दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे के 30 साल: जब फ़िल्म ने एक असल 'राज' को उसकी 'सिमरन' से मिलाया

    • Author, वंदना
    • पदनाम, सीनियर न्यूज़ एडिटर, बीबीसी न्यूज़

"मैं दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे जैसी फ़िल्में देखकर बड़ा हुआ हूँ. 10-12 साल का था जब मैंने पहली बार डीडीएलजे देखी थी. उसके बाद कई बार देखी. मन में ये बात बैठ गई थी कि लव स्टोरी हो तो ऐसी. तीन साल पहले शाहरुख़ ख़ान से जुड़े एक प्रोग्राम में मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो सफ़ेद चूड़ीदार और हरा दुपट्टा पहने हुई थी. देखते-देखते वो मुलाक़ात प्यार में बदल गई."

अपनी असल प्रेम कहानी हबीब ख़ान बिल्कुल शाहरुख़ ख़ान के राज वाले स्टाइल में सुनाते हैं,

हबीब बताते हैं, "मैं हैदराबाद से हूँ, वो मुंबई से. मेरे घर पर कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन हमारा धर्म, संस्कृति सब कुछ अलग है और उसके परिवार को मनाना आसान नहीं था. लेकिन डीडीएलजे से प्रेरित होकर हमने ये तय किया था कि जब तक माँ-बाप नहीं मानेंगे हम शादी नहीं करेंगे. धीरे धीरे मैंने उसकी बहन और माँ से मिलना शुरू किया. उससे ज़्यादा उसकी दीदी से बात होने लगी. फिर जीजा और भाई से."

इतने सालों बाद आख़िरकर अब हम शादी के क़रीब हैं. मैं यह सकता हूँ कि अगर असल ज़िंदगी में कोई राज है और उसकी सिमरन का हाथ उसके माँ-बाप तुम्हारे हाथ में देकर कहते हैं कि जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी तो इससे ख़ास कुछ भी नहीं."

जब 30 साल पहले 20 अक्तूबर को 'दिलवाले दुल्हिनया ले जाएँगे' रिलीज़ हुई थी तो ये रोमांस का दूसरा नाम बन गई थी.

डीडीएलजे -बग़ावत बनाम इजाज़त

हबीब बताते हैं कि उनकी असल ज़िंदगी की डीडीएलजे में माँ-बाप की मर्ज़ी के बग़ैर शादी न करने का फ़ैसला जितना उनका था, उतना ही उनकी साथी का भी था.

लेकिन बाग़ी इश्क़ के बजाए संस्कारों वाली इस प्रेम कहानी के बारे में सोचती हूँ तो ये सवाल मन में आता है कि ये कहानी कितनी राज (शाहरुख़) की थी और कितनी सिमरन (काजोल) की.

या सिमरन की अपनी कोई ज़मीन थी भी या नहीं ?

कुछ साल पहले लेखिका पारोमिता बारदोलोई की सोशल मीडिया पर लिखी एक पोस्ट थी जिसमें उन्होंने फ़िल्म में शादी के बरसों बाद सिमरन (काजोल) की ज़िंदगी की कल्पना की थी.

वे लिखती हैं, "अब मैं (सिमरन) और राज भी माँ-बाप हैं. मैंने राज को बताया कि जब हम पहली बार मिले थे और वो फ़र्श पर गिरी हुई ब्रा मेरे चेहरे के सामने लहरा रहा था तो मुझे बहुत असुरक्षित महसूस हुआ था."

"राज भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उसे तब लगता था कि किसी लड़की को पसंद करने का मतलब उसके नज़दीक जाना होता था. लेकिन 22 साल का राज अब 46 साल की उम्र में बदल चुका है. मुझे इस बात की ख़ुशी है."

यहाँ इशारा फ़िल्म के उस सीन की तरफ़ है जिसे कई लोग आपत्तिजनक मानते हैं.

वो आगे लिखती हैं, "घर पर हमें हर बात बाऊजी (अमरीश पुरी) के नियमों के मुताबिक़ करनी पड़ती थी. राज के साथ शादी के बाद मैं जो चाहे कर सकती हूँ. अजीब बात है न कि कितनी औरतों की आज़ादी और ख़ुशी उनकी ज़िंदगी में आने वाले पुरुष पर निर्भर करती है."

डीडीएलजे सिमरन की या सिर्फ़ राज की कहानी

फ़िल्म को सीन दर सीन देखें तो लगता है कि दिलवालों की इस दुनिया में औरतों के पास कोई ख़ास हक़ थे ही नहीं.

ये तभी तय हो जाता है जब अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ यूरोप घूमने के लिए सिमरन को अपने ही पिता से गुहार लगाते हुए कहती हैं, " क्या आप मेरे ख़ुशी के लिए मेरी अपनी ज़िंदगी से मुझे एक महीना भी नहीं दे सकते."

फ़िल्म पत्रकार अनुपमा चोपड़ा अपनी किताब 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे- ए मॉर्डन क्लासिक' में लिखती हैं, "डीडीएलजे महिला किरदारों की इच्छाओं और परेशानियों को क़रीब से दिखाती है लेकिन ये फ़िल्म सिमरन (काजोल) को अपनी कोई आवाज़ नहीं देती, शुरुआत में वो ज़रूर भाग जाना चाहती है लेकिन उसके बाद वो अपनी पति और प्रेमी के बीच के संघर्ष के नतीजे का बस चुपचाप इंतज़ार करती है."

"आख़िर में वो एक मर्द की हिफ़ाज़त से दूसरे मर्द की हिफ़ाज़त में चली जाती है, यहाँ सिमरन को रेलवे स्टेशन पर राज के पास जाने की इजाज़त भी सिर्फ़ पिता ही दे सकता है."

नज़ाकत से ही सही लेकिन डीडीएलजे की कहानी ताक़त और इज्ज़त की मर्दाना सीमाओं के तहत ही काम करती है.

औरतों की छोटी सी दुनिया भी दिखाती है डीडीएलजे

लेकिन विरोधाभास ये भी है कि निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने इसी मर्दाना दुनिया में औरतों की भी छोटी सी दुनिया दिखाई है जिसे मर्द न देख पाते हैं न महसूस कर पाते हैं.

जब मर्ज़ी के ख़िलाफ़ काजोल की सगाई कुलजीत (परमीत सेठी) से हो रही होती है तो सिमरन की दादी (ज़ोहरा सहगल) अपने बेटे से पूछती है, "पता नहीं क्यों मैने सिमरन की आँखें में एक उदासी सी देखी है. सब ठीक है न ? "

दादी तो बरसों से कभी सिमरन से मिली भी नहीं लेकिन उसकी आँखों में छिपे दर्द को पढ़ने के लिए उसे सिमरन से बात करने की ज़रूरत नहीं थी.

पिता के इर्द-गिर्द घूमते परिवार में माँ-बेटी के रिश्ते के नाम चंद ही पल थे.

जब माँ (फ़रीदा जलाल) दूर से देखती है कि छत पर उसकी बेटी सिमरन और राज करवा चौथ के दिन प्यार से एक दूसरे के मुँह में निवाला डाल रहे होते हैं तो वो बिना कुछ कहे-सुने समझ जाती है कि यही लड़का उसकी बेटी की ज़िंदगी है. और वो उन्हें भाग जाने के लिए कहती है.

शाहरुख़: हाथ में मेंडोलिन भी, 'औरतों' की रसोई भी

औरतों की इस दुनिया में अगर कोई मर्द दस्तक दे पाता है तो वो है शाहरुख़ का किरदार राज.

राज जो रसोई में बैठकर गाजर छीलता है, मेहमानों को खाना परोसता है. इस छवि से उसे कोई गुरेज़ नहीं.

जब पंजाब के सरसों के खेत में, लंदन से आया राज, सिमरन के लिए मेंडोलिन बजाते हुए गाता है - तुझे देखा तो ये जाना सनम.. और कहता है कि 'तुम्हें यहाँ से भगाकर या चुराकर ले जाने नहीं आया हूँ. मै यहाँ तुम्हे अपनी दुल्हन बनाने के लिए आया हूँ और तुम्हें यहाँ से ले जाऊँगा तभी जब तुम्हारे बाउजी ख़ुद तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में देंगे...' तो टॉक्सिक मैस्क्यूलेनिटी या माचो मर्दों वाली फ़िल्मों के बीच में ये राज बहुत लोगों को किसी ताज़ी बयार सा लगा था.

और इस फ़िल्म का क्रेज़ आज भी कम नहीं हुआ है.

मुंबई से 600 किलोमीटर दूर अमरावती में रहने वाले आशीष ऊइके शाहरुख़ फ़ैन क्लब चलाते हैं.

वह बताते हैं, "मराठा मंदिर में बरसों से लगी डीडीएलजे को देखना मेरा सपना था. हॉल में भारतीय ही नहीं अमेरिका, रूस, कोरिया जैसे देशों से फ़ैन्स भी थे. जैसे ही राज ( शाहरुख़ ख़ान) की एंट्री हुई लोगों ने सीटियाँ मारनी शुरु कर दीं. जब अमरीश पुरी ने बोला जा सिमरन जा.. तो पूरे थिएटर में लोग खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे एक फ़िल्म नहीं बल्कि एक पूरा एहसास है.."

हालांकि शुरुआत में शाहरुख़ डीडीएलजे करना नहीं चाहते थे क्योंकि इसमें कोई एक्शन नही था..बस दो प्रेमी थे जो घर से नहीं भागते.

डीडीएलजे में कोई नहीं भागता, यही इस फ़िल्म की बड़ी यूएसपी थी जिसे अनुपमा चोपड़ा ग्रैंड रेबिलियन ट्विस्ट कहती हैं

तो क्या आज के दौर में डीडीएलजे सफल होती ?

बॉलीवुड पर कई किताबें लिख चुके बालाजी विट्टल कहते हैं, "राज और सिमरन के माँ-बाप भारत से लंदन बतौर माइग्रेंट आए थे. लेकिन लंदन में पले-बढ़े राज और सिमरन को आज किसी बड़े सांस्कृतिक बदलाव से नहीं गुज़रना पड़ता. अपना जीवन साथी चुनने के लिए उन्हें माँ-बाप का विरोध नहीं झेलना पड़ता. कॉन्फ़्लिक्ट ही नहीं है, इसलिए आज डीडीएलजे बन ही नहीं सकती."

हबीब आज भी डीडीएलजे की टिकट अपने मोबाइल फ़ोन के कवर के पीछे लगाकर घूमते हैं.

डीडीएलजे के फ़ैन आशीष की बात पर ही ख़त्म करें, जो कहते हैं, "हर किसी को एक बार डीडीएलजे मराठा मंदिर में ज़रूर देखनी चाहिए. ये ख़ूबसूरत एहसास है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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