थायरॉइड कैंसर के होने की वजहें और जानिए कहाँ रहना चाहिए सतर्क

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- Author, जैस्मीन फ़ॉक्स-स्केली
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दुनिया के कुछ हिस्सों में थायरॉइड कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं और वह भी दूसरे तरह के कैंसर की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से.
अमेरिका में थायरॉइड कैंसर की दर किसी भी दूसरे कैंसर की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है. लेकिन इसकी वजह क्या है?
थायरॉइड ग्लैंड गले के निचले हिस्से में, एडम्स एप्पल के ठीक नीचे स्थित होती है. इसका काम हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, शरीर के तापमान और वज़न को नियंत्रित करने वाले हार्मोन को रिलीज़ करना है.
थायरॉइड कैंसर तब होता है, जब थायरॉइड ग्लैंड की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने और विभाजित होने लगती हैं, जिससे ट्यूमर बन जाता है.
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ये असामान्य कोशिकाएं आसपास के ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकती हैं.
थायरॉइड कैंसर के ज़्यादातर मामलों में इलाज हो जाता है, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स इस बात को लेकर परेशान हैं कि ये बीमारी तेज़ी से बढ़ रही है.
अमेरिका में कैंसर रिपोर्टिंग सिस्टम, सर्विलांस, एपिडेमियोलॉजी, ऐंड एंड रिजल्ट्स डेटाबेस के अनुसार, यूएस में थायरॉइड कैंसर के मामले साल 1980 और 2016 के बीच तीन गुना से भी ज़्यादा बढ़ गए हैं.
पुरुषों में हर एक लाख में यह दर 2.39 से बढ़कर 7.54 हो गई है और महिलाओं में हर एक लाख में यह दर 6.15 से बढ़कर 21.28 हो गई है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया सैन फ़्रांसिस्को (यूसीएसएफ़) की एंडोक्राइन सर्जन, सान्ज़ियाना रोमन कहती हैं, "मेडिसिन में हुई प्रगति के बावजूद थायरॉइड कैंसर उन कुछ कैंसरों में से एक है, जिसके मामलों में समय के साथ बढ़ोतरी हो रही है."
थायरॉइड कैंसर के मामले बढ़ने की क्या वजह है?
यह लंबे समय से पता है कि बचपन में बहुत अधिक मात्रा में आयनाइज़िंग रेडिएशन के संपर्क में आने से थायरॉइड कैंसर हो सकता है.
1986 में चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना के बाद के वर्षों में, बेलारूस, यूक्रेन और रूस में बच्चों में इस बीमारी की दर में भारी वृद्धि हुई.
एक अध्ययन में पाया गया कि जापान में परमाणु बम से बचे लोगों में, 1958 से थायरॉइड कैंसर के लगभग 36 प्रतिशत मामले बचपन में रेडिएशन के संपर्क में आने के कारण हो सकते हैं.
हालांकि, 80 या 90 के दशक में अमेरिका में या कहीं और ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसे इस बढ़ोतरी से जोड़ा जा सके.
वहीं इस पर भी विचार किया गया कि क्या इसकी एक वजह ज़्यादा आसानी और बेहतर तरीके से बीमारियों का पता लगाना हो सकता है?
मेडिकल जांच में तरक़्क़ी है वजह?

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1980 के दशक में डॉक्टरों ने पहली बार थायरॉइड अल्ट्रासोनोग्राफ़ी का इस्तेमाल शुरू किया, जो एक इमेजिंग टेक्नीक है, जो साउंड वेव्स से थायरॉइड ग्लैंड की तस्वीर बनाती है. इससे डॉक्टरों को बहुत छोटे थायरॉइड कैंसर का पता लगाने में मदद मिली, जिनका पहले पता नहीं चल पाता था.
फिर 1990 के दशक में, डॉक्टरों ने उन गांठों से कोशिकाओं की जांच करना शुरू किया, जिनसे कैंसर का शक होता. इस तकनीक को फाइन नीडल एस्पिरेशन बायोप्सी के नाम से जाना जाता है.
अमेरिका के मैरीलैंड स्थित नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की महामारी विज्ञानी कैरी किताहारा कहती हैं, "पहले, डॉक्टर थायरॉइड ग्लैंड को छूकर गांठों की जांच करते थे."
"लेकिन अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकों से, डॉक्टर छोटे आकार की गांठों को पहचानकर उनकी बायोप्सी कर सकते हैं. इससे छोटे आकार के पैपिलरी थायरॉइड कैंसर का पता लगाने में मदद मिली, जिनका पहले सिर्फ़ हाथों से मरीज़ की जांच से पता नहीं चलता था."
और भी बातें इसी सिद्धांत के समर्थन में जाती हैं. उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया में नेशनल थायरॉइड कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम शुरू होने पर थायरॉइड कैंसर के मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई. कार्यक्रम के आकार में कटौती होने पर इन मामलों फिर से गिरावट आई.
फिर भी कुछ वैज्ञानिकों का तर्क है, केवल ओवर-डायग्नोसिस ही थायरॉइड कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी की पूरी व्याख्या नहीं कर सकता.
एक स्टडी में, इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कटानिया से एंडोक्रिनोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर रिकार्डो विनेरी का तर्क है कि अगर मामलों में बढ़ोतरी के पीछे यही एकमात्र वजह होती, तो बेहतर डायग्नोस्टिक प्रैक्टिस वाले हाई इनकम देशों में थायरॉइड कैंसर के मामलों में और वृद्धि देखी जा सकती थी. हालांकि, ऐसा नहीं है, क्योंकि मध्यम आय वाले देशों में भी थायरॉइड कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है.
सान्ज़ियाना रोमन कहती हैं, "दुनिया के उन क्षेत्रों और स्थानों में भी थायरॉइड कैंसर की दर बढ़ रही है, जहां मज़बूत जांच नहीं होती."
वह कहती हैं कि बड़े और अधिक एडवांस्ड ट्यूमर वाले मामले भी ज़्यादा आ रहे हैं.
इसके अलावा, थायरॉइड कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में ही होने लगा है और इलाज के नतीजे बेहतर हुए हैं, विनेरी का कहना है कि ऐसे में आप थायरॉइड कैंसर से मरने वालों की संख्या में कमी आने की उम्मीद करेंगे.
हालांकि, ऐसा नहीं है, मृत्यु दर या तो स्थिर बनी हुई है या ऐसे संकेत हैं कि कुछ देशों में, यह दर बढ़ रही है.
उदाहरण के लिए, एक स्टडी में कैलिफ़ोर्निया में उन 69 हज़ार से अधिक थायरॉइड कैंसर के मरीज़ों का विश्लेषण किया गया, जिनमें इस कैंसर की डायग्नोसिस साल 2000 से 2017 के बीच हुई.
रिसर्चर्स ने पाया कि इस अवधि में मरीज़ों की संख्या और मृत्यु दर दोनों में वृद्धि हुई.
इस बढ़ोतरी का ट्यूमर के आकार और कैंसर के स्टेज से कोई सीधा संबंध नहीं था. इससे पता चलता है कि छोटे ट्यूमर के बेहतर डायग्नोसिस के अलावा कुछ और भी ज़रूर है.
2017 में, किताहारा और उनकी टीम ने 1974-2013 के बीच डायग्नोस किए गए 77,000 से अधिक थायरॉइड कैंसर के मरीज़ों के मेडिकल रिकॉर्ड की भी जांच की.
परिणामों से पता चला कि, भले ही मामलों में ज़्यादातर वृद्धि थायरॉइड ग्लैंड में छोटे पैपिलरी ट्यूमर के कारण हुई थी लेकिन मेटास्टेटिक पैपिलरी कैंसर में भी वृद्धि हुई थी जो शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल गए थे.
हालांकि, थायरॉइड कैंसर से होने वाली मौतें दुर्लभ हैं. स्टडी से यह भी पता चला कि ये हर साल 1.1 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थीं.
किताहारा कहती हैं, "इससे पता चलता है कि इन अधिक आक्रामक ट्यूमरों में वृद्धि के पीछे कोई और कारण हो सकता है."
मोटापे से थायरॉइड कैंसर का संबंध

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इसके मुख्य कारकों में से एक मोटापा हो सकता है, जो 1980 के दशक से, विशेष रूप से अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में, बढ़ रहा है.
कई स्टडीज़ अधिक वज़न और थायरॉइड कैंसर के रिस्क के बीच संबंध दिखाती हैं. हाई बीएमआई वाले लोगों में स्वस्थ बीएमआई वाले व्यक्तियों की तुलना में थायरॉइड कैंसर होने की संभावना 50 प्रतिशत अधिक होती है.
हाई बीएमआई बड़े आकार के ट्यूमर और ऐसे ट्यूमर से भी जुड़ा है, जिसके कारण कैंसर आसानी से फैलता है.
किताहारा कहती हैं, "हमारे रिसर्च में यह भी देखा कि हाई बीएमआई थायरॉइड कैंसर से जुड़ी मृत्यु के हाई रिस्क से जुड़ा था."
हालांकि, मोटापा थायरॉइड कैंसर का कारण कैसे बन सकता है, यह स्पष्ट नहीं है. एक बात जो पता है, वह यह है कि मोटापे से ग्रस्त लोगों में थायरॉइड डिस्फ़ंक्शन की संभावना अधिक होती है.
उदाहरण के लिए, जिन लोगों में थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) का स्तर अधिक होता है, उनका बीएमआई अधिक होता है. टीएसएच पिट्यूटरी ग्लैंड से बनने वाला एक हार्मोन है. ये थायरॉइड ग्लैंड के फ़ंक्शन को रेगुलेट करता है.
किताहारा कहती हैं, "मोटापे के कई शारीरिक प्रभाव होते हैं, इसलिए इन्फ़्लमेशन, इंसुलिन प्रतिरोध और थायरॉइड के फ़ंक्शन में परिवर्तन, ये सभी थायरॉइड कैंसर के विकास में भूमिका निभा सकते हैं."
कुछ तरह के केमिकल हो सकते हैं ज़िम्मेदार

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वहीं कई वैज्ञानिकों को शक है कि घर में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली कई चीज़ों और जैविक कीटनाशकों में पाए जाने वाले "एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स" (ईडीसी) इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं.
ये ऐसे रसायन हैं, जो शरीर के हार्मोन की नक़ल करते हैं, उन्हें ब्लॉक करते हैं या उनमें हस्तक्षेप करते हैं.
इसके उदाहरणों में परफ्लुओरोएक्टेनोइक एसिड और परफ्लुओरोऑक्टेनसल्फोनिक एसिड शामिल हैं, जो बर्तन और पेपर फ़ूड पैकेजिंग से लेकर पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और फ़ायरफ़ाइटिंग फ़ोम जैसी कई चीज़ों में पाए जाते हैं. हालांकि, ऐसे रसायनों को थायरॉइड कैंसर से जोड़ने वाले प्रमाण मिले-जुले हैं.
कुछ स्टडीज़ कहती हैं कि इसमें सूक्ष्म तत्व एक भूमिका निभा सकते हैं. सूक्ष्म तत्व वे रासायनिक तत्व होते हैं, जिनकी जीवों को बहुत कम मात्रा में ज़रूरत होती है. हालांकि, ये थायरॉइड के फ़ंक्शन के लिए ज़रूरी भी हैं.
किताहारा कहती हैं, "द्वीप वाले देशों में थायरॉइड कैंसर की दर वाक़ई बहुत ज़्यादा है."
"ज्वालामुखी विस्फोटों से जुड़े सूक्ष्म तत्वों के बारे में कई अनुमान हैं. इसलिए, ज़िंक, कैडमियम और वैनेडियम जैसे कुछ अन्य रसायन इन वातावरणों में मौजूद पाए गए हैं, साथ ही थायरॉइड कैंसर की दर भी काफ़ी ज़्यादा है, लेकिन इनके बीच सीधे संबंध को साबित करने के लिए ठीक तरह से डिज़ाइन कर स्टडीज़ नहीं हुई हैं."
रेडिएशन से संबंध

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हालांकि, किताहारा का मानना है कि इसकी एक और व्याख्या भी हो सकती है. डायग्नोस्टिक मेडिकल स्कैन से निकलने वाला आयनाइज़िंग रेडिएशन. 80 के दशक के बाद से, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में, सीटी और एक्स-रे स्कैन काफी बढ़े हैं और इसमें बच्चों के सीटी स्कैन भी शामिल हैं. ये सीटी स्कैन थायरॉयड ग्लैंड पर रेडिएशन की हाई डोज़ छोड़ते हैं.
अन्य अध्ययनों, जैसे कि जापान में परमाणु बम से बचे लोगों पर किए गए अध्ययनों से, रेडिएशन और थायरॉयड कैंसर के बीच संबंध के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, उसे जानकर हम ऐसे रेडिएशन के प्रभावों का मॉडल बना सकते हैं.
उदाहरण के लिए, एक हालिया अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि आगे चलकर, संयुक्त राज्य अमेरिका में हर साल 3,500 थायरॉयड कैंसर के मामले सीटी स्कैन की दरों के कारण होंगे.
किताहारा कहती हैं, "बच्चों की थायरॉइड ग्लैंड, बड़े लोगों की थायरॉइड ग्लैंड की तुलना में रेडिएशन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होती है."
"इसलिए यह संभव है कि सीटी स्कैन का बढ़ता इस्तेमाल संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरी जगहों पर थायरॉइड कैंसर की बढ़ती दरों में आंशिक रूप से योगदान दे सकता है."
और यह भी संभव है कि इन सभी कारकों की संयुक्त भूमिका हो.
रोमन कहती हैं, "संभव है कि हम कई तरह के कारकों से जुड़ी घटना देख रहे हैं, जिसमें पर्यावरणीय, मेटाबॉलिक, डाइट और हार्मोनल प्रभाव शामिल हैं, जो हो सकता है कि आनुवंशिक संवेदनशीलता को प्रभावित कर रहे हों."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














