पाकिस्तान के टूटने पर बोले जनरल बाजवा, बांग्लादेश के जन्म को बताया सियासी नाकामी

रिटायर होने से कुछ ही दिन पहले पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा ने अपने एक भाषण में सेना के धैर्य की परीक्षा न लेने की चेतावनी दी है. 

उन्होंने कहा है कि पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ जारी राजनीतिक छींटाकशी में उनका सब्र हमेशा बरक़रार नहीं रह पाएगा.

जनरल बाजवा ने राजनीतिक पार्टियों से अपने अहम को अलग रखकर पिछली ग़लतियों से सीखने की अपील की है. 

बाजवा ने इमरान ख़ान के उन दावों को भी सिरे से ख़ारिज कर दिया है, जिनमें इमरान ख़ान उनकी सरकार को गिराने के पीछे विदेशी (अमेरिकी) हाथ बताते रहे हैं. 

61 वर्षीय जनरल बाजवा 29 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं. वे तीन साल का एक्सटेंशन पूरा कर रहे हैं.

जनरल बाजवा कह चुके हैं कि वे और एक्सटेंशन लेने के इच्छुक नहीं हैं. 

इमरान ख़ान पर क्या बोले जनरल बाजवा

  • पिछली सरकार के गिरने के पीछे कोई विदेश साज़िश नहीं, ऐसा होता तो सेना चुप नहीं बैठती
  • सेना ने पिछले साल फ़रवरी में तय किया था कि वह सियासत में दखल नहीं देगी
  • सेना में सुधार हो रहे हैं, सियासी पार्टियों को भी ये प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए
  • राजनीतिक स्थिरता ज़रूरी, पिछली ग़लतियों से सीखें और अहंकार छोड़ एकजुट हो जाएँ
  • अगली सरकार को सेलेक्टड या इम्पोर्टेड (आयातित) न बोलें

डिफ़ेंस एंड मार्टर डे के एक समारोह में जनरल बाजवा ने 1971 में देश के विभाजन के बारे में भी बात की. 

उनके भाषण के इस हिस्से की भारत में ख़ूब चर्चा है.

जनरल बाजवा ने क्या कहा?

पाकिस्तान की राजनीति में 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के अलग होने और उसके 93,000 सैनिकों के भारतीय सेना के सामने ढाका में सरेंडर करने का मुद्दा बेहद संवेदनशील है. 

दबी ज़ुबान पाकिस्तान में ये बहस चलती रही है कि क्या वो राजनीतिक चूक थी या फ़ौज की हार. 

बुधवार को जनरल बाजवा ने अपने भाषण में कहा, “आज मैं आपके सामने एक ऐसे विषय पर भी बात करना चाहता हूँ, जिस पर अमूमन लोग बात करने से गुरेज़ करते हैं. ये बात 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में हमारी सेना की भूमिका के बारे में है.”

उन्होंने कहा कि वे कुछ तथ्य दुरुस्त करना चाहते हैं.

'फ़ौजी नहीं सियासी नाकामी'

जनरल बाजवा ने कहा, “सबसे पहले पूर्वी पाकिस्तान एक फौजी नहीं, सियासी नाकामी थी. लड़ने वाली फौज की तादाद 92,000 नहीं, सिर्फ़ 34,000 थी. बाक़ी लोग सरकार के अलग-अलग विभागों से थे.”

“इन 34,000 फ़ौजियों का मुक़ाबला ढाई लाख इंडियन आर्मी, दो लाख प्रशिक्षित मुक्तिवाहिनी से था. इन चुनौतियों के बावजूद हमारी सेना बड़ी बहादुरी से लड़ी. और बेमिसाल क़ुर्बानियाँ पेश कीं जिसकी तारीफ़ ख़ुद इंडियन आर्मी के फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ ने भी की है.”

“इन बहादुर ग़ाज़ियों और शहीदों का क़ौम ने आज तक सम्मान नहीं किया है. ये एक बहुत बड़ी ज़्यादती है. मैं आज इस अवसर का फ़ायदा उठाते हुए इन तमाम ग़ाज़ियों और शहीदों को ख़िराजे-तहसीन पेश करता हूँ. वो हमारे हीरो हैं और क़ौम को उन पर फ़ख़्र होना चाहिए.”

सरेंडर करने वालों की कितनी थी तादाद?

भारतीय सेना आधिकारिक रूप से कहती रही है कि ढाका में दिसंबर 1971 में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाले थे. 

लेकिन जनरल बाजवा ने अब कहा है कि सरेंडर करने वालों में सिर्फ़ 34 हज़ार ही सैनिक थे.

भारत सरकार और भारतीय सेना ने हमेशा कहा है कि ढाका में हथियार डालने वाले पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या 93,000 से अधिक थी.

पिछले वर्ष बांग्लादेश की गठन की 50वीं बरसी पर भारतीय सेना ने सोशल मीडिया पर तस्वीर शेयर करते हुए यही बात दोहराई थी.

1971 पाकिस्तान कौन चला रहा था?

जनरल बाजवा ने सरेंडर करने वालों की संख्या के अलावा एक अहम बात ये कही कि जो कुछ हुआ था उसके लिए सेना ज़िम्मेदार नहीं थी.

उसके लिए सियासत ज़िम्मेदार थी.

इसके अलावा जिस समय पाकिस्तान को शिकस्त मिली थी उस समय पाकिस्तान की सत्ता पर एक तरह से सेना ही काबिज़ थी.

जनरल याहया ख़ान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे. 

याहया ख़ान 1966 में पाकिस्तानी सेना के कमांडर इन चीफ़ बने थे.

वे मार्च 1969 में राष्ट्रपति बने और बांग्लादेश के जन्म के बाद यानी 20 दिसंबर 1971 तक इस्तीफ़ा देने से पहले इसी पद पर बने रहे.

पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के लिए केवल सियासत को ज़िम्मेदार ठहराने और सेना को क्लीन चिट देने पर पाकिस्तान में भी कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं. 

पाकिस्तानी स्तंभकार और पत्रकार मोहम्मद तक़ी लिखते हैं, “मुझे ख़ुशी है कि जनरल ने इस बारे में बात की. उन्होंने फ़ौजियों की कारगुज़ारियों के बारे में सेना के हर आचोलक और आलोचना को सही साबित किया है. उनके साथ जो रहा है, वो उसी के क़ाबिल हैं.”

1971 की जंग और पाकिस्तानी सेना का सरेंडर

शेख मुजीबुरहमान की पार्टी अवामी लीग ने 1970 में हुए पाकिस्तान के आम चुनावों में जीत हासिल की थी. शेख़ मुजीब बंगाली थे और पूर्वी पाकिस्तान के कद्दावर नेता.

लेकिन उनकी जीत को पाकिस्तान सरकार ने मान्यता नहीं दी. 

इसके बाद शेख मुजीब ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आहवान किया. पाकिस्तान ने शेख़ मुजीब को देशद्रोह के अभियोग में गिरफ़्तार कर लाहौर की जेल में डाल दिया.

शेख मुजीब की गिरफ़्तारी के बाद पूर्वी पाकिस्तान में हिंसा भड़क उठी. पाकिस्तान ने हिंसा को दबाने के लिए जनरल टिक्का ख़ान को ढाका भेजा. 

बांग्लादेश और भारतीय इतिहासकारों का कहना है कि जनरल ख़ान ने सियासी लीडरों, छात्रों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया और हज़ारों की तादाद में लोगों की हत्या हुई.

बांग्लादेश में कुछ जानकार टिक्का ख़ान की कार्रवाई को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखते हैं. 

इसके बाद तीन दिसंबर को भारत ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध की घोषणा की और 16 दिसंबर को पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी ने अपने सैनिकों के साथ बिना शर्त के सरेंडर कर दिया था.

भारत के मुताबिक सरेंडर करने वाले सैनिकों की संख्या 93,000 हज़ार थी. 

1971 पर क्या रहा है पाकिस्तान का रवैया

पाकिस्तान में आम तौर पर 1971 के युद्ध में हार की वजह अवामी लीग और भारत के हस्तक्षेप को माना जाता रहा है. इसे एक तरह से भारतीय साज़िश बताया जाता रहा है.

पाकिस्तानी सेना और उस समय की पाकिस्तान सरकार की भूमिका पर चर्चा कम ही होती है. हालांकि, कई पूर्व वरिष्ठ जनरलों ने अपनी किताबों में 1971 की विस्तार से विवेचना की है. 

पिछले साल बांग्लादेश के गठन की 50वीं वर्षगांठ पर बीबीसी ने कराची के इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिस्टोरिकल एंड सोशल रिसर्च में रिसर्च डायरेक्टर सैयद ज़फ़र अहमद से इस बारे में विस्तार से बात की थी. 

ज़फ़र अहमद ने कहा था, "हर कोई जानता है कि पाकिस्तान के एक हिस्से का अलग होना एक दुखद घटना थी, एक विफलता थी लेकिन ऐसा क्यों हुआ, लोगों को इसका असल जवाब नहीं मिला. लोगों ने केवल इतना सुना कि इसके पीछे भारत का हाथ था और आवामी लीग ने धोखा दिया."

सैयद ज़फ़र अहमद कहते हैं कि युद्ध के बाद इस पर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा चर्चा नहीं हुई. स्कूल के पाठ्यक्रम में भी ऐसा कोई इतिहास नहीं है.

वे कहते हैं, "कुछ बाते हैं और सवाल भी हैं, लेकिन वो एक-दूसरे से जुड़े न होकर अलग-अलग हैं. सिर्फ़ इतना ही है."

डॉक्टर अहमद ने कराची यूनिवर्सिटी में लगभग 20 साल राजनीति और इतिहास पढ़ाया है.

वे कहते हैं कि 1971 के युद्ध में भारत की भूमिका थी लेकिन इसका मुख्य कारण पाकिस्तान की उस वक़्त की सरकारों की विफ़लता थी जिसने बंगालियों के प्रति भेदभाव और अलगाव को बढ़ावा दिया.

जनरल बाजवा कुछ भी कहें लेकिन कई पूर्व जनरल ये स्वीकार करते हैं कि चूक पाकिस्तानी सेना से भी हुई थी. 

'घर में कलह होगी दो दुश्मन फ़ायदा उठाएगा...'

इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस' (आईएसआई) के पूर्व प्रमुख रिटायर्ड जनरल असद दुर्रानी ने एक बार बीबीसी से कहा था कि भले ही बीते 50 सालों में सरकारी एजेंसियों की ओर से कुछ भी नहीं क़बूल किया गया लेकिन पाकिस्तान के लोग इस बात को समझते हैं कि क्या ग़लत हुआ.

"लोगों को अब यह समझ है कि ग़लती हुई. सेना ने ग़लती की. (1970 में चुनाव के बाद) ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने शेख़ मुजीब-उर रहमान के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करके ग़लती की. अब तो आम लोग भी यही मानते हैं."

जनरल दुर्रानी ने कहा कि इसमें कोई शक़ नहीं कि इस परिस्थिति का भारत ने लाभ उठाया, "अगर घर में कोई समस्या होगी तो दुश्मन उसका फ़ायदा तो उठाएगा ही. इसमें आश्चर्य कैसा."

वैसे जनरल दुर्रानी पाकिस्तान में एक विवादित शख़्सियत रहे हैं.

उन्होंने भारत आईबी और रॉ प्रमुख रहे एएस दुलत के साथ एक पुस्तक लिखी थी जिसके बाद वे अपने ही देश में विवादों में घिर गए थे. 

द स्पाई क्रॉनिकल्स नाम की किताब में दोनों ने कई राज़ खोले थे. 

कॉपी - पवन सिंह अतुल

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