महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता का संबोधन: विवाद और उसके स्रोत

अशोक कुमार पाण्डेय

बीबीसी हिंदी के लिए

मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी यानी बापू यानी राष्ट्रपिता. लंबे समय तक यह सब नाम उनके पर्यायवाची रहे हैं.

पूरा नाम तो शायद ही कोई लेता है उनका, जिन्ना, सावरकर और डॉ अंबेडकर के अलावा शायद ही कोई महत्त्वपूर्ण भारतीय नेता हो जिन्होंने उन्हें मिस्टर गांधी के नाम से पुकारा.

जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल के पत्रों में उनके लिए अक्सर ‘डियर बापूजी’ का प्रयोग है.

गुजरात की पृष्ठभूमि के गांधी के पुत्र और अन्य क़रीबी लोग उन्हें भाषाई चलन के अनुसार बापूजी ही पुकारते थे, जो पिता का पर्याय है तो कांग्रेस के युवा नेताओं ने इसी संबोधन को अपना लिया.

कस्तूर तो अफ़्रीका में ही सबकी ‘बा’ बन चुकी थीं, यह संबोधन भी गुजराती चलन में उनके नाम में जुड़ गया और वह कस्तूरबा के नाम से ही जानी गईं.

चंपारण आंदोलन के बाद गांधी को नया संबोधन मिला- महात्मा. ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है कि किस व्यक्ति ने उन्हें कब इस नाम से पुकारा, हालाँकि आमतौर पर इसका श्रेय रवींद्रनाथ टैगोर को दिया जाता है, लेकिन अपने सात्विक रहन-सहन, गहन धार्मिक झुकाव साधारण वेशभूषा से उन्होंने बिहार और देश के आमजन को गहरे प्रभावित किया तथा ‘महात्मा’ उनका आम पुकार का नाम बनता गया.

यहाँ तक कि उनके कई विरोधी भी अपने संबोधनों और पत्रों में उन्हें ‘महात्माजी’ कहते हैं. ‘जी’ लगाए बिना तो उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे भी अदालत में दिए अपने कुख्यात बयान तक में उन्हें संबोधित नहीं करता.

राष्ट्रपिता संबोधन पर विवाद

लेकिन आजकल विवाद खड़ा किया जाता है ‘राष्ट्रपिता’ के संबोधन पर. दक्षिणपंथ से अक्सर यह सवाल उठता है कि आख़िर गांधी ‘राष्ट्रपिता’ कैसे हो सकते हैं? हल्की बातें करने वालों को छोड़ भी दें तो कई लोग गंभीरता से यह सवाल पूछते हैं कि किसी को यह पदवी कैसे दी जा सकती है?

हाथरस निवासी गौरव अग्रवाल की एक आरटीआई के जवाब में केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय ने जनवरी, 2020 में स्पष्ट किया था कि न तो कभी भारत सरकार ने ऐसा कोई नियम बनाया न ही इस संदर्भ में कोई अध्यादेश लाया गया था.

कांग्रेस के सत्ता में रहते 2012 में लखनऊ के एक छात्र ने जब इस बाबत क़ानून बनाने की मांग तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से की थी, तब भी गृह मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया था कि संविधान का आर्टिकल 18(1) शैक्षणिक एवं सैन्य क्षेत्र के अलावा किसी मामले में ऐसी पदवियों का कोई प्रावधान नहीं करता.

एक और मामले में जब अनिल दत्त शर्मा नामक व्यक्ति ने एक पी आई एल दाखिल कर महात्मा गांधी को आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रपिता’ घोषित करने की मांग की तो तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस ए बोबाड़े और दो अन्य जजों की पीठ ने यह तो स्वीकार किया कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं और देश उनका अत्यंत सम्मान करता है लेकिन ऐसे किसी आधिकारिक अलंकरण की बात स्वीकार न करते हुए याचिका खारिज़ कर दी.

हाल ही में विनायक दामोदर सावरकर के पोते रणजीत सावरकर ने एक विवाद के दौरान महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानने से इंकार करते हुए सवाल उठाया कि हज़ारों वर्ष पुरानी सभ्यता का कोई पिता कैसे हो सकता है?

ऐसे में यह प्रश्न उठना लाज़िम है कि आखिर महात्मा गांधी को यह सम्बोधन किसने दिया और उसके निहितार्थ क्या थे?

जेल में कस्तूरबा का देहांत

यह उस दौर की बात है जब देश में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की लहर तेज़ थी और अंग्रेजों ने कांग्रेस को न केवल ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया था बल्कि इसके सभी प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया था. महात्मा गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा, निजी सचिव महादेव देसाई और कुछ अन्य लोगों के साथ पुणे के आगा खां पैलेस में गिरफ़्तार थे.

नाम से तो पैलेस सुनकर महल का आभास होता है और अब इसे एक स्मारक के रूप में जिस तरह रखा गया है, यह भव्य महल ही लगता है लेकिन स्टैनली वोलपार्ट ने अपनी किताब ‘गांधीज़ पैशन’ में बताया है कि उस समय बगल से गुज़रते नालों के चलते न केवल वहाँ ज़बरदस्त नमी रहती थी बल्कि मच्छरों का साम्राज्य था और मलेरिया होने की संभावना लगातार रहती थी.

वोलपार्ट इसे उस समय की सबसे बुरी जेलों में शामिल करते हैं. यहाँ रहते हुए 15 अगस्त 1942 को गांधीजी ने अपने प्रिय सचिव महादेव देसाई को खो दिया जिनकी उम्र उस समय केवल 50 वर्ष की थी. इसके पहले ही 22 फरवरी 1942 को कस्तूरबा भी यहीं रहते हुए उनका साथ छोड़ गईं. खुद गांधीजी की तबीयत इतनी खराब हुई थी कि ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी अंतिम क्रिया का इंतज़ाम भी कर लिया था.

नेताजी ने लिखी चिट्ठी

नेताजी उस समय जर्मनी से जापान पहुँच चुके थे. भारत छोड़ो आंदोलन ने उन्हें बेहद उत्साहित किया था. भारत की आज़ादी का जो स्वप्न वह देख रहे थे, भारत छोड़ो आंदोलन उसके लिए एक शानदार मौक़ा लग रहा था.

उन्हें लगता था कि एक तरफ़ आज़ाद हिन्द फ़ौज जापान की मदद से भारत में प्रवेश करेगी और उसी समय भारत में चल रहे आंदोलन के तहत लोग विद्रोह कर देंगे तो भारत से अंग्रेज़ों को भगाना आसान हो जाएगा.

यहाँ एक मज़ेदार तथ्य रासबिहारी बोस से सम्बद्ध है जो लम्बे समय से जापान में रहकर भारत की आज़ादी की कोशिश कर रहे थे, उनके जीवनीकार ताकेशी नाकाजिमा ने उनकी जीवनी ‘बोस ऑफ नाकामुराया’ में लिखा है कि एक दौर में वह सावरकर की तारीफ़ करते नज़र आते हैं लेकिन 1942 में सावरकर के ब्रिटिश समर्थक रुख को देखकर निराश होते हैं और कांग्रेस को भारतीय जन का इकलौता प्रतिनिधि घोषित करते हैं.

22 फरवरी 1942 को कस्तूरबा की मृत्यु की ख़बर मिलने पर नेताजी ने महात्मा गांधी को अपना शोक संदेश भेजा, इसके आरंभ में उन्होंने लिखा- ‘श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं. पूना में ब्रिटिश क़ैद में 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. देश में रह रहे और देश के बाहर रहने वाले 38 करोड़ 80 लाख भारतीयों के साथ मैं कस्तूरबा की मृत्यु पर गहरे शोक में साझेदार हूँ.’

इस पत्र में उन्होंने महादेव देसाई को भी याद किया और कस्तूरबा के जीवन संघर्ष को याद करते हुए उन्हें ‘भारतीय जन की माँ’ कहा. मूल रूप से ‘टेस्टामेंट ऑफ सुभाष बोस’ के पेज 69-70 पर प्रकाशित इस पत्र का शीर्षक दिया गया है –‘भारतीय जन की माँ को श्रद्धांजलि.’ यह सम्बोधन ‘राष्ट्रमाता’ के क़रीब है लेकिन इसके व्यापक उपयोग का कोई उदाहरण नहीं मिलता.

गांधी को 'फ़ॉदर ऑफ़ ऑवर नेशन' लिखा

इसके कोई ढाई साल बाद उनका एक संदेश है महात्मा गांधी के नाम. अब तक के संदेशों में वह ‘महात्माजी’ का उपयोग करते थे लेकिन 6 जुलाई 1944 को उनके नाम दिए संदेश का शीर्षक दिया उन्होंने – फ़ॉदर ऑफ़ ऑवर नेशन.

यह जापान से आज़ाद हिन्द रेडियो द्वारा प्रसारित संदेश मूल रूप से ‘ब्लड बाथ’ में पेज 24-34 पर छपा है जिसे सुगता बोस और शिशिर कुमार बोस ने नेताजी के पत्रों तथा संदेशों के संकलन ‘दिल्ली चलो’ में 212-222 तथा ‘ द एसेंशियल राइटिंग्स ऑफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ में पेज 300-309 में संकलित किया है.

इस भाषण के आरंभ में तो उन्होंने हमेशा की तरह ‘महात्माजी’ जी कहा है और विस्तार से अपनी नीतियों की चर्चा करते हुए ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति की राह सुझाते हुए जापानी मदद को सही ठहराया है, लेकिन भाषण की अंतिम पंक्ति में वह कहते हैं- हमारे राष्ट्रपिता (फ़ॉदर ऑफ़ ऑवर नेशन) भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हम आपके आशीर्वाद और आपकी शुभकामनाओं की कामना रखते हैं.

यह पहला अवसर था जब किसी ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ के नाम से पुकारा था. हालाँकि तुरंत यह सम्बोधन प्रचलित नहीं हुआ, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए प्रयोग में लाए जाने लगा.

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