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भारत और रूस का अब आगे का रास्ता क्या होगा और इसमें कौन-सी चुनौतियां हैं?
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के अंत में दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया.
यह बयान 70 बिंदुओं का है और इसमें साफ़ लिखा है कि दोनों देश आर्थिक साझेदारी को अगले स्तर तक ले जाना चाहते हैं.
दोनों देशों के बीच व्यापार, परमाणु ऊर्जा, ईंधन, मुक्त व्यापार समझौता, कुशल कामगारों की आवाजाही से लेकर रक्षा सहयोग पर चर्चाएं हुईं.
लेकिन क्या सिर्फ़ महत्वाकांक्षा काफ़ी है? बड़े फैसलों पर दोनों देशों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है? और इस यात्रा पर पश्चिमी देशों, ख़ासकर अमेरिका, की नज़र कैसी है?
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व्यापार को प्राथमिकता
संयुक्त बयान में व्यापार और आर्थिक साझेदारी को सबसे ऊपर रखा गया है.
इसमें कई बातें शामिल हैं – जैसे भारत से रूस को निर्यात बढ़ाना, व्यापार में लगने वाले शुल्क और अन्य बाधाओं को कम करना, महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग करना और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार करना.
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा, "इस यात्रा का मुख्य फोकस आर्थिक मुद्दों पर था, हमारा उद्देश्य था औद्योगिक और निवेश साझेदारी को मज़बूत करना. आज दुनिया में सप्लाई चेन और व्यापारिक रिश्ते दबाव में हैं, निवेश अनिश्चित हो रहा है. ऐसे समय में दोनों देशों का इन मुद्दों पर ध्यान देना अपने आप में एक संदेश है."
दोनों देशों के नेताओं ने कुशल कामगारों की आवाजाही को आसान बनाने वाले समझौतों की सराहना की.
साथ ही यह लक्ष्य रखा गया कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुँचे. संदर्भ के लिए – 2024-25 में यह व्यापार 68.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था.
शुक्रवार को भारत-रूस बिज़नेस फ़ोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "पिछले साल हमने 2030 तक 100 अरब डॉलर का लक्ष्य तय किया था, लेकिन मौजूदा संभावनाओं को देखते हुए हमें इतना इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा."
मोदी ने यह भी कहा कि भारत 'रूस रेडी वर्कफ़ोर्स' तैयार करना चाहता है.
हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों को संदेह है.
जेएनयू के डॉ. अमिताभ सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, "100 अरब डॉलर का लक्ष्य मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं. दोनों देशों को बहुत मेहनत करनी होगी."
उन्होंने समझाया, "अभी व्यापार में तेल की बड़ी भूमिका है. पुतिन चाहते हैं कि रूस भारत को तेल बेचता रहे. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत के लिए तेल खरीदना मुश्किल हो रहा है. बैंक और कंपनियाँ डर रही हैं कि कहीं वे प्रतिबंधों की चपेट में न आ जाएँ. जब तक इसका हल नहीं निकलता, भारत रूस से तेल कैसे खरीदेगा?"
तेल का व्यापार पर कितना असर है, यह ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के दिए गए आंकड़ों से समझा जा सकता है. 2024 में भारत ने रूस से 52.7 अरब डॉलर का तेल आयात किया था.
तेल की अहमियत को कम करने के इरादे से भारत और रूस एक मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) पर काम कर रहे हैं. यह समझौता रूस के साथ-साथ यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के देशों को भी शामिल करेगा. इससे तेल के अलावा माल के आदान-प्रदान में आसानी होगी.
रक्षा और रणनीतिक रिश्ते
रक्षा सौदों की घोषणा की उम्मीद थी, लेकिन ज़्यादा कुछ नहीं हुआ. बयान में संयुक्त उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और दोस्ताना देशों को निर्यात का ज़िक्र है.
मिस्री ने कहा, "प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच रक्षा सहयोग की मज़बूती और लंबे इतिहास पर चर्चा हुई. रूस 'मेक इन इंडिया' रक्षा कार्यक्रमों में भी भाग ले रहा है."
हालाँकि, S-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम की डिलीवरी में देरी हो रही है ऐसा बार बार मीडिया की रिपोर्ट में बताया गया है.
भारत को रूस से परमाणु पनडुब्बी भी इस साल मिलनी थी, लेकिन अब 2028 तक आने की उम्मीद है.
यह साफ़ नहीं कि भारत नए ऑर्डर देने से पहले पुराने ऑर्डर पूरे होने का इंतज़ार कर रहा है या नहीं. 4 दिसंबर को भारत के रक्षा मंत्री और उनके रूसी समकक्ष की बैठक में भी इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं मिली.
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि रिश्ता अब सिर्फ़ ख़रीद-बिक्री का नहीं, बल्कि संयुक्त उत्पादन का हो रहा है.
ब्रहमोस एयरोस्पेस के पूर्व सीईओ सुधीर कुमार मिश्रा ने न्यूज़ एजेंसी पीटीआई से कहा, "रूस अब समझ रहा है कि भारत की रक्षा सप्लाई चेन में बने रहने के लिए उसे संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण को बढ़ावा देना होगा."
अमेरिका में असहजता
हडसन इंस्टीट्यूट की डॉ. अपर्णा पांडे ने कहा, "मेरे लिए सबसे बड़ा संदेश प्रतीकात्मक है. भारत के लिए रूस क्यों अहम है? क्योंकि चीन के विस्तारवाद को संतुलित करने में रूस मदद करता है. पुतिन का दिल्ली आना यह दिखाता है कि वह इस रिश्ते को कितना महत्व देते हैं. अमेरिका के विपरीत, जहाँ सत्ता बदलने पर नीति बदल सकती है, रूस स्थिरता देता है."
वे बताती हैं, "अमेरिका में इस यात्रा पर अभी तक ज़्यादा चर्चा नहीं दिखी, लेकिन विशेषज्ञ इसे ध्यान से देख रहे हैं. संयुक्त बयान में ऐसा कुछ नहीं है जिससे अमेरिका नाराज़ हो – जैसे कोई बड़ा रक्षा सौदा या तेल ख़रीदने का वादा. और अगर अमेरिका रूस से बात कर सकता है, तो भारत भी कर सकता है."
लेकिन जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं उससे लगता है कि अमेरिका में पुतिन के भारत दौरे से असहजता है.
अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने ट्रंप प्रशासन पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुली करने का आरोप लगाया.
उन्होंने गुरुवार को अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, "मैं फिर से दोहराऊंगी. जब अमेरिका ने टैरिफ़ पर पीएम नरेंद्र मोदी को बुली करना शुरू किया और इसके बाद भारत को ज़बरदस्ती किनारे लगाना शुरू किया, उसी दिन से पीएम मोदी ने भूराजनीति की लगाम अपने हाथ में ले ली और नए ग्लोबल इकोनॉमिक चेस गेम की शुरुआत कर दी थी."
"आज एक तरफ़ पीएम नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति मिल रहे हैं और दूसरी ओर से फ़्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बीजिंग में मिल रहे हैं. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस में क्रिसमस पार्टियों में व्यस्त हैं."
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के पूर्व अधिकारी माइकल रूबिन ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, "भारत और रूस को क़रीब लाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप नोबल प्राइज़ के हक़दार हैं."
उन्होंने कहा, "रूस के नज़रिए से यह दौरा बेहद सकारात्मक है और भारत ने व्लादिमीर पुतिन को वह सम्मान दिया है जो उन्हें दुनिया में और कहीं मिलना मुश्किल है. मैं तो यह भी कहूँगा कि डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए, क्योंकि भारत और रूस जिस तरह एक-दूसरे के क़रीब आए, वह उनकी वजह से ही हुआ..."
"बहुत सारे समझौतों और सहमतियों का भारत में जश्न मनाया जा रहा होगा…लेकिन सवाल है कि इनमें से कितने समझौते सच में पूरी तरह लागू होंगे? कितने फ़ैसले हमारे आपसी हितों के वास्तविक मेल पर आधारित हैं? और कितने ऐसे हैं जो इस कारण लिए जा रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत के साथ जैसा व्यवहार किया, उसके प्रति एक तरह की नाराज़गी मौजूद है?..."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.