कनाडा अपने जंगलों में लगने वाली आग को कैसे रोक सकता है?

इमेज स्रोत, BC Wildfire Service/Anadolu via Getty Images
22 जुलाई की रात आठ बजे कनाडा के जैस्पर शहर के निवासियों को पहली बार पता चला कि उनके घरों को जंगल में लगी आग से ख़तरा पैदा हो गया है.
और 9.45 पर प्रशासन ने वहां आपातकाल की घोषणा कर दी. इस शहर के दक्षिण और उत्तर में जंगलों में आग लगने की शुरुआत के तीन घंटे में ही स्थिति बिगड़ गयी.
जैस्पर और उसके आसपास फैले नेशनल पार्क के इलाक़ों से लगभग पच्चीस हज़ार लोग घरों से भागने पर मजबूर हो गए. जैस्पर रॉकी अल्बर्टा में स्थित है.
बड़ी संख्या में पर्यटक वहां के पहाड़ों, ग्लेशियरों, सरोवरों और वन्य जीवन को देखने वहां पहुंचते हैं. शहर को ख़ाली कराने के दो दिन बाद ही पूरा शहर आग की लपटों में घिर गया.

अल्बर्टा राज्य की प्रमुख डैनियल स्मिथ उस भयानक मंज़र को याद करते वक़्त अपने आंसूओं को नहीं रोक पायीं.
डैनियल स्मिथ ने कहा कि, “जैस्पर शहर की जनता को उसकी ख़ूबसूरती, वहां के हरे मैदानों, पहाड़ों और तालाबों की सुंदरता पर हमेशा नाज़ रहा है. आग ने बहुत नुक़सान पहुंचाया है, लेकिन जैस्पर की जादुई ख़ूबसूरती कभी नष्ट नहीं होगी.”
अग्निशमन विभाग का कहना है कि इस आग को नियंत्रित करने में कई दिन और लगेंगे.
इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि कनाडा उसके जंगलों में लगने वाली आग की रोकथाम कैसे कर सकता है?
आग में झुलसता कनाडा

इमेज स्रोत, BC Wildfire Service/Anadolu via Getty Images
सुंदर प्राकृतिक नज़ारों से घिरे जैस्पर में जुलाई महीने में कई बार पारा 30 डिग्री के ऊपर चला गया.
गर्मी के दौर को देखते हुए दमकलकर्मी जहां कहीं आग लगने की सूचना मिलती है, वहां तुरंत पहुंचते थे.
ब्रिटिश कोलंबिया में थॉमसन रिवर्स यूनिवर्सिटी में जंगल की आग संबंधी विज्ञान के प्रोफ़ेसर माइक फ़लैनेगन बताते हैं कि कैसे जैस्पर के इर्द-गिर्द फैले जंगलों में लगी आग जल्द ही बेकाबू हो गयी.
उन्होंने कहा, “सोमवार को आग लगी और बुधवार शाम तक शहर में पहुंच गयी. आग बहुत तेज़ी से फैली और भयानक होती चली गयी."
“अग्निशमन कर्मियों ने आग बुझाने के लिए हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया, लेकिन उससे फ़ायदा नहीं हुआ. उनका कहना है कि तेज़ हवा की वजह से उन्होंने विमान का इस्तेमाल नहीं किया.”
“क्योंकि, वो ख़तरनाक हो सकता था. ज़मीन पर आग बुझाने का प्रयास कर रहे अग्निशमन कर्मियों के लिए भी बहुत ख़तरा पैदा हो गया था, क्योंकि आग की लपटें सौ मीटर से ज़्यादा ऊंची उठ रही थीं.”
उस दौरान एक अग्निशमन कर्मी की मौत भी हो गयी. माइक फ़लैनेगन के अनुसार, आग इतनी उग्र इसलिए हो गयी, क्योंकि बारिश की कमी और भीषण गर्मी के कारण लकड़ियां और घास सूखी थीं.
जैस्पर तीन घाटियों के बीच बसा है. आग की चिंगारियां और शोले हवा के कारण कई किलोमीटर तक पहुंच जाते हैं.
कनाडा के एक तिहाई हिस्से पर जंगल बसे हैं और जंगलों में आग अक्सर लगती रहती है. आग लगने की स्थिति में उसे काबू में करने के लिए प्रशासन ने तैयारियां भी की होती हैं.
प्रोफ़ेसर माइक फ़लैनेगन कहते हैं, “मिसाल के तौर पर अगर बस्ती से दो किलोमीटर दूरी पर आग लगती है, तो फ़ौरन हेलिकॉप्टरों सहित दमकल के आवश्यक संसाधनों को तैनात कर दिया जाता है.”
“लेकिन, मानो अगर उत्तर में सौ किलोमीटर दूर आग लगती है, तो प्रशासन आने वाले कुछ दिनों में कैसा मौसम होगा और आग फैलने की गति कितनी हो सकती है, इसका अनुमान लगाता है.”
“उसके बाद तय किया जाता है कि उस आग को बुझाया जाए या उस पर केवल नज़र रखी जाए.”
यानि जंगलों में लगने वाली सभी प्रकार की आग को ख़तरनाक नहीं माना जाता और कई बार तो इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए योजनाबद्ध तरीके से आग लगायी जाती है.
लेकिन, कई बार मामूली आग बेकाबू हो जाती है, जिससे भारी तबाही होती है. मई 2016 में अल्बर्टा के पास जंगलों में लगी आग कनाडा के इतिहास की सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाली साबित हुई थी.
फोर्क मरे शहर में दो हज़ार से ज़्यादा व्यापारिक ठिकाने और मकान जलकर ध्वस्त हो गए थे.
बारिश में कमी और बढ़ती गर्मी की वजह से मौसम सूखा हो जाता है और बिजली गिरने से आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.
माइक फ़लैनेगन ने कहा कि ब्रिटिश कोलंबिया में इस साल जंगल की आग का मौसम फ़रवरी में ही शुरू हो गया था. जितना सूखा पड़ेगा, उतनी ही बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ेंगी.
कनाडा में जंगल में आग लगने की लगभग पचास प्रतिशत वारदातें बिजली गिरने से होती हैं, मगर इससे लगभग नब्बे प्रतिशत इलाक़े झुलस जाते हैं.
जंगल के रहस्य

इमेज स्रोत, BC Wildfire Service/Anadolu via Getty Images
वर्ल्ड रिसोर्सेज़ इंस्टिट्यूट की रिसर्च मैनेजर लिज़ गोल्डमन कहती हैं कि जंगलों में लगने वाली आग और उसकी बढ़ती तीव्रता की समस्या केवल कनाडा और उत्तरी अमेरिका तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनियाभर में फैल रही है.
“अब जंगल में आग लगने की वारदातें उष्णकटिबंधीय और गीले जंगलों में भी बढ़ने लगी हैं, जहां उनकी अपेक्षा नहीं की जाती. उन इलाकों में भी आग की तीव्रता और उसकी चपेट में आने वाले इलाक़े बढ़ रहे हैं.”
“यह वारदातें समशीतोष्ण क्षेत्रों में अक्सर होती हैं, जहां उसकी अपेक्षा भी रहती है. मगर, अब वहां भी उसकी तीव्रता बढ़ रही है, जिससे वहां के जंगलों और आस पास रहने वाले समुदायों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है.”
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में आग लगने की बढ़ती घटनाएं बड़ी चिंता का विषय है. क्योंकि वहां नमी ज़्यादा होती है, जिस वजह से जंगल गीले रहते हैं और बिजली गिरने या गर्मी से आग लगने की आशंका कम होती है.
मगर, अमेज़न के वर्षा वनों और इंडोनेशिया के जंगलों में आग लगने का बड़ा कारण मनुष्य हैं. उन इलाकों में कई लोग ज़मीन के इस्तेमाल के लिए जानबूझ कर जंगलों को आग लगा कर साफ़ करना चाहते हैं.
लिज़ गोल्डमन का कहना है कि कई बार ज़मीन के मालिक जंगल की ज़मीन का इस्तेमाल करने के लिए वहां पेड़ और झाड़ियों को आग लगा देते हैं.
मगर, अक्सर यह आग बेकाबू भी हो जाती है और उनकी ज़मीन से फैलते हुए जंगलों को अपनी चपेट में ले लेती है.
अक्सर किसान बोआई के लिए गीली ज़मीन को सुखा देते हैं और यहां आग के तेज़ी से फैलने का ख़तरा बढ़ जाता है.
2015 में इंडोनेशिया में इसी प्रकार आग बेकाबू हो गयी थी, जिससे भारी नुक़सान हुआ और इंडोनेशिया को आधुनिक युग की एक सबसे बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी को झेलना पड़ा.
लिज़ गोल्डमन कहती हैं कि सुमात्रा और बोर्नियो द्वीप के जंगलों में लगी आग का धुआं दूर-दूर तक फैला, जिसने तटीय क्षेत्र के लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया.
इस धुएं के कारण इंडोनेशिया में लगभग एक लाख लोग मारे गए. साथ ही उसके पड़ोसी देश मलेशिया और सिंगापुर में भी हज़ारों लोग प्रदूषण के कारण मारे गए.
लिज़ गोल्डमन का कहना है कि यह धुआं स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है. जहां आग लगती है वहां से यह धुआं सैकड़ों किलोमीटर तक फैल जाता है और जनजीवन को प्रभावित करता है.
“जब जंगलों में आग लगती है, तो वहां पेड़ों और झाड़ियों में जमा कार्बन का उत्सर्जन होता है, जिस कारण जलवायु परिवर्तन अधिक तेज़ी से होने लगता है. इससे दुनियाभर में लोग प्रभावित होते हैं.”
जलवायु परिवर्तन पर जंगल की आग का असर पड़ता है, मगर जलवायु परिवर्तन से जंगल में आग लगने की वारदातें भी बढ़ती हैं, क्योंकि इससे सूखा पड़ता है और आग लगने की संभावना बढ़ जाती है.
इसके साथ-साथ मौसम के बदलाव भी इसका कारण बनते हैं. 2015 में इंडोनेशिया के जंगलों में आग लगने का एक कारण ‘एल नीनो’ था.
जब प्रशांत महासागर में पानी गर्म हो जाता है, तो उसे एल नीनो प्रभाव कहा जाता है. 2015 में इसी की वजह से बारिश इंडोनेशिया तक नहीं पहुंची, जिसकी वजह से वहां ज़मीन सूख गयी और आग लगने का ख़तरा बढ़ गया.
इसी प्रकार 2021 में रूस में रिकार्ड तोड़ गर्मी और सूखा पड़ा, जिसका कारण पोलर जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर रुख़ करना बताया जाता है.
उस समय पहली बार साइबेरिया के जंगलों में लगी आग का धुआं उत्तरी ध्रुव तक पहुंच गया. अब जंगलों में आग लगने की समस्या दक्षिणी यूरोप में भी फैल रही है.
इस साल अगस्त में ग्रीस में भारी गर्मी के चलते जंगलों में आग लग गयी और राजधानी एथेंस और आस-पास के इलाक़े से हज़ारों लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के निर्देश दिए गए.
जंगल की आग का इतिहास

इमेज स्रोत, BC Wildfire Service/Anadolu via Getty Images
अमेरिका के जियोलॉजिकल सर्वे के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक जॉन कीली का मानना है कि धरती पर जंगलों में आग का इतिहास करोड़ों साल पुराना है.
और यह ईको सिस्टम या पारिस्थितिकी तंत्र का सामान्य और आवश्यक हिस्सा है.
जॉन कीली कहते हैं, “कैलिफॉर्निया में तट के नज़दीक जंगली इलाक़ों में पेड़-पौधों की ऐसी सैकड़ों प्रजातियां हैं, जो जंगल की आग के बिना फल-फूल नहीं सकतीं, क्योंकि उनके बीजों को फलने के लिए धुएं की ज़रूरत होती है.”
“यह क्षेत्र की जैव विविधता के लिए आवश्यक है. यही बात हमें दक्षिण अफ़्रीका और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में भी दिखाई देती है.”
यानि जंगल की आग ईको सिस्टम के लिए ज़रूरी है. मगर जैसा कि लीसा गोल्डमन से हमने सुना कि अब जंगलों की आग पहले से अधिक उग्र होने लगी है. आख़िर पहले से अब तक क्या बदला है?
जॉन कीली ने कहा कि, “काफ़ी कुछ बदल गया है. एक तो दुनिया की आबादी बढ़ गयी है. दूसरी बात यह है कि कई क्षेत्रों के मूलनिवासी अपने जंगलों की देखभाल और आग का प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण करना जानते थे.”
“मिसाल के तौर पर अब उत्तर अमेरिका में जंगल की ज़मीन की देखभाल निजी संस्थाओं के हाथ में है, जो हर प्रकार की आग को बुझा देते हैं.”
आबादी के बढ़ने से ज़मीन की ज़रूरत भी बढ़ गयी है. साथ ही लकड़ी उद्योग की कंपनियां अपनी लकड़ी बचाने के लिए जंगल में आग को रोकती हैं.
जॉन कीली कहते हैं कि पहले जंगलों में स्वाभाविक तरह से आग लगती थी, जो आमतौर पर पेड़ों के इर्द-गिर्द की ज़मीन पर उगने वाली झाड़ियों को झुलसाती थीं, लेकिन उससे पेड़ों को क्षति नहीं पहुंचती थी.
इस स्वाभाविक प्रक्रिया को रोकने से जंगलों में बड़ी मात्रा में ईंधन इकठ्ठा हो रहा है और जब आग लगती है तो वो पहले से कहीं अधिक उग्र हो जाती है और पूरे जंगल को नष्ट कर देती है.
बढ़ती आबादी के कारण शहरी इलाक़े फैलते-फैलते वनों के नज़दीक आते गए हैं और उनके बिजली के नेटवर्क भी आग लगने का एक कारण है.
जॉन कीली के अनुसार, पिछले बीस सालों में बिजली की तारों की वजह से जंगल में आग लगने की घटनाएं पांच गुना बढ़ गयी हैं.
जिन इलाकों में हवा तेज़ चलती है, वहां यह समस्या अधिक है, क्योंकि तेज़ हवाओं से बिजली की तारें गिर जाती हैं.
कैलिफ़ॉर्निया में इस वजह से आग लगने की कई घटनाएं दिखाई देती हैं. वो कहते हैं कि, “बढ़ती आबादी निश्चित ही इस समस्या का एक बड़ा कारण है.”
आग से ही आग का नियंत्रण

इमेज स्रोत, BC Wildfire Service/Anadolu via Getty Images
जंगल की आग के विज्ञान के विशेषज्ञ और अल्बर्टा वाइल्ड फ़ायर ब्रांच के पूर्व समन्वयक कोर्डी टिमस्ट्रा कहते हैं कि 2023 कनाडा में जंगल की आग से बड़ा नुक़सान हुआ था और लगभग डेड़ करोड़ हेक्टेयर ज़मीन नष्ट हो गयी थी.
“बोरियल वन जलते रहेंगे और भविष्य में यह समस्या और बड़ी होगी. कई लोग कहते हैं कि यह अब सामान्य है. लेकिन, यह ग़लत है क्योंकि भविष्य में स्थिति और विकट होगी.”
“अब जंगल की आग को लेकर लोगों की सोच बदल रही है और वो इस समस्या से निपटने के नए तरीकों पर विचार कर रहे हैं.”
जैसा कि हमने जैस्पर में देखा कि आग को बुझाने के लिए आसमान से हेलिकॉप्टर या विमान के ज़रिए उसे बुझाने की कोशिश की जाती है, क्योंकि अग्निशमन कर्मियों के लिए ज़मीन पर खड़े होकर यह काम करना बड़ा जोखिम भरा होता है.
कोर्डी टिमस्ट्रा कहते हैं कि जब आग लग जाती है, तो उससे तेज़ हवाएं चलती हैं, जिनकी रफ़्तार 150 किलोमीटर प्रतिघंटा तक पहुंच सकती हैं. ऐसी स्थिति में वहां विमान भेजना ख़तरनाक हो सकता है.
“इसलिए ऐसी स्थिति में सबसे अहम बात यही है कि प्रशासन के पास लोगों को क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकालने की अच्छी योजना होनी चाहिए.”
कोर्डी कहते हैं कि इस समस्या के हल के लिए आम लोगों को भी प्रयास करना होगा. सबसे पहला कदम यह है कि आग को फैलने के लिए अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न ना होने दी जाए.
इसके लिए नियोजित तरीके से आग लगाने के तरीके अपनाए जाने चाहिए. साथ ही प्रशासन को आग के नियंत्रण के लिए मशीन और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर बल देना चाहिए.
उसकी चौबीस घंटे निगरानी होनी चाहिए. भविष्य में आग बुझाने वाले अग्निरोधक ड्रोन के ज़रिए आग पर काबू पाया जा सकेगा.
आग का पता लगाने के लिए सैटेलाइट इमेजिंग का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. लेकिन, हर साल हम इस समस्या से कुछ ना कुछ नया सीख रहे हैं. यही हमने 2024 में भी देखा.
कोर्डी टिमस्ट्रा ने कहा कि, “जैस्पर में लगी आग ने कनाडा को दिखा दिया कि दुनिया की एक सबसे अच्छी अग्नि प्रबंधन व्यवस्था भी जंगल की आग को नियंत्रित करने की गारंटी नहीं दे सकती.”
“इसका कोई एक हल नहीं है. कई स्तर पर प्रयास करने की ज़रूरत है. संसाधनों की ज़रूरत है. यह सब हासिल करने में समय लगेगा.”
“यह ऐसा ही है जैसा कि हम भाग रहे हैं, लेकिन आग और जलवायु परिवर्तन हमसे अधिक तेज़ भाग रहा है.”
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- कनाडा उसके जंगलों में लगने वाली आग की रोकथाम कैसे कर सकता है?
जैस्पर में लगी आग से शहर और उसके इर्द-गिर्द नेशनल पार्क का 32 हज़ार हेक्टेयर इलाका जलकर ध्वस्त हो गया. यानि इटली से भी बड़ा हिस्सा आग की भेंट चढ़ गया.
इस तरह की घटनाएं अब अक्सर होने लगी हैं. मगर, इसकी रोकथाम के लिए कुछ कदम ज़रूर उठाए जा सकते हैं. लोगों को इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाने पड़ेंगे.
अग्निशमन विभाग को नयी टेक्नोलॉजी और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे.
कोर्डी टिमस्ट्रा का कहना है कि सबसे अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाना चाहिए कि आग लगते ही उसे फ़ौरन काबू में करने के लिए कार्यवाही हो, क्योंकि एक बार आग फैलने लग जाए तो फिर हम कितने भी विमान और संसाधन लगा दें उसे काबू में कर पाना मुश्किल होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















