You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जब तमिलनाडु में भड़का था 'हिंदी विरोधी आंदोलन'
- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
तमिलनाडु की एम के स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार और केंद्र सरकार एक बार फिर हिंदी को लेकर आमने-सामने है.
तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को राज्य में लागू नहीं किया है, और इसका कारण ये बताया है कि यह नीति हिंदी को राज्य में थोपने की कोशिश है.
वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि तमिलनाडु सरकार इस पर राजनीति कर रही है. उनका कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को महत्व देने वाली है और इसमें कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि हिंदी ही पढ़ाई जानी चाहिए.
तमिलनाडु में क़रीब 60 साल पहले भी राज्य में 'हिंदी विरोधी आंदोलन' भड़का था. जानकारों का कहना है कि इस घटना ने भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास पर असर डाला. आइए जानते हैं इसके बारे में...
ये आर्टिकल पहली बार बीबीसी हिंदी के पन्ने पर 26 जनवरी, 2015 को प्रकाशित हुआ था.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिएयहाँ क्लिक करें
एरा सेज़ियान तमिल भाषा के जाने-माने लेखक हैं और विरोध प्रदर्शन के दिनों में सांसद थे.
सेज़ियान ने बीबीसी से कहा, "आज भी जब कभी संस्कृत या हिंदी को लाने की हल्की सी कोशिश की जाती है तमिलनाडु में विरोध भड़क जाता है. लेकिन हिंदी को थोपे जाने पर अब पहले जैसा डर का माहौल नहीं है."
तमिल इतिहासकार एआर वेंकटचलापति का कहना है कि आज भी वहां उपेक्षित होने का एहसास बना हुआ है.
वे कहते हैं, "सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया जा सकता है. तमिलनाडु के दूरदराज के इलाके में अगर किसी को बैंक के एटीएम पर कुछ काम होता है तो उसे अंग्रेज़ी या फिर हिंदी का सहारा लेना होता, लेकिन उसके पास तमिल का विकल्प नहीं होता."
तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था.
तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी. लेकिन साल 1965 में दूसरी बार जब हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश की गई तो एक बार फिर से ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में पारा चढ़ गया था.
डीएमके नेता डोराई मुरुगन उन पहले लोगों में से थे, जिन्हें तब के मद्रास शहर के पचाइअप्पन कॉलेज से गिरफ़्तार किया गया था.
मुरुगन बताते हैं, "हमारे नेता सीएन अन्नादुराई 26 जनवरी को सभी घरों की छत पर काला झंडा देखना चाहते थे. चूंकि इसी दिन गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम भी थे, इसलिए उन्होंने तारीख बदलकर 25 जनवरी कर दी थी."
मुरुगन ने बताया, "राज्य भर में हज़ारों लोग गिरफ़्तार किए गए थे लेकिन मदुरई में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया. स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को ज़िंदा जला दिया गया. 25 जनवरी की उस तारीख को 'बलिदान दिवस' का नाम दिया गया."
ये विरोध प्रदर्शन और हिंसक झड़पें तकरीबन दो हफ्ते तक चलीं और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 70 लोगों की जानें गईं.
सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिंदी थोपे जाने के ख़िलाफ़ थे. दक्षिण के सभी राज्य भी इसके विरोध में थे. विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे."
विरोध प्रदर्शनों के नतीजतन उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा.
उन आश्वासनों को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन के जरिए अंग्रेज़ी को सहायक राज भाषा का दर्जा देकर अमल में लाया.
वेंकटचलापति कहते हैं, "तमिलनाडु ने अंग्रेज़ी पर बहुत निवेश किया है. उन्होंने इसका सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी की तरक्की के तौर पर इस्तेमाल किया है और तमिल ने इसे ख़ास पहचान दी है."
उनका कहना है, "सॉफ़्टवेयर क्षेत्र में भारत के नेतृत्व वाली हैसियत मुख्यतः दक्षिण में है. और यह अंग्रेज़ी के बिना कभी नहीं हो पाता. दूसरी तरफ देखें तो हिंदी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में मजदूरों की तरह काम करने आते हैं. इसलिए ये तर्क पूरी तरह ग़लत निकला कि हिंदी सीखने से काम मिलेगा."
वेंकटचलापति कहते हैं, "हिंदी को पूरी तरह से केंद्र की ओर से थोपी गई भाषा के तौर पर देखा जाता है. इसमें पैसा फूंककर और इसके प्रसार को संरक्षण देकर केंद्र सरकार ने हिंदी को कमज़ोर ही किया है. लोगों में इस बात को लेकर बहुत अंसतोष है कि भारत अन्य कई भाषाओं की कीमत पर भाषा विशेष को गैरज़रूरी तवज्जो देता है."
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंटल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक वीके नटराज कहते हैं, "विरोध प्रदर्शनों के बिना हिंदी को संरक्षण देने वाले लोग मज़बूत हो जाते. तमिल अपनी भाषाई पहचान को अन्य लोगों की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं."
एरा सेज़ियान कहते हैं, "यहां तक कि अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी अंग्रेज़ी सीखने को प्रोत्साहन दे रहे हैं. अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं. राज्य पहले से अधिक मजबूत हुए हैं और केंद्र अब पहले की तरह ताकतवर नहीं रहा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)