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नरेंद्र मोदी की बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की राह में कितने रोड़े
- Author, प्रियंका
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
कांग्रेस समेत देश के 26 राजनीतिक दल सोमवार से दो दिन (17 और 18 जुलाई) की मीटिंग के लिए कर्नाटक के बेंगलुरु में जुटे हैं.
मकसद एक है, 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत की हैट्रिक होने से रोकना.
विपक्षी पार्टियों की इस एकजुटता की नींव बीते महीने 23 जून को बिहार की राजधानी पटना में पड़ गई थी. उस समय 15 विपक्षी पार्टियों ने बीजेपी के ख़िलाफ़ गोलबंदी की थी.
बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ एक मंच आईं ये पार्टियां, नरेंद्र मोदी की सरकार पर केंद्रीय जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाती रही हैं.
महंगाई, बेरोज़गारी, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा, अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों जैसे कई मुद्दों ने भी इन सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को एक साथ आने का आधार दिया है.
लेकिन इन पार्टियों के बीच के मसले इन्हें कितने समय तक एकजुट रख पाएंगे ये सवाल भी लगातार पूछा जा रहा है.
एकता की कोशिश में हुई पहली ही बैठक में आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने यह शर्त रख दी थी कि जब तक 'कांग्रेस दिल्ली के अध्यादेश के मुद्दे पर अपना रुख़ सार्वजनिक नहीं करेगी तब तक उनकी पार्टी ऐसी किसी भी मीटिंग का हिस्सा नहीं बनेगी जिसमें कांग्रेस भी मौजूद होगी.'
ऐसा हुआ भी. बैठक से एक दिन पहले रविवार को पहले कांग्रेस ने अध्यादेश के मुद्दे पर हाथ बढ़ाया और इसके बाद आम आदमी पार्टी ने बेंगलुरु की बैठक में विपक्षी पार्टियों के साथ जाने की घोषणा की.
इसके अलावा सीटों का बंटवारा, साझा उम्मीदवार, विधानसभा चुनावों में सभी दलों के आपसी समीकरण और क्षेत्रीय दलों की महत्वकांक्षाएं भी उम्मीदों को झटका दे सकती है.
सबसे बड़ा सवाल- मोदी बनाम कौन?
अधिकांश विपक्षी दल 2024 के लोकसभा चुनावों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को हटाना चाहते हैं.
अगर बीजेपी सत्ता से बाहर होती है और विपक्षी दल बहुमत हासिल करते हैं तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इस पर फिलहाल विपक्ष की कोई पार्टी कुछ नहीं कहना चाहती.
शायद, वो जानते हैं कि ये मुद्दा गतिरोध की बड़ी वजह बन सकता है.
बैठक से पहले जब कांग्रेस ने कर्नाटक में सोमवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की तो पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने विपक्षा के नेता पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि फिलहाल चेहरे से ज़्यादा मुद्दे अहम हैं. विपक्षी दलों का साझा एजेंडा बीजेपी को हराना है.
ऐसा नहीं है कि विपक्ष के नेताओं में पीएम पद हासिल करने की हसरत नहीं है.
अरविंद केजरीवाल खुद को पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर पेश करते रहे हैं. वो भी तब, जब लोकसभा में आम आदमी पार्टी का केवल एक सांसद है. ये सीट भी पार्टी को जालंधर सीट पर दो महीने पहले हुए उपचुनाव में हासिल हुई है.
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात से बाहर जाकर लोकसभा चुनाव लड़ा, तब अरविंद केजरीवाल ने उन्हें वाराणसी में चुनौती दी थी. हालांकि, मोदी इस सीट पर 3.37 लाख वोटों से जीत गए थे.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं कि विपक्षी दल फिलहाल विरोधाभासी सवालों से बच रहे हैं. ऐसे में मोदी के ख़िलाफ़ कौन साझा उम्मीदवार होगा, इसका जवाब भी चुनाव के बाद की स्थितियों के लिए छोड़ा जाएगा.
हालांकि, वो पीएम के चेहरे के सवाल से बड़ा इस गठबंधन के नाम को मानते हैं.
प्रमोद जोशी कहते हैं, "पहला सवाल ही ये है कि इस गठजोड़ का नाम क्या होगा. इससे पहले कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में यूपीए (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस) था. क्या ये वही होगा, या कोई नया नाम होगा. अगर नया नाम होगा तो चेहरा भी नया होगा."
प्रमोद जोशी कहते हैं कि एचडी देवेगौड़ा और आईके गुजराल इस देश की राजनीति में बड़े नाम नहीं थे लेकिन इन्हें पीएम बनाया गया.
नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी, विपक्षी दलों में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की एक लंबी लिस्ट है.
इस पर प्रमोद जोशी कहते हैं, "एक बात जो सब मानते हैं, वो ये कि मोदी एक मज़बूत नेता हैं. वो एक रेडियो प्रोग्राम (मन की बात) से भी सुदूर ग्रामीण इलाकों के लोगों से भी जुड़ जाते हैं. यही उनकी खासियत है. लेकिन ये विरोधी दलों के नेताओं में नहीं देखने को मिलता. इसलिए ये चुनाव आते-आते भी पीएम उम्मीदवार का चेहरा घोषित कर दें, ऐसा तो नहीं लगता."
इन राज्यों में फंस सकता है पेच
विपक्षी दलों के इस महाजुटान में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को छोड़ दें तो बाकी सभी दलों का एक क्षेत्र विशेष में प्रभाव है.
इनमें से अधिकतर पार्टियां अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं.
20 लोकसभा सीटों वाले केरल राज्य में कांग्रेस और सीपीएम एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं.
वहीं, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ भी कांग्रेस को सात लोकसभा सीटों के बंटवारे के लिए माथापच्ची करनी पड़ सकती है.
फिलहाल दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में 22 फ़ीसदी वोटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर और 18 फ़ीसदी वोट पाकर आम आदमी पार्टी तीसरे नंबर पर थी.
इसके अलावा पंजाब में लोकसभा की 13 सीटे हैं. इनमें से सात कांग्रेस और एक आम आदमी पार्टी के पास है.
ऐसे में इन दोनों पार्टियों में कौन एक-दूसरे के लिए किस राज्य में कितनी सीटे छोड़ने को तैयार होगा?
'द प्रिंट' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी के अधिकांश नेताओं का कहना है कि वो चाहते हैं कांग्रेस पंजाब में अधिकतर सीटें कुर्बान करे और साथ ही दिल्ली में भी सीटे बांटे.
लेकिन पंजाब की राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह का मानना है कि राज्य स्तर के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को ध्यान में रखकर शुरू की गई एकजुटता की कवायद को ख़ास प्रभावित नहीं करेंगे.
हालांकि, वो ये भी कहते हैं कि दिल्ली और पंजाब में दोनों ही पार्टियों के लिए एकजुटता की कवायद बड़ी चुनौती है.
वो कहते हैं, "हो सकता है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच ऐसी समझ बने कि जिसका उम्मीदवार मज़बूत हो, वहां से वही लड़ ले. दिल्ली और पंजाब ही ऐसे प्रदेश हैं जहाँ कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने आम आदमी पार्टी को साथ लेने का विरोध किया है, लेकिन अब जब ये मीटिंग हो रही है तो लोकल लीडरशिप चुप है. वो भी इंतज़ार कर रहे हैं."
केरल, दिल्ली और पंजाब में कुल 40 लोकसभा सीटे हैं.
कांग्रेस की 'कुर्बानी' पर टिकी विपक्षी एकता?
'द प्रिंट' के राजनीतिक संपादक डीके सिंह कहते हैं कि विपक्ष की मीटिंग में हिस्सा ले रहीं सभी पार्टियों को दो धड़ों में बांटा जा सकता है. वो जो पहले से ही कांग्रेस की सहयोगी रही हैं और जो नहीं रहे हैं.
पहले धड़े में डीएमके, एमडीएमके, केडीएमके, वीसीके, जेडीयू, राष्ट्रीय जनता दल, सीपीआई, सीपीआई(एम), सीपीआई (एमएल), आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, शिवसेना(उद्धव बालासाहेब ठाकरे), झारखंड मुक्ति मोर्चा, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस (जोसफ) जैसी 16 पार्टियां हैं.
वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, केरल कांग्रेस (मणि), नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक जैसी सात पार्टियां हैं.
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसे राज्य हैं जहाँ वो सीधे बीजेपी को टक्कर नहीं दे रही यानी तीसरे नंबर या उससे भी नीचे है.
पिछले लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाले राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं था.
उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटे हैं. यहां कांग्रेस को एक (रायबरेली) और समाजवादी पार्टी को पाँच सीटों पर जीत मिली थी. ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस के अधिक सीटों पर लड़ने के दावे को समाजवादी पार्टी नकार सकती है.
इसके अलावा पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटे हैं, जिनमें से केवल दो ही कांग्रेस के पास हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 22 सीटे जीतीं लेकिन बीजेपी भी 18 सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर थी.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डिवेलपिंग सोसायटीज़ (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर संजय कुमार एक लेख में कहते हैं कि बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी के बीच कड़वाहट भरे रिश्ते एक समस्या बन सकते हैं.
वो कहते हैं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी मज़बूत स्थिति के बदले टीएमसी की कोशिश रहेगी कि वो राज्य में लोकसभा चुनाव की अधिक से अधिक सीटों को अपने पाले में रखे.
इसी साल कर्नाटक में जब कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की तो पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कहा, "कांग्रेस जहां मज़बूत है, वहां लड़े. हम उसका समर्थन करेंगे. इसमें कुछ ग़लत नहीं है. लेकिन उसे भी (कांग्रेस को) दूसरे दलों का समर्थन करना होगा."
डीके सिंह ममता बनर्जी के इस बयान को डिकोड करते हुए कहते हैं, "इसका सीधा सा अर्थ है कि कांग्रेस को सिर्फ़ बंगाल में उन्हीं दो लोकसभा सीटों पर लड़े जो उसने 2019 में जीतीं और बाकी टीएमसी के लिए छोड़ दे."
वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश के मामले में सपा रायबरेली, अमेठी और कुछ अन्य सीटों पर कांग्रेस को समर्थन देगी. लेकिन इस 'कुर्बानी' के लिए कांग्रेस को मुस्लिम वोटबैंक पर ममता और अखिलेश की दोबारा पकड़ बनाने में मदद करनी होगी. वो भी कांग्रेस के अपने ही वोटबैंक की कीमत पर."
डीके सिंह कहते हैं कि आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और तृणणूल कांग्रेस तीनों मिलकर कांग्रेस के लिए अधिक से अधिक 25 से 30 सीटें ही छोड़ेंगी, और ये वो संख्या है जिसपर कांग्रेस लड़ेगी. जीत कितनी सीटों पर मिलेगी, इस बारे में तो अभी सोच भी नहीं जा सकता.
डीके सिंह कहते हैं, "लोकसभा चुनावों में इन पार्टियों को जगह देने से केंद्र में बीजेपी विरोधी चेहरे के तौर पर खुद को स्थापित करने में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और केजरीवाल को मदद ही मिलेगी."
इन राज्यों में भी राह आसान नहीं
बिहार में लोकसभा की 40 सीटे हैं. जनता दल यूनाइटेड ने 2019 का चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा था. उस समय इस गठबंधन ने 40 में से 39 सीटे जीती थीं और एक कांग्रेस के खाते में थी.
अब जेडीयू की बिहार में आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के साथ महागठबंधन सरकार चला रही है. कांग्रेस के लिए बिहार में भी अधिक सीटे पाना मुश्किल बताया जा रहा है.
विपक्षी एकजुटता की पहली और दूसरी बैठक के बीच महाराष्ट्र की राजनीति में काफ़ी कुछ बदल गया है.
अब एनसीपी भी दो गुटों में बंट गई है. इससे पहले शिवसेना भी टूट चुकी है.
ये पहली बार होगा जब शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस चुनाव से पहले साथ आए हों.
2019 में शिवसेना ने राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 18 जीती थी. वहीं, एनसीपी चार पर विजयी हुई और कांग्रेस के खाते में एक सीट आई थी.
जानकार कहते हैं कि इन तीन पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला क्या होगा, इस पर टिप्पणी फिलहाल नहीं की जा सकती है.
एनसीपी-आप बनेगी कमज़ोर कड़ी?
कई दिनों तक जारी रही अटकलबाज़ी के बीच रविवार को एनसीपी और आम आदमी पार्टी ने बेंगलुरु की बैठक में शामिल होने की पुष्टि की.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि विपक्षी दलों की एकजुटता में एनसीपी और आम आदमी पार्टी कमज़ोर कड़ी बन सकते हैं.
वो कहते हैं, "शरद पवार का दोहरा रुख. साल 2014 में जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी बहुमत से 22 सीटें दूर रह गई थी तब शरद पवार ने बाहर से समर्थन देने का एलान कर दिया था. दूसरा मौका, जब 2019 में अजित पवार ने बीजेपी के साथ दो-तीन दिनों की सरकार बनाई थी, उस वक्त भी जानकारों ने ये कहा कि शरद पवार ने इसे ठीक कदम मान लिया था."
प्रमोद जोशी एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के हवाले से ये भी बताते हैं कि जब बीते साल एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत कर के बीजेपी के साथ सरकार बनाई थी, तब भी शरद पवार ने अपने नेताओं से ये पता करने को कहा था कि क्या एनसीपी बीजेपी के साथ आ जाए.
इसके अलावा प्रमोद जोशी आम आदमी पार्टी की भूमिका को लेकर भी आशंका ज़ाहिर करते हैं.
वो कहते हैं, "भले ही उन्होंने (आप) कहा कि वो बैठक में शामिल होंगे लेकिन उनकी भूमिका कांग्रेस विरोधी और बीजेपी विरोधी दोनों की ही रही है. तो वो किस समय पलटी खा जाएंगे, अभी कोई नहीं बता सकता. कांग्रेस समेत बहुत से लोग तो उन्हें बीजेपी की बी टीम कहते हैं. लेकिन कांग्रेस अभी चुप्पी साधे है."
राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के जयंत चौधरी की भूमिका को भी प्रमोद जोशी स्पष्ट नहीं देख पाते. यूपी के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ रालोद ने गठबंधन किया था.
पिछली बैठक में व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर जयंत चौधरी शामिल नहीं हुए थे.
प्रमोद जोशी कहते हैं कि ऐसी चर्चा है कि जयंत बीजेपी के साथ गठबंधन चाहते थे, लेकिन बीजेपी ही उन्हें खास तवज्जो नहीं दे रही है. ऐसे में उनका रवैया भी ढुलमुल ही है.
हालांकि, वो इस कवायद को एक अच्छी पहल के तौर पर ज़रूर देखते हैं, लेकिन विपक्षी दलों की ये एकजुटता कितनी रंग लाती है वो पता लगने में अभी दस महीने बाकी हैं.
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