज़ापुर की मंझवा, मुरादाबाद की कुंदरकी और गाज़ियाबाद की सीट पर उपचुनाव होने हैं.
पहले इन सीटों पर 13 नवंबर को मतदान होने वाले थे, लेकिन चुनाव आयोग ने अपने बयान में बताया कि बीजेपी, बीएसपी, कांग्रेस और आरएलडी के अनुरोध पर चुनाव की तारीख़ों को आगे बढ़ाया जा रहा है.
हालांकि कांग्रेस यूपी में चुनाव से बाहर है लेकिन चुनाव आयोग ने बताया कि पंजाब में कांग्रेस के अनुरोध पर चुनाव की तारीख़ को आगे बढ़ाया गया है.
कांग्रेस के मीडिया सेल के उपाध्यक्ष मनीष हिंदवी ने बीबीसी से कहा कि, "चुनाव आयोग को पहले से पता था कि आगे त्योहार हैं लेकिन नामांकन के बाद और प्रचार शुरू होने के बाद टालने का क्या औचित्य है?"
हिंदवी ने आरोप लगाया कि बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है. कांग्रेस इस उपचुनाव में समाजवादी पार्टी का समर्थन कर रही है.
किसको होगा फ़ायदा?
उत्तर प्रदेश में दिवाली के बाद भी कई दिन तक उत्सव चलता है, जिसमें लोग आसपास के तीर्थस्थल के दर्शन एवं परिक्रमा करने जाते हैं.
लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार नवलकांत सिन्हा का कहना है कि बीजेपी को लगता है कि उसका मतदाता उपचुनाव के दिन न रहे तो पार्टी को नुक़सान हो सकता है.
लिहाज़ा, चुनाव की तिथि आगे बढ़ने से बीजेपी को फ़ायदा मिलने की उम्मीद है.
वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी चुनाव हारने के डर से ऐसा कर रही है.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ये बीजेपी की पुरानी चाल है. पहले मिल्कीपुर का उपचुनाव टाला, अब बाक़ी सीटों के उपचुनाव की तारीख़, भाजपा इतनी कमज़ोर कभी न थी.
अखिलेश के मुताबिक 'यूपी में महा-बेरोज़गारी’ की वजह से जो लोग पूरे देश में काम की तलाश और रोज़गार के लिए जाते हैं, वो दिवाली और छठ की छुट्टी लेकर उत्तर प्रदेश आए हुए हैं. और उपचुनाव में भाजपा को हराने के लिए वोट डालने वाले थे.’
उन्होंने लिखा, ‘जैसे ही भाजपा को इसकी भनक लगी, उसने उपचुनावों को आगे खिसका दिया, जिससे लोगों की छुट्टी ख़त्म हो जाए और वो बिना वोट डाले ही वापस चले जाएं’
इन दावों से अलग मतदान की तिथि आगे बढ़ाने के बारे में चुनाव आयोग ने अधिकारिक बयान में बताया है कि नवंबर 13 से 15 तक मनाए जाने वाले 'कल्पथी राथोलसावम' उत्सव एवं 15 नवंबर को 'कार्तिक पूर्णिमा' और 'प्रकाश पर्व' की वजह से चुनाव की तारीखों को आगे बढ़ाया गया है.
गौरतलब है कि बीजेपी के नेता और प्रदेश में स्वतंत्र प्रभार के मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने 27 अक्तूबर को चुनाव आयोग को पत्र लिखा था.
अग्रवाल ने पत्र में लिखा कि हिंदू धर्म के त्योहार कार्तिक पूर्णिमा को देखते हुए उपचुनाव की तारीख़ को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
चुनाव की तिथि आगे बढ़ने के बाद अग्रवाल ने चुनाव आयोग और मुख्यमंत्री को धन्यवाद भी किया था.
उपचुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला
मतदान की तारीख़ आगे बढ़ने और मैदान में बीएसपी के उतरने से उत्तर प्रदेश की नौ सीटों पर उपचुनाव दिलचस्प हो चुके हैं.
बीएसपी के प्रत्याशियों ने नौ सीटों पर हो रहे मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. वरिष्ठ पत्रकार नवलकांत सिन्हा का भी कुछ ऐसा ही मानना है.
वो कहते हैं कि यूं तो सीधी लड़ाई समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच है, लेकिन इन उपचुनावों में बीएसपी के पूरे दमखम से उतर जाने की वजह से लड़ाई त्रिकोणीय हो सकती है.
महत्वपूर्ण सीटों के चुनावी रिकॉर्ड भी मुक़ाबले में बीएसपी के उतर जाने की स्थिति में कांटे की टक्कर के संकेत देते हैं.
2022 के चुनाव में फूलपुर से बीजेपी के उम्मीदवार ने सपा उम्मीदवार को तकरीबन 2700 वोट से हरा दिया था. वहां बीएसपी के उम्मीदवार को 33000 से ज़्यादा मत मिले थे.
इस बार बीजेपी की तरफ से दीपक पटेल, समाजवादी पार्टी की तरफ से मोहम्मद मुस्तफ़ा और बीएसपी से जितेन्द्र सिंह मैदान में हैं.
वहीं मिर्ज़ापुर के मंझवा से बीएसपी ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है. ये सीट पहले निषाद पार्टी के पास थी. 2022 के चुनाव में यहां से बीएसपी को 52 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले थे.
अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट पर बीएसपी दूसरे नंबर पर थी लेकिन बीजेपी और बीएसपी के उम्मीदवारों के बीच 74 हज़ार वोटों का फासला था.
इसी तरह से कटेहरी सीट पर समाजवादी पार्टी ने निषाद पार्टी के उम्मीदवार को तकरीबन 8 हज़ार वोट से हराया था, उस वक्त यहां से बीएसपी को तकरीबन 58 हज़ार वोट मिले थे.
बीएसपी ने इस बार कटेहरी से अमित वर्मा, करहल से अवनीश कुमार शाक्य, गाज़ियाबाद से परमानंद गर्ग, सीसामऊ से वीरेंद्र शुक्ला, फूलपुर से जितेन्द्र कुमार सिंह, मीरापुर से शाहनज़र और मंझवा से दीपक तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया है.
बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा, “इस बार बीएसपी मज़बूती से चुनाव लड़ रही है. समाजवादी पार्टी का पीडीए का फार्मूला जनता को गुमराह करने वाला है.”
मीरापुर सीट पर बीएसपी और समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है, पिछले चुनाव में ये सीट आरएलडी के पास थी.
उस वक्त आरएलडी-समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थी. आरएलडी ने इस बार के उपचुनाव में यहां से मिथिलेश पाल को मैदान में उतारा है.
गाज़ियाबाद की सीट पर सपा ने जाटव उम्मीदवार पर दांव लगाया है.
सपा ने यहां पर लोकसभा चुनाव का 'अयोध्या प्रयोग' दोहराया है. जब उसने अयोध्या की सामान्य सीट पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को उतारकर बीजेपी को मात दे दी थी.
लखनऊ में पत्रकार और बीएसपी की राजनीति पर बारीक नज़र रखने वाले सैयद कासिम रिज़वी ने कहा, “बीएसपी अलग-अलग सीटों पर कहीं पर बीजेपी और कहीं पर समाजवादी पार्टी को डैमेज कर सकती है.”
उन्होंने कहा, “मसलन, गाज़ियाबाद और मंझवा में वह बीजेपी को डैमेज कर सकती है तो कटेहरी, मीरापुर और कुंदरकी में समाजवादी पार्टी को नुक़सान पहुंचा सकती है.”
समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व श्रम मंत्री शाहिद मंज़ूर ने बीबीसी को बताया कि वोट दो भागों में बंट गया है इसलिए बीएसपी के लड़ने या न लड़ने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है.
बीजेपी को सिर्फ समाजवादी पार्टी ही टक्कर दे रही है. मंज़ूर का आरोप है कि बीएसपी सिर्फ़ बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है.
मंज़ूर का आरोप है कि बीजेपी ने वोटर लिस्ट में भी गड़बड़ी की है. वोटर लिस्ट में सपा समर्थक वोटों को चिह्नित करके काटा गया है.
उन्होंने कहा, “जिस तरह से हाल ही में हुए गन्ना सहकारी समिति के चुनाव में धांधली की गयी है. उससे साफ़ है कि बीजेपी किसी भी हद तक जा सकती है.”
हालांकि, बीजेपी का कहना है कि ये निराधार आरोप है, समाजवादी पार्टी हार का बहाना ढूंढ रही है.
कब टले उपचुनाव
इससे पहले 2019 में कर्नाटक में चुनाव आयोग ने मतदान टाला था. हालांकि उस समय चुनाव टालने के पीछे विधायकों की सदस्यता पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला था.
तब 15 सीटों पर उपचुनाव को इसलिए टाला गया था, क्योंकि कर्नाटक के विधायकों नें स्पीकर के फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी थी.
उस समय स्पीकर के आर रमेश कुमार ने 17 विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया था, जिनपर दल बदलने का आरोप था .
चुनाव आयोग के एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने बीबीसी को बताया कि उपचुनाव की तारीखों का आगे बढ़ना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले भी स्थानीय वजहों से उपचुनाव टाले जा चुके हैं.
2020 में चुनाव आयोग ने 8 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव टाल दिया था. तब इस फ़ैसले की वजह कोविड महामारी बनी थी. डर था कि चुनाव हुए तो महामारी और फैल सकती है.
ये फ़ैसला तब लिया गया था, जब इन सीटों को खाली हुए छह महीने का वक्त बीत चुका था.
ये सीटें थीं- रंगपुरा (असम), कुट्टानाड (केरल), जौवरा (मध्य प्रदेश), सदर्न अंगामी और पुंगरा किपरी (नगालैंड), बांगरमऊ, सुवार (उत्तर प्रदेश) और दुमका (झारखंड).
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित