कलकत्ता हाई कोर्ट ने क्यों दिया 'अकबर' और 'सीता' का नाम बदलने का निर्देश?

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने एक दिलचस्प जनहित मामले की सुनवाई में राज्य सरकार को वहां के चिड़िया घर के शेर और शेरनी के नाम बदलने का निर्देश दिया है.

बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार ने इस पीआईएल पर अदालत के फ़ैसले के बाद जनहित याचिका (पीआईएल) पर एक किताब के लेखक और संवैधानिक मामलों के जानकार अनुज भुवानिया से बात की.

भुवानिया ने कहा, "इस मामले में न तो किसी भी अधिकार का उल्लंघन हुआ है और न ही इससे जुड़ा कोई क़ानून है फिर भी एक रिट याचिका दाखिल की गई. अदालतों को ये महसूस नहीं होता कि ऐसे मामलों में क्या क़ानूनी हस्तक्षेप की ज़रूरत भी है."

वो कहते हैं कि अदालत को इस याचिका को जुर्माने के साथ खारिज कर देना चाहिए था या फिर वे दया दिखाते हुए यह कह सकते थे कि याचिकाकर्ता अपनी याचिका को वापस ले ले.

किसने दायर की है याचिका

मामला यह है कि शेर का नाम 'अकबर' और शेरनी का 'सीता' है. उनको बीती 12 फ़रवरी को त्रिपुरा से लाकर सिलीगुड़ी स्थित सफ़ारी पार्क में एक साथ रखा गया था.

विश्व हिंदू परिषद ने यह कहते हुए अदालत का रुख़ किया था कि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी.

वीएचपी की याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने कई दिलचस्प टिप्पणियां भी कीं. उन्होंने सरकारी वकील को सलाह दी कि अपनी अंतरात्मा से पूछें और विवाद से बचें.

उनका कहना था, "पश्चिम बंगाल पहले से ही कई विवादों से जूझ रहा है. ऐसे में शेर ओर शेरनी के नामों पर होने वाले विवाद से बचा जा सकता था. किसी भी पशु का नाम किसी ऐसे व्यक्ति के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए जो आम लोगों के लिए आदरणीय हो."

अदालत ने राज्य सरकार के वकील देबज्योति चौधरी से सवाल किया कि क्या वे अपने पालतू जानवर का नाम किसी हिंदू देवी-देवता या मुस्लिम पैग़ंबर के नाम पर रखेंगे?

जज का कहना था कि देश में एक बड़ा तबक़ा सीता की पूजा करता है और अकबर एक धर्मनिरपेक्ष मुग़ल सम्राट थे. क्या कोई किसी जानवर का नाम रबींद्रनाथ टैगोर के नाम पर रख सकता है?

सरकार ने दिया नाम बदलने का भरोसा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि इन दोनों पशुओं के नाम त्रिपुरा में क्रमशः 2016 और 2018 में रखे गए थे. लेकिन उनके यहां पहुंचने के बाद ही नाम पर विवाद शुरू हुआ है.

उन्होंने अदालत को भरोसा दिया कि इन दोनों के नाम बदल दिए जाएंगे. उन्होंने अदालत से वीएचपी की याचिका को ख़ारिज करने की अपील की. लेकिन अदालत ने याचिकाकर्ता को इसे जनहित याचिका के तौर पर दायर करने की अनुमति दे दी. अब वह याचिका जनहित याचिका पर सुनवाई करने वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए जाएगी.

लेकिन यह मामला आख़िर हाईकोर्ट तक पहुंचा कैसे? याचिकाकर्ता की दलील थी कि उनको अख़बारों के ज़रिए इसकी सूचना मिली थी.

सिलीगुड़ी से छपने वाले बांग्ला अख़बार ने संगीर खोजे सीत (साथी की तलाश में सीता) शीर्षक से ख़बर छापी थी.

वीएचपी की दलील थी कि इस मामले को आपत्तिजनक तरीक़े से छापा गया है. इससे देश भर में फैले हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी. याचिका में दावा किया गया था कि उनको इस बारे में देश भर से शिकायतें मिली हैं. इस मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं की गई तो व्यापक आंदोलन और सामाजिक अशांति का ख़तरा है.

दो दिनों तक चली सुनवाई के दौरान एडवोकेट जनरल की दलील थी कि शायद प्यार से शेरनी का नाम सीता रख दिया गया है. उन्होंने याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह जनहित याचिका नहीं है. अदालत ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि उसने इस मामले पर जनहित याचिका क्यों नहीं दायर की है.

क्या नाम से आहत होंगी धार्मिक भावनाएं?

विश्व हिंदू परिषद के वकील शुभंकर दत्त बताते हैं, "हमने शेरनी का नाम हिंदू देवी के नाम पर रखे जाने के विरोध में याचिका दायर की थी. कोर्ट ने इस पर राज्य सरकार से जवाब-तलब करते हुए उनका नाम बदलने का निर्देश दिया है. परिषद ने पहले चिड़ियाघर के अधिकारियों को इस बारे में पत्र लिखा था. उसके बाद हमें याचिका दायर करनी पड़ी. अदालत का फ़ैसला वीएचपी की जीत है. अदालत ने उसकी दलीलों को स्वीकार कर लिया है."

कुछ क़ानूनी जानकारों का कहना है कि धार्मिक भावनाओं के आहत होने के सवाल पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती हैं.

कलकत्ता हाईकोर्ट के एडवोकेट सुनील राय बताते हैं, "जहां धार्मिक भावनाओं के आहत का मुद्दा जुड़ा हो, सामाजिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. इसलिए अदालत का फ़ैसला अपनी जगह सही है. यह मामला पशुओं के नामकरण का नहीं होकर एक ख़ास समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत होने से संबंधित है. धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए."

लेकिन कुछ लोगों की राय इस मामले में अलग है. उनके अनुसार अदालत को ऐसे मामले में दख़ल नहीं देना चाहिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)